सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७४ सूर्य-सिद्धान्त हस्तश्रवण फाल्गुन्यौ धनिष्ठा रोहिणी मघाः । चतुर्दशांशकैर्दृश्या विशाखाऽश्विनिदैवतम् ॥१३॥ कृत्तिकामैत्रमूलानि सार्परौद्रक्षमेय च । दृश्यन्ते पञ्चदशभिराषाढाद्वितयं तथा ॥१४॥ भरणीतिष्यसौम्यानि सौक्ष्म्यात्त्रिस्सप्तकांशकैः । शेषाणि सप्तदशभिस्तथा दृश्यानि भानि तु ॥१५॥ अनुवाद—(१२) स्वाती, अगस्त्य, मृगव्याध या लुब्धक, चित्रा, ज्येष्ठा, पुनर्वसु, अभिजित्, ब्रह्महृदय तारों के परम कालांश १३ हैं । (१३) हस्त, श्रवण, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, धनिष्ठा, रोहिणी, मघा, विशाखा और अश्विनी के परम कालांश १४ हैं। (१४) कृत्तिका, अनुराधा, मूल, आश्लेषा, आर्द्रा, पूर्वाषाढ़, और उत्तराषाढ़ नक्षत्रों के परम कालांश १५ हैं। (१५) सूक्ष्म होने के कारण भरणी, पुष्य और मृगशिरा के परम कालांश २१ हैं। इससे अधिक होने पर वे दृश्य और कम होने पर अदृश्य होते हैं। शेष नक्षत्रों के परम कालांश १७ हैं । विज्ञात भाष्य—१५ वें श्लोक में जिन शेष नक्षत्रों के लिए संकेत है वे वही हैं जिनकी चर्चा नक्षत्र ग्रहयुत्यधिकार में हुई है परन्तु जिनके नाम यहाँ नहीं दिये गये हैं। तारों के इन कालांशों से यह भी प्रगट होता है कि हमारे आचार्यों के मत से कौन तारा चमक में किस श्रेणी का है। चमक में प्रथम श्रेणी के तारे १२वें श्लोक में दिये गये हैं जिनके कालांश १३ हैं। दूसरी श्रेणी में वे तारे आते हैं जो १३वें श्लोक में दिये गये हैं और जिनके कालांश १४ हैं। तीसरी श्रेणी के तारे १४वें श्लोकमें लिखे गये हैं जिसके कालांश १५ हैं। इनके सिवा १५वें श्लोक में जो तारे आये हैं उनकी श्रेणी का ठीक ठीक पता नहीं लगाया जा सकता । आजकल चमक के अनुसार तारों का विभाग बहुत ही सूक्ष्मरीति से किया जाता है। अँधेरी रात में बिना किसी यन्त्र की सहायता के तेज आँखवाले मनुष्य सारे आकाश में जितने तारे देख सकते हैं उनकी संख्या ६००० से अधिक नहीं है । इन ६ हजार तारों को ६ श्रेणियों (magnitudes) में विभक्त किया गया है । इन श्रेणियों का विभाग इस प्रकार किया गया है कि प्रथम श्रेणी का कोई विशेष तारा छठी श्रेणी के किसी विशेष तारे से चमक में १०० गुना होता है। इससे यह फल निकलता है कि किसी श्रेणी का तारा अपने नीचे वाली श्रेणी के तारे से २.५११६ गुना चमकीला होता है अर्थात् १ली श्रेणी का तारा २री श्रेणी के तारे से २.५११६ गुना चमकीला होता है, दूसरी श्रेणी वाला तारा तीसरी श्रेणी वाले तारे से २.५११६ गुना चमकीला होता है परन्तु पहली श्रेणी वाला तारा तीसरी श्रेणी वाले