भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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६७२ सूर्य-सिद्धान्त या अस्त होने को कितने दिन हैं या उदय अथवा अस्त होने के उपरान्त कितने दिन बीत गये हैं तो उस दिन का ग्रह का कालांश ४-५ श्लोकों के अनुसार जान लेना चाहिए जिससे यह मालूम हो जाता है कि ग्रह सूर्योदय से कितने पहले उदय होता है या सूर्यास्त से कितना पीछे अस्त होता है । यदि यह कालांश परमकालांश से अधिक तथा सूर्य का भोगांश ग्रह के भोगांश से अधिक हुआ—और यह ग्रह मार्गी बुध या शुक्र है तो समझ लेना चाहिये कि अभी इसके अस्त होने में कुछ दिन शेष हैं परन्तु यदि यह ग्रह मङ्गल, गुरु या शनि अथवा वक्री बुध या शुक्र है तो समझना चाहिए कि इसके उदय हुए कुछ दिन बीत गये हैं । परन्तु यदि कालांश अधिक तथा सूर्य का भोगांश ग्रह के भोगांश से कम हुआ और ग्रह मङ्गल, गुरु या शनि अथवा वक्री बुध या शुक्र है तो समझना चाहिए कि अभी इनके अस्त होने में कुछ दिन शेष हैं । इसके विपरीत यदि कालांश परमकालांश से कम तथा सूर्य का भोगांश ग्रह के भोगांश से अधिक हुआ—तो समझना चाहिए कि मार्गी बुध या शुक्र के अस्त हुए कुछ दिन बीत गये और मङ्गल, गुरु या शनि तथा वक्री बुध या शुक्र के उदय होने में कुछ दिन शेष हैं । परन्तु यदि सूर्य का भोगांश भी ग्रह के भोगांश से कम हुआ तो समझना चाहिए कि मार्गी बुध और शुक्र के उदय होने में कुछ दिन शेष हैं तथा मङ्गल, गुरु, शनि और वक्री बुध या शुक्र के अस्त हुए कुछ दिन बीत गये हैं । सब दशाओं में इन दिनों की संख्या जानने के लिए कालांश और परमकालांश का अन्तर निकालना चाहिए और देखना चाहिए कि यह अन्तर कितने दिन में घट कर शून्य हो जायगा वा शून्य बढ़ते बढ़ते इतना हुआ है । ऐसा करने के लिए इस अन्तर को सूर्य और इष्ट ग्रह की दैनिक गतियों के अन्तर से भाग देना चाहिए यदि ग्रह मार्गी हो परन्तु यदि वक्री हो तो इनकी दैनिक गतियों को जोड़ लेना चाहिए जैसा कि ग्रहयुत्यधिकार में बतलाया गया है । परन्तु सूर्य या ग्रह की दैनिक गति साधारणतः क्रान्तिवृत्तीय होती है और कालांश विषुवद्- वृत्तीय होता है इसीलिए क्रान्तिवृत्तीय दैनिक गतियों को विषुवद्वृत्तीय में बदलने के लिए ११ वें श्लोक में बतलाया गया है कि सूर्य या ग्रह जिस राशि में हो उसके लग्नासुओं को सूर्य या ग्रह की दैनिक गति से गुणा करके १८०० से भाग देना चाहिए क्योंकि राशि के उदय होने का समय उसके लग्नासुओं के समान होता है इसलिए ग्रह की जितनी दैनिक गति होती है उसके उदय होने का समय भी उसी अनुपात से समझना चाहिए । दैनिक गति छोटी होने के कारण साधारणतः कलाओं में लिखी जाती है इसीलिए एक राशि को भी १८०० कलाओं में लिखा जाता है इससे ग्रह की जो दैनिक गति आती है वह विषुवद्वृत्तीय हो जाती है इसीलिए