सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतारे से २.५११६ × २.५११६ = ६.३०६६. गुना चमकीला होता है इत्यादि । यह तो हुई उन तारों की बात जिन्हें तेज आँख वाले बिना किसी यन्त्र की सहायता के देख सकते हैं। दूरदर्शक यन्त्र से १५वीं श्रेणी तक के तारे देखे गये हैं। यहाँ तक बतला देना आवश्यक है कि जो तारे एक श्रेणी में हैं वे भी सब समान चमक के नहीं हैं। पहली श्रेणी में जो तारे रखे गये हैं उनकी संख्या २० से अधिक नहीं हैं परन्तु इनमें सबसे अधिक चमकीला लुब्धक है। उसके बाद अगस्त्य का नम्बर आता है। इन दोनों की चमक में भी इतना अन्तर है कि कोई भी सहज ही देख सकता है। इसलिए अधिक सूक्ष्म गणना करने के लिए प्रत्येक श्रेणी में दस और विभाग किये गये हैं। यह तो प्रकट है कि तारे की चमक जितनी ही अधिक है उसकी श्रेणी की क्रम संख्या उतनी ही छोटी है इसलिए प्रथम श्रेणी के सबसे चमकीले तारे लुब्धक की श्रेणी ऋणात्मक और — १.४ है और इसकी चमक ६.१ मानी गयी है। श्रेणी और चमक का सम्बन्ध नीचे की सारणी १ से सहज ही समझ में आ सकता है:—
६ठीं श्रेणी के तारे की चमक = १ ५वीं ,, ,, ,, = २.५ गुनी ४थी ,, ,, ,, = ६.३ ,, ३री ,, ,, ,, = १५.८ ,, २री ,, ,, ,, = ३६.६ ,, १ली श्रेणी के तारे की चमक = १०० गुनी १ली श्रेणी के सबसे चमकीले तारे लुब्धक की चमक } = ४०० ,, सूर्य की चमक = २४०००००००००० गुनी
किसी तारे की चमक सदैव एकसी नहीं रहती इसलिए पुरानी और नयी पुस्तकों में प्रथम श्रेणी के २० तारों के क्रम में भी दो-चार जगह भिन्नता हो गयी है । इस भिन्नता का कारण यह भी है कि चमक परखने की कसौटी भी पहले कुछ स्थूल थी और अब सूक्ष्म हो गयी है। इस बात का पता अगले पृष्ठ की सारणी २ से चलेगा :—
१. सर नारमन लाकयर के (Elementary Lessons in Astronomy) पृष्ठ १० से उद्धृत । २. देखो The Twentieth Century Atlas of Popular Astronomy by Heath, Second edition pp. 112