भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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६४८ सूर्य-सिद्धान्त

देख पड़ता है। इसे ही आर्द्रा नक्षत्र का योग तारा कहते हैं। इसके ऊपरवाला तारा मृगशिरा नक्षत्र का योग तारा कहलाता है। दक्खिन की ओर का ऊपरवाला तारा भी प्रथम श्रेणी का है। गाँववाले इस मण्डल को हन्नाहन्नी कहते हैं और जाड़े की रात में इसकी स्थिति से समय का पता लगाते हैं। आग्रहायण मण्डल के दक्खिन कई तारे मंद ज्योति के हैं जिनसे शशक का आकार बना हुआ जान पड़ता है। इसीलिए इनको शशक (Leporis) कह सकते हैं। आग्रहायण के ऊपर कुछ उत्तर हटकर रोहिणी नक्षत्र है जिसका नीचे वाला तारा प्रथम श्रेणी का कुछ कुछ लाल रंग का है। इसी रंग के कारण इसका नाम रोहिणी पड़ा। रोहिणी नक्षत्र के ५ तारों से जो आकार बनता है वह अङ्गरेजी के (V) अक्षर के सदृश होता है। रोहिणी नक्षत्र के उत्तर प्रजापति मंडल और ऊपर कुछ उत्तर की ओर कृत्तिका पुंज है जिसे गाँव वाले कचपचिया कहते हैं। इससे भी रात को समय जानने का काम लिया जाता है। कृत्तिका के ऊपर प्रायः शिर पर अश्विनी नक्षत्र है। जिन तारापुंजों की चर्चा इस समय की गयी है और जो इस समय पूर्व दिशा में देख पड़ते हैं जाड़े की ऋतु में रात भर दिखाई देते हैं इसलिए इनको शीतकाल के नक्षत्र (Winter constellations) कहते हैं। पूर्व-दक्षिण-इस दिशा में कोई चमकीले तारे नहीं देख पड़ते। शशक कुछ पूरब है जिसकी चर्चा पहले हो चुकी है। दक्षिण-इस दिशा में क्षितिज के पास तीन तारों का पुंज है जिसे अङ्गरेजी में फीनिक्स कहते हैं। बहुत ऊपर तिमिमंडल देख पड़ता है जिसका मुंह ह्वेल मछली के आकार का नीचे की ओर लटका हुआ और फैला हुआ जान पड़ता है। इसके तारे सभी धीमी ज्योति के हैं। दक्षिण-पच्छिम-इस दिशा में इस समय सारस और कुम्भज या दूसरा अगस्त देख पड़ते हैं। दूसरे की चर्चा पहले की जा चुकी है। पच्छिम-दक्षिण और पच्छिम दिशाओं के बीच क्षितिज के पास मकर राशि के मन्द मन्द तारे फैले हुए हैं। इनके ऊपर कुम्भ राशि के तारे भी देख पड़ते हैं। पच्छिम-इस दिशा में क्षितिज के पास ही श्रवण नक्षत्र के तारे देख पड़ते हैं। श्रवण के ऊपर कुछ उत्तर हटकर धनिष्ठा के तारे हैं। श्रवण के बहुत ऊपर पूर्वा भाद्रपद और उत्तरा भाद्रपद के तारे हैं जिनका वर्गाकार भी बहुत ही साफ-साफ देख पड़ता है। वर्गाकार क्षेत्र के नीचेवाली भुज के दो तारे पूर्वाभाद्रपद और ऊपर वाले भुज के दो तारे उत्तरा भाद्रपद के तारे कहलाते हैं।