सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५४ सूर्य-सिद्धान्त बढ़ जाता है और इनका भोगांश सूर्य के भोगांश से कम हो जाता है तब ये फिर पूर्व में सूर्योदय के कुछ पहले दिखलाई पड़ने लगते हैं । इसलिए कहा जाता है कि पूर्व में इनका उदय होता है । जब वक्री बुध और शुक्र के भोगांश सूर्य के भोगांश से अधिक होते हैं तब ये सूर्यास्त के उपरान्त पश्चिम क्षितिज में देख पड़ते हैं और वहीं अदृश्य हो जाते हैं । कुछ दिन में ये ग्रह अपनी वक्र गति के कारण सूर्य की दूसरी ओर बहुत शीघ्र चले जाते हैं और इनके भोगांश सूर्य के भोगांश से कम हो जाते हैं । ऐसी दशा में ये सूर्योदय के पहले पूर्व क्षितिज में फिर दीखने लगते हैं । इसलिए कहा जाता है कि वक्री बुध और शुक्र भी पश्चिम में अस्त और पूर्व में उदय होते हैं । परन्तु चन्द्रमा तथा मार्गी बुध और शुक्र की गति सूर्य की गति से अधिक होती है इसलिए जब ये सूर्य की ओर बढ़ते हुए उसके पास इतना पहुँच जाते हैं कि अदृश्य हो जाते हैं तब इनके भोगांश सूर्य के भोगांश से कम होते हैं और ये पूर्व क्षितिज में ही सूर्योदय के पहले अदृश्य होते हैं । इसलिए कहा जाता है कि ये पूर्व में अस्त होते हैं । जब ये सूर्य के आगे बढ़ जाते हैं तब इनके भोगांश सूर्य के भोगांश से अधिक हो जाते हैं और सूर्यास्त के उपरान्त पश्चिम क्षितिज में दीखने लगते हैं । इसलिए कहा जाता है कि चन्द्रमा और मार्गी बुध और शुक्र पश्चिम में उदय होते हैं । कालांश जानने की रीति— सूर्यास्तकालिकौ पश्चात्प्राच्यामुदयकालिकौ । दिवाकरग्रहौ कुर्यात् दृक्कर्मार्थं ग्रहस्य तु ॥४॥ तयोर्लग्नान्तरप्राणाः कालांशाः षष्टिभाजिताः । प्रतीच्यां षड्भयुतयोस्तद्वल्लग्नान्तरासवः ॥५॥ अनुवाद—(४) यदि पश्चिम में किसी ग्रह के उदय या अस्त होने का समय जानना हो तो अनुमान से जाने हुए दिन के सूर्यास्त काल के सूर्य और ग्रह को स्पष्ट करे और पूरब में किसी ग्रह के उदय या अस्त होने का समय जानना हो तो उस दिन के सूर्योदय-काल के सूर्य और ग्रह को स्पष्ट करे तथा ग्रह का दृक्कर्म संस्कार करे । दृक्कर्म संस्कृत ग्रह और सूर्य के उदय लग्नों के असुओं का अन्तर निकाले और इसको ६० से भाग दे तो ग्रह का पूर्व में उदय या अस्त सम्बन्धी कालांश ज्ञात होता है । यदि ग्रह का पश्चिम में उदय या अस्त सम्बन्धी कालांश जानना हो तो सूर्य और ग्रह के भोगांश में ६ राशि जोड़ने से जो आवे उनके लग्नों के असुओं के अन्तर को ६० से भाग देकर कालांश जानना चाहिए । 1