भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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उदयस्ताधिकार ६७३ इसको कालगति कहा गया है क्योंकि इससे काल का पता सहज ही लग जाता है। बीजगणित की भाषा में १०-११ श्लोकों के नियम को इस प्रकार लिखा जा सकता है :- इष्ट दिन का ग्रह का कालांश ∾ ग्रह का परमकालांश = कालांशान्तर (१) किसी ग्रह की दैनिक कालगति = ग्रह की दैनिक गति × ग्रह की राशि के लग्नासु १८०० (२) गत या गम्य दिनों की संख्या कालांशान्तर = ────────────────────────── (३) सूर्य की कालगति ∾ ग्रह की कालगति यदि ग्रह वक्री हो तो अन्तिम समीकरण में धन का चिह्न रखना चाहिए, नहीं तो दोनों अन्तर का निकालना चाहिए। यहाँ ऋण के चिह्न की जगह अंतर का चिह्न अधिक युक्तियुक्त है क्योंकि किसी ग्रह की कालगति सूर्य की कालगति से अधिक होती है और किसी की कम। ग्रह की कालगति जानने का जो नियम दिया गया है वह कुछ स्थूल है। इसका कारण यह है कि ग्रह की गति क्रान्तिवृत्त पर नहीं होती वरन् अपने कक्षावृत्त पर होती है जो क्रान्तिवृत्त से कुछ भिन्न है परन्तु इससे विशेष हानि नहीं है। यदि ग्रह का विषुवांश और क्रान्ति मालूम कर ली जांय तो विषुवांश में प्रतिदिन का जो अन्तर होता है वही कालगति होती है। विषुवांश जान लेने पर ग्रह का कालांश भी सुविधा और शुद्धतापूर्वक जाना जा सकता है क्योंकि फिर दृक्कर्म की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। इसलिए मेरी सम्मति में ग्रहों या तारों का उदय अस्त और युति की गणना करने के लिए ग्रहों या तारों के भोगांश की जगह विषुवांश के ज्ञान की अधिक आवश्यकता है जिसकी शुद्ध शुद्ध जानकारी अर्वाचीन ज्योतिष सिद्धान्त और यन्त्रों की सहायता से ही हो सकती है। इस बात के लिए आवश्यकता है एक वेधशाला की, जहाँ हमारे ज्योतिषी ग्रहों और तारों का वेध करके इनके स्थानों और मूलांकों का ठीक-ठीक पता लगा सकें। तारों के परम कालांश स्वाथ्यगस्त्यमृगव्याध चित्रा ज्येष्ठाः पुनर्वसुः । अभिजित् ब्रह्महृदयं त्रयोदशभिरंशकैः ॥१२॥ ∾ यह अन्तर का चिन्ह है और सूचित करता है कि इसके दाहिने बायें की संख्याओं में जो बड़ी हो उससे छोटी को घटाना चाहिये।