भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 677

नवम अध्याय उदयास्ताधिकार (संक्षिप्त वर्णन) [ १ श्लोक-सूर्य के निकट आ जाने के कारण ग्रहों और नक्षत्रों के अदृश्य होने का विचार । २-३ श्लोक-ग्रहों के उदय और अस्त होने की दिशा । ४-५ श्लोक-ग्रहों का कालांश जानने की रीति । ६-६ श्लोक-- ग्रहों के परम कालांश । १०-११ श्लोक-यह जानने की रीति कि किसी इष्टकाल में उदय या अस्त होने को कितने दिन शेष हैं या बीत गये हैं । १२-१५ श्लोक-किस तारे का क्या परम कालांश है । १६-१७ श्लोक-तारे के दृश्य या लोप होने के दिन को जानने की रीति । १८ श्लोक-उन तारों के नाम जो कभी अदृश्य नहीं होते ] इस अध्याय में यह बतलाया गया है कि ग्रहों और तारों का उदय और अस्त कब होता है और कैसे जाना जाता है । यहाँ उदय और अस्त के अर्थ साधारण उदय और अस्त के अर्थों से भिन्न हैं। साधारणतः जब सूर्य, चन्द्रमा इत्यादि पूर्व क्षितिज के ऊपर आ जाते हैं तब इनका उदय समझा जाता है और जब ये पच्छिम क्षितिज के नीचे चले जाते हैं तब इनका अस्त समझा जाता है। यह पृथ्वी की दैनिक गति के कारण होता है जिसे पुराने आचार्य प्रवह-गति कहते थे । इसके सिवा जब ग्रह चन्द्रमा या तारे सूर्य के बहुत पास हो जाते हैं जिससे वे सूर्योदय के लगभग पूर्व क्षितिज के ऊपर आते हैं और सूर्यास्त के लगभग पच्छिम क्षितिज के नीचे चले जाते हैं तब भी वे अस्त कहे जाते हैं। ऐसी दशा में वे सूर्य के तीव्र प्रकाश के कारण देखे नहीं जा सकते । जिस समय वे सूर्य के निकट आने के कारण अदृश्य हो जाते हैं उस समय से वे अस्त समझे जाते हैं और जिस समय वे सूर्य से इतनी दूर हो जाते हैं कि सूर्योदय के कुछ पहले या सूर्यास्त के कुछ पीछे देख पड़ने लगते हैं उस समय उनका उदय समझा जाता है। इस अधिकार में इसी प्रकार के उदय अस्त की बातें बतलायी गयी हैं । पाश्चात्य ज्योतिषी इसको heliacal rising and setting कहते हैं । अध्याय का प्रयोजन- अथोदयास्तमययोः परिज्ञानं प्रकीर्त्यते । दिवाकरकराक्रान्त मूर्तीनामल्पतेजसाम् ॥१॥