सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रृङ्गोन्नत्यधिकार ६८३ में जोड़ कर इनका लग्नान्तर काल पहले की तरह फिर निकाले । ( ४ ) इस प्रकार कई बार करने से लग्नान्तर काल स्थिर हो जाता है। इतने ही समय पर शुक्ल पक्ष में सूर्यास्त के उपरान्त चन्द्रमा का अस्त होता है। विज्ञान भाष्य—किसी किसी ग्रन्थ में इन तीन श्लोकों के स्थान में केवल एक श्लोक है जिसका पूर्वार्ध दूसरे श्लोक का पूर्वार्ध है और उत्तरार्ध चौथे श्लोक का उत्तरार्ध । इसलिए किसी किसी के मत से दूसरे श्लोक के उत्तरार्ध से लेकर चौथे श्लोक के पूर्वार्ध तक की ४ पंक्तियां प्रक्षिप्त हैं। पं० इन्द्र नारायण द्विवेदी, पं० माधव पुरोहित अथवा पं० बलदेव प्रसाद मिश्र जी ने इन चार पंक्तियों को लिख तो दिया है परन्तु इनका अर्थ नहीं किया है और न इनके विषय में कुछ लिखा ही है। हाँ, आचार्य रङ्गनाथ जी की संस्कृत टीका में, जिसका सम्पादन भी पं० बलदेव प्रसाद जी ने अपनी हिन्दी टीका के साथ किया है, इसकी चर्चा अच्छी तरह है जहाँ लिखा है¹— १. श्लोक मध्य एकराशावित्यादि रवीन्दोरित्यन्त रासव इत्यन्त श्लोक द्वयं केनचिन्मन्दमतिना समयोऽसकृदेव साध्य इति शिष्यधीवृद्धिद तन्वोक्तं सुबुद्धि मन्ये- नायुक्तमपि युक्तं मत्वानिक्षिप्तम् । स्वामी विज्ञानानन्द सम्पादित बंगाल के सूर्य-सिद्धान्त में ये दो श्लोक मूल संस्कृत श्लोकों के साथ नहीं दिये गये हैं वरन् बङ्गला की टीका में हैं और वहाँ बतलाया गया है कि ये प्रक्षिप्त क्यों हैं। चन्द्रशेखर सिंह सामन्त के सिद्धान्त-दर्पण में तीसरा श्लोक ज्यों का त्यों उद्धृत² किया गया है और चौथे श्लोक के पूर्वार्ध के अर्थ को कई श्लोकों में विस्तारपूर्वक लिखकर उत्तरार्ध भी दे दिया गया है। इसके उपरान्त यह श्लोक³ लिखा गया है— अत्रार्कं साबनत्वं हि द्वयोस्तात्कालिकी कृतौ तत्कृतौ केवलस्येन्दोः प्राणानामाक्षंता मता सूर्यास्तकालिकौ तौ चेद्ग्राह्यो ते चंद्रसावना ॥११॥ जिससे यह सिद्ध होता है कि चन्द्र शेखरसिंह सामन्त ने सूर्य-सिद्धान्त के प्रक्षिप्त कहे जाने वाले श्लोकों के डेढ़ श्लोकों को बहुत आवश्यक समझा है। यथार्थ में यह है भी आवश्यक जैसा कि अभी दिखलाया जायगा। इसलिए मेरी समझ में इसको
१. श्री सूर्यसिद्धान्त पृष्ठ १६७ श्री वेंकटेश्वर प्रेस का छपा २. देखो योगेशचन्द्र राय सम्पादित सिद्धान्त-दर्पण पृष्ठ १३३ ३. ,, ,, ,, १३४ श्लोक १०,११