सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउदयास्ताधिकार ६६३ यहाँ तक तो यह बतलाया गया कि ग्रहों का उदय अस्त जानने के लिए कालांश जानने की प्राचीन रीति में ही स्थूलता है। अब यह बतला देना भी आवश्यक है कि यहाँ के परम कालांश के परिमाण में भी आजकल कितना मतभेद है। उदाहरण के लिये हम इसी वर्ष के गुरु और शुक्र के उदय अस्त के कालों को लेकर पिछले पृष्ठ पर दिखला चुके हैं कि किसने कितना परम कालांश माना है। इस कोष्ठक से यह स्पष्ट है कि काशी के दोनों पंचांगों के अनुसार शुक्रास्त और शुक्रोदय के दिन एक हैं परन्तु गुरु के अस्तकाल के दिन में एक दिन का अन्तर है। इसी प्रकार औंध के शास्त्रशुद्ध ऐक्यवर्द्धक पंचांग, बागलकोट के केतकी पंचांग और पूना के चित्रशाला पंचांग में शुक्र तथा गुरु के उदय और अस्त के दिन एक हैं। इससे जान पड़ता है कि काशी के पंचांगवालों ने इन ग्रहों के परम कालांश एकमत से कुछ माना है और महाराष्ट्र के तीन पंचागवालों ने एकमत होकर कुछ माना है। काशी के विश्वपंचांग से यह सिद्ध होता है कि इसमें ग्रहों का उदय अस्त १६२८ ई० के नाविक पंचांग के आधार पर स्थिर किया गया है। केतकी पंचांग ज्योतिर्गणित के अनुसार बनाया गया है जो अर्वाचीन ज्योतिष सिद्धान्त से मिलता-जुलता है इसलिए यह सहज ही जाना जा सकता है कि आचार्य केतकर तथा इनके अनुयायियों ने गुरु और शुक्र के परमकालांश क्या माना है। अब हम १६२८ ई० के नाविक पंचांग से शुक्र के उदय और अस्त काल के दिन के सूर्य और शुक्र के विषुवांश और क्रान्ति से परमकालांश जानने की रीति लिखते हैं:— तारीख | सूर्य का विषुवांश | सूर्य की क्रान्ति | शुक्र का विषुवांश | शुक्र की क्रान्ति | घंटा मिनट | अंश कला | घंटा मिनट | अंश कला | सेकंड | विकला | सेकंड | विकला २६ मई | ४ २४ १६.५६ | २१ ३७ ३७.६ | ३ ४७ २.६७ | १६ १२ १६.४ ३० जुलाई | ८ ३७ ४६.८६ | १८ ३१ ८.८ | ६ ११ ३७.२६ | १७ ३७ ६.१ ६ जून | ४ ५७ ३.३२ | २२ ३६ ३८.२ | ४ २७ ५४.५६ | २१ २० १८.७ २८ जुलाई | ८ २६ ५७.३८ | १९ ५६ ३२.७ | ६ १ ३६.६ | १८ १८ ६.५