भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 680

उदयास्ताधिकार ६५५

विज्ञान भाष्य—सूर्य के उदय होने से जितने समय पहले कोई ग्रह पूर्व क्षितिज में आता है अर्थात् उदय होता है उस समय को उस ग्रह का कालान्तर कहते हैं। लग्न काल की गणना सूक्ष्मता के लिए असुओं में की जाती है और विषुवद्-वृत्त की एक कला का उदय एक असु में होता है। इसलिए ६० काल का उदय ६० असुओं में होता है परन्तु ६० कला एक अंश के समान है। इसलिए सूर्य और ग्रह के उदय-कालों के अन्तर को जो प्रायः असुओं में होता है और जिसे ५ वें श्लोक में लग्नान्तर-प्राण या लग्नान्तरासु कहा गया है ६० से भाग देने पर जो आता है उसको अंशों में समझ लेना चाहिए, इसी को ग्रह का कालांश कहते हैं। पृष्ठ ५६१ में बतलाया गया है कि यह जानने के लिए कि ग्रह किस समय क्षितिज में लग्न होता है इसके स्पष्ट भोगांश में आक्ष और आयन दृक्कर्म संस्कार करना चाहिए क्योंकि स्पष्टाधिकार के अनुसार ग्रह का जो भोगांश आता है उससे तो केवल यह मालूम होता है कि ग्रह अपनी कक्षा में कहाँ है। परन्तु ग्रह की कक्षा क्रान्ति-वृत्त से भिन्न होती है इसलिए जिस समय ग्रह का क्रान्तिवृत्त वाला विन्दु क्षितिज पर आता है उस समय ग्रह का बिम्ब क्षितिज पर नहीं वरन् अपने शर के अनुसार कुछ आगे या पीछे उदय होता है (देखो चित्र १०७, १०८) जिसका ज्ञान दृक्कर्म संस्कार से ही होता है। इसीलिए चौथे श्लोक में पहले दृक्कर्म संस्कार आदि करने को कहा गया है। दृक्कर्म संस्कार करने पर जब ग्रह के क्षितिज पर का समय ठीक ठीक ज्ञात हो जाय तभी यह जाना जा सकता है कि सूर्योदय से कितना पहले वह ग्रह पूर्व क्षितिज में लग्न होता है। परन्तु जब ग्रह का उदय या अस्त पश्चिम में होता है तब सूर्यास्तकालिक सूर्य और ग्रह का समय स्पष्ट किया जाता है क्योंकि तब यह जानने की आवश्यकता पड़ती है कि सूर्यास्त से कितने समय पीछे ग्रह का अस्त होता है। इस काम के लिए भी ग्रह में दृक्कर्म संस्कार की आवश्यकता पड़ती है जैसा कि उदय लग्न के समय की जाती है। अब दृक्कर्म संस्कृत ग्रह अथवा भास्कराचार्यजी के शब्दों में दृग्ग्रह और सूर्य के अस्तलग्नासुओं का अन्तर जानना चाहिए अर्थात् यह देखना चाहिए कि जिस समय सूर्य अस्त होता है उस समय से कितने असु उपरान्त इष्ट ग्रह का बिम्ब पश्चिम क्षितिज पर आता है। इन असुओं को ६० से भाग देने पर अस्त समय के कालांश अथवा अस्तांश का ज्ञान हो जाता है। परन्तु ५वें श्लोक के उत्तरार्ध में बतलाया गया है कि अस्तकालिक सूर्य और दृग्ग्रह के भोगांशों में ६ राशि या १८० अंश जोड़ कर दोनों के लग्नासुओं का अन्तर निकाले। इसका कारण यह है कि जिस समय सूर्य अस्त होता रहता है उस समय पूर्व क्षितिज में क्रान्तिवृत्त का वह विन्दु लग्न