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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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६४४ सूर्य-सिद्धान्त देख पड़ते हैं और पुराणों में प्रसिद्ध नहुष राजा की याद दिलाते हैं जो अगस्त ऋषि के शाप से सर्प बन गया था । इस प्रकार ज्येष्ठमास के आकाश चित्र का वर्णन पूरा हुआ । भाद्रपद मास का आकाश चित्र सिर के ऊपर--इस समय तीन प्रसिद्ध नक्षत्रमण्डल खस्वस्तिक के आस- पास देख पड़ते हैं । श्रवणमण्डल के तीन तारे प्रायः यामोत्तरवृत्त पर खस्वस्तिक से कुछ दखिन हटे हुए देख पड़ते हैं । इसी के पास धनिष्ठा नक्षत्र के चार तारे बहुत पास-पास परन्तु मन्द ज्योति के हैं । यह नक्षत्र ऐतिहासिक दृष्टि से बड़े महत्व का है । वेदांग-ज्योतिष-काल में जब सूर्य यहाँ पहुँचता था तभी उत्तरायण का आरम्भ होता था । खस्वस्तिक के पास ही एक मन्द तारा है जो हंस की पूंछ का अन्तिम तारा है । इससे उत्तर पूर्व दिशा में एक ही रेखा में दो और तारे हैं जो इससे अधिक चमकीले हैं परन्तु उत्तर वाला इनमें सबसे अधिक चमकीला है । बीच वाले तारे के अगल-बगल पहली रेखा से समकोण बनाते हुए प्रायः एक ही रेखा में दो-तीन तारे और देख पड़ते हैं जो हंस के पंख की तरह जान पड़ते हैं। यह हंस आकाशगंगा में पंख फैलाये तैरता हुआ जान पड़ता है । हंस के पच्छिम अभिजित नक्षत्र है जिसका सबसे चमकीला तारा भी अभिजित नाम से प्रसिद्ध है । यह आकाशगङ्गा से बाहर पच्छिम की ओर है । चमक में इस तारे का स्थान तीसरा है । आकाशगङ्गा—यह चित्र में नहीं दिखलाई गई है परन्तु इस समय इसका दृश्य बहुत ही मनोरम है । इस समय यह उत्तर-पूर्व क्षितिज से दक्षिण-पच्छिम क्षितिज तक फैली हुई है। उत्तर-पूर्व दिशा में इस समय परशु या पारसीक मण्डल उदय हो रहा है। वहीं से आकाशगङ्गा का भी आरम्भ देख पड़ता है जो राह में काश्यप मण्डल को नहलाती हुई सिफियस के बगल से होती हुई हंस को अच्छी तरह शराबोर कर देती है । हंस के उत्तर वाले तारे से ही इसकी दो शाखायें हो जाती हैं जो प्रायः समानान्तर दिशा में आगे बढ़ती हुई दक्षिणपच्छिम क्षितिज के पास फिर मिलती हुई जान पड़ती हैं । पूर्ववाली शाखा श्रवण नक्षत्र को परिप्लावित करती हुई धनु- राशि के मूल और पूर्वाषाढ़ नक्षत्रों को लीन करती हुई क्षितिज में गुप्त हो जाती है । पच्छिमवाली शाखा में चमकीले तारे बहुत कम हैं । दक्षिण-पच्छिम क्षितिज के पास वृश्चिक के डंक के तारों को डुबाती हुई यह भी गुप्त हो जाती है । ज्येष्ठा नक्षत्र इस शाखा के पच्छिमी तट पर देख पड़ता है ।