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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

श्रृङ्गोन्नत्यधिकार ६८३ में जोड़ कर इनका लग्नान्तर काल पहले की तरह फिर निकाले । ( ४ ) इस प्रकार कई बार करने से लग्नान्तर काल स्थिर हो जाता है। इतने ही समय पर शुक्ल पक्ष में सूर्यास्त के उपरान्त चन्द्रमा का अस्त होता है। विज्ञान भाष्य—किसी किसी ग्रन्थ में इन तीन श्लोकों के स्थान में केवल एक श्लोक है जिसका पूर्वार्ध दूसरे श्लोक का पूर्वार्ध है और उत्तरार्ध चौथे श्लोक का उत्तरार्ध । इसलिए किसी किसी के मत से दूसरे श्लोक के उत्तरार्ध से लेकर चौथे श्लोक के पूर्वार्ध तक की ४ पंक्तियां प्रक्षिप्त हैं। पं० इन्द्र नारायण द्विवेदी, पं० माधव पुरोहित अथवा पं० बलदेव प्रसाद मिश्र जी ने इन चार पंक्तियों को लिख तो दिया है परन्तु इनका अर्थ नहीं किया है और न इनके विषय में कुछ लिखा ही है। हाँ, आचार्य रङ्गनाथ जी की संस्कृत टीका में, जिसका सम्पादन भी पं० बलदेव प्रसाद जी ने अपनी हिन्दी टीका के साथ किया है, इसकी चर्चा अच्छी तरह है जहाँ लिखा है¹— १. श्लोक मध्य एकराशावित्यादि रवीन्दोरित्यन्त रासव इत्यन्त श्लोक द्वयं केनचिन्मन्दमतिना समयोऽसकृदेव साध्य इति शिष्यधीवृद्धिद तन्वोक्तं सुबुद्धि मन्ये- नायुक्तमपि युक्तं मत्वानिक्षिप्तम् । स्वामी विज्ञानानन्द सम्पादित बंगाल के सूर्य-सिद्धान्त में ये दो श्लोक मूल संस्कृत श्लोकों के साथ नहीं दिये गये हैं वरन् बङ्गला की टीका में हैं और वहाँ बतलाया गया है कि ये प्रक्षिप्त क्यों हैं। चन्द्रशेखर सिंह सामन्त के सिद्धान्त-दर्पण में तीसरा श्लोक ज्यों का त्यों उद्धृत² किया गया है और चौथे श्लोक के पूर्वार्ध के अर्थ को कई श्लोकों में विस्तारपूर्वक लिखकर उत्तरार्ध भी दे दिया गया है। इसके उपरान्त यह श्लोक³ लिखा गया है— अत्रार्कं साबनत्वं हि द्वयोस्तात्कालिकी कृतौ तत्कृतौ केवलस्येन्दोः प्राणानामाक्षंता मता सूर्यास्तकालिकौ तौ चेद्ग्राह्यो ते चंद्रसावना ॥११॥ जिससे यह सिद्ध होता है कि चन्द्र शेखरसिंह सामन्त ने सूर्य-सिद्धान्त के प्रक्षिप्त कहे जाने वाले श्लोकों के डेढ़ श्लोकों को बहुत आवश्यक समझा है। यथार्थ में यह है भी आवश्यक जैसा कि अभी दिखलाया जायगा। इसलिए मेरी समझ में इसको


१. श्री सूर्यसिद्धान्त पृष्ठ १६७ श्री वेंकटेश्वर प्रेस का छपा २. देखो योगेशचन्द्र राय सम्पादित सिद्धान्त-दर्पण पृष्ठ १३३ ३. ,, ,, ,, १३४ श्लोक १०,११

६८४ सूर्य-सिद्धान्त प्रक्षिप्त कह कर उड़ा देना और इसका अर्थ ही न करना उचित नहीं है क्योंकि यदि यह प्रक्षिप्त हो तो भी अनुचित नहीं है क्योंकि इसके अनुसार गणना न करने से तो चन्द्रमा के अस्त काल में १ घड़ी या २४ मिनट तक का अन्तर पड़ सकता है। आचार्य रङ्गनाथजी ने अपनी टीका १५२५ शाके १ में की थी इसलिए यह विवाद कई सौ वर्ष पहले का है कि यह प्रक्षिप्त है या नहीं । मैं यह बतलाना चाहता हूँ कि इन श्लोकों का क्या अर्थ है । श्लोक २ के पूर्वार्ध में तो संक्षेप में उदयास्ताधिकार के चौथे और पाँचवें श्लोकों में बतलाये गये नियम की ओर संकेत है जो बिल- कुल ठीक है । उत्तरार्ध में यह बतलाया गया है कि यदि सूर्य और चन्द्रमा एक ही राशि में हों तो इन दोनों के दृक्कर्म-संस्कृत-भोगांशों के अन्तर को ही कलांश समझ कर जान लेना चाहिए कि सूर्यास्त के उपरांत कितने समय पर चन्द्रमा का अस्त होगा । इसका कारण यह जान पड़ता है कि जब चन्द्रमा सूर्य से इतने थोड़े अन्तर पर रहता है कि ये दोनों एक ही राशि में हों तब इनके लग्नान्तरासुओं में जो अन्तर होता है वह इनके भोगांशों के अंतर से बहुत भिन्न नहीं होता इसलिए सुगमता के लिए यह स्थूल नियम बतला दिया गया है । इसके बाद श्लोक ३ में असकृत्कर्म (approximation) से चन्द्रमा का अस्त- काल सूक्ष्मतापूर्वक जानने की रीति बतलायी गयी है । इसका कारण यह है कि दूसरे श्लोक के पूर्वार्ध के अनुसार चन्द्रमा के अस्तकाल का जो समय आता है वह ठीक नहीं होता क्योंकि चन्द्रमा की गति बहुत तीव्र होती है इसलिए सूर्य के अस्तकाल में चन्द्रमा का जो भोगांश होता है उससे चन्द्रमा के अस्तकाल का भोगांश कुछ बढ़ जाता है जिससे वह कुछ देर में अस्त होता है । सूर्य से चन्द्रमा जितना ही अधिक दूर रहता है उसीके अनुपात में चन्द्रमा के अस्त होने में बिलम्ब लगता है । शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी या चतुर्दशी के दिन तो यह बिलम्ब २० मिनट के लगभग हो जाता है क्योंकि इस दिन सूर्यास्त से १०, ११ घण्टे से भी अधिक समय में चन्द्रमा का अस्त होता है और इतने समय में इसकी गति ५, ६ अंश के लगभग होती है जिससे इसके अस्त होने में २० से २४ मिनट तक का विलम्ब हो सकता है । यही जानने के लिए कहा गया है कि सूर्य और चन्द्रमा में ६ राशि जोड़ने से जो लग्नान्तरासु आवे उसकी घटिका बनाकर अर्थात् असुओं को ६ से भाग देकर पल और पलों को ६० से भाग देकर घड़ी बनाकर इसको सूर्य और चन्द्रमा की दैनिक गतियों से गुणा कर दे और गुणनफल को ६० से भाग दे दे तो यह मालूम हो जायगा कि लग्नान्तरासुओं में सूर्य और चन्द्रमा में कितनी गति हुई । क्योंकि जब ६० घड़ी में सूर्य और चन्द्रमा की १. देखो बेंकटेश्वर प्रेस का सूर्य-सिद्धान्त पृष्ठ २४६

शृङ्गोन्नत्यधिकार ६८५ गति दैनिक गति के समान होती है तो लग्नान्तरासुओं में इसी के अनुपात से होगी । यह गति जान लेने पर इसे सूर्यास्तकालिक सूर्य और चन्द्रमा के भोगांश में जोड़कर और योगफल में ६ राशि और जोड़कर इनके लग्नों के अन्तरासु फिर निकाले । इस प्रकार २, ३ बार असकृत्कर्म करने से जब अन्तर स्थिर हो जाय तब सूर्यास्त से उतने ही समय उपरान्त चन्द्रमा का अस्त होता है । यहाँ एक बात विचारणीय है । जब सूर्यास्तकाल के सूर्य और चन्द्रमा एक बार स्पष्ट कर लिये गये और पहली बार यह मालूम कर लिया गया कि सूर्यास्त काल से इतने समय उपरान्त चन्द्रमा का अस्त होगा तब इसमें और चन्द्रमा के प्रत्यक्ष अस्तकाल में जो अन्तर पड़ेगा वह केवल चन्द्रमा की गति के कारण होगा इसलिए असकृत्कर्म के लिए केवल चन्द्रमा की गति को सूर्यास्तकालिक चन्द्रमा के भोगांश में जोड़ना चाहिए न कि सूर्य की गति को भी । परन्तु नियम में सूर्य और चन्द्रमा दोनों की गतियों को जोड़ने को कहा गया है । सूर्य की गति को भी जोड़ने से जो समय आवेगा वह नाक्षत्र-काल नहीं होगा वरन् सावन काल होगा । परन्तु पहला अन्तर नाक्षत्र काल में आता है इसलिए नाक्षत्र काल और सावन काल का योग नहीं हो सकता । इसलिए उचित यह है कि केवल चन्द्रमा की गति का असकृत्कर्म किया जाय परन्तु सूर्य की गति लेने से अधिक से अधिक अन्तर २ मिनट का हो सकता है क्योंकि १२ घण्टे का नाक्षत्र काल १२ घण्टे के सावन काल से केवल २ मिनट अधिक होता है । इसलिए इतनी भूल के लिए नियम को ही प्रक्षिप्त समझ कर निकाल देना बुद्धिमानी नहीं जान पड़ती । कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा का उदय काल जानना — भगणार्धं रवौ दत्वा कार्यास्तद्विवरासवः । तैः प्राणैः कृष्णपक्षे तु शीतांशुरुदयं व्रजेत ॥५॥ अनुवाद—(५) सूर्यास्तकालिक सूर्य के भोगांश में ६ राशि जोड़ने से जो आवे उसके लग्नकाल और सूर्यास्तकालिक स्पष्ट चन्द्रमा के लग्नकाल के अन्तरासुओं से असकृत्कर्म के द्वारा जो समय आता है सूर्यास्त से उतने ही समय उपरान्त कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा का पूर्व क्षितिज में उदय होता है । विज्ञान-भाष्य —कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा का भोगांश सूर्यास्तकालिक सूर्य के भोगांश से १८० अंश से अधिक होता है इसलिए सूर्यास्त के उपरान्त पूर्व क्षितिज में चन्द्रमा का उदय होता है । यह जानने के लिए सूर्यास्त काल के सूर्य और चन्द्रमा के भोगांश जानकर केवल सूर्य के भोगांश में ६ राशि जोड़ना चाहिए क्योंकि चन्द्रमा का

६. पाताधिकार, भूगोलाध्याय व मानोपकरणाध्याय

: ६८६ सूर्य-सिद्धान्त : उदय तो पूर्व क्षितिज में होता ही है इसलिए यह केवल यह जानने की आवश्यकता है : कि सूर्यास्तकाल में पूर्व क्षितिज में कौन राशि लग्न है और इसके उपरान्त चन्द्रमा कितने : समय में लग्न होगा । इस क्रिया से जो समय आवेगा उस समय चन्द्रमा का उदय : नहीं होगा क्योंकि इतने समय में चन्द्रमा अपनी गति से और पूर्व हो जायगा । इससे : कितना अन्तर पड़ जायगा यह जानने के लिए तीसरे श्लोक में बतलाये गये नियम से : असकृत्कर्म करना होगा । यहाँ भी केवल चन्द्रमा की गति से ही असकृत्कर्म करना : चाहिए । : सूर्यास्त काल में सूर्य से चन्द्रमा का रेखात्मक अन्तर जानने की रीति : अर्केन्द्वोः क्रान्तिविश्लेषः दिक्साध्ये युतिरन्यथा । : तज्ज्येन्दुरर्काद्यत्रासौ विज्ञेया दक्षिणोत्तरा ॥६॥ : मध्याह्नेन्दुप्रभाकर्ण संगुणा यदि सोत्तरा । : तदार्कघ्नाक्षजीवायाश्शोध्या योज्या तु दक्षिणे ॥७॥ : शेषो लम्बज्यया भक्तो लब्धं बाहुस्स्वदिङ्मुखः । : कोटिशङ्कुस्तयोर्वर्गयुतेर्मूलं श्रवो भवेत् ॥८॥ : अनुवाद—(६) सूर्यास्तकालिक सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति जानकर यदि : इनकी दिशाएँ एक हैं तो इनकी ज्याओं का अन्तर करे और भिन्न हों तो योग करे । : सूर्य से चन्द्रमा जिस दिशा में हो वही दिशा इस अंतर या योग को भी समझे अर्थात् : यदि चन्द्रमा सूर्य से दक्षिण हो तो अन्तर या योग की दिशा दक्षिण समझे और उत्तर : हो तो उत्तर समझे । (७) इस योग या अन्तर को चन्द्रमा के तात्कालिक छाया कर्ण : से गुणा कर दे । यदि दिशा उत्तर हो तो इस गुणनफल को १२ और अक्षज्या के : गुणनफल में घटा दे और दक्षिण हो तो जोड़ दे । (८) इस शेष या योगफल को : लम्बज्या से भाग दे दे और लब्धि को इष्ट दिशा का भुज समझे । चन्द्रमा के शंकु : अर्थात् नतांश-कोटिज्या को कोटि मानकर भुज और कोटि के वर्गों के योगफल का : वर्गमूल निकालने से जो आवे उसे कर्ण समझना चाहिए । यही कर्ण सूर्य और चन्द्रमा : का सूत्रात्मक या रेखात्मक अंतर है । : विज्ञान-भाष्य—इन तीन श्लोकों का सार यह है :— : यदि सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तिज्याओं का अन्तर प मान लिया जाय तो : छठें श्लोक के अनुसार : प = चन्द्र कान्तिज्या ± सूर्य क्रान्तिज्या,

शृङ्गोन्नत्यधिकार ६८७ सातवें और आठवें श्लोक के पूर्वार्ध के अनुसार प × चन्द्रछायाकर्ण ± १२ अक्षज्या भुज = ----------------------------------- लम्बज्या कोटि = चन्द्रमा का शंकु अर्थात् चन्द्रमा की नतांशकोटिज्या ∴ कर्ण = √ भुज^२ + कोटि^२ छठें श्लोक में यह बतलाया गया है कि सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तियों के अन्तर या योग की ज्या को लेकर सातवें श्लोक के अनुसार काम करना चाहिये परन्तु यह नियम तभी लागू हो सकता है जब सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तियाँ बहुत कम हों क्योंकि किसी कोण और उसकी ज्या में अन्तर तभी बहुत कम होता है जब उस कोण का मान कम हो। इसीलिये अनुवाद में क्रान्तियों के योग या अन्तर की जगह क्रान्तिज्याओं का योग या अन्तर कहा गया है। इसी तरह सातवें श्लोक के पूर्वार्ध में 'मध्याह्नेन्दुप्रभाकर्ण' कहा गया है जिसका अर्थ है मध्याह्नकालिक चन्द्रमा का छायाकर्ण, परन्तु यह युक्तियुक्त नहीं जान पड़ता इसलिए इसकी सूर्यास्तकालिक अथवा जिस समय की शृङ्गोन्नति जाननी हो उस समय का चन्द्रमा का छायाकर्ण ही समझना उचित है। स्वामी विज्ञानानन्द जी तथा आचार्य रङ्गनाथ जी ने भी इसका अर्थ यही किया है और बतलाया है कि यदि एक सूर्योदय तक से दूसरे के समय को १ दिन माना जाय तो सूर्यास्त का समय मध्याह्न कहा जा सकता है। परन्तु मध्याह्न का शब्द यहाँ भ्रमात्मक है क्योंकि मध्याह्न का साधारण अर्थ १२ बजे दिन का ही लिया जाता है। इसलिए श्लोक में मध्याह्न शब्द उचित नहीं है। उपपत्ति—सूर्यास्तकाल में सूर्य से चन्द्रमा का जो रेखात्मक अन्तर होता है उसी को यहाँ कर्ण कहा गया है और उसी को जानने की रीति बतलायी गयी है। सूर्यास्त काल में चन्द्रमा आकाश में जिस बिन्दु पर हो उसका धरातल से जो लम्बान्तर (perpendicular distance) होता है उसे ही यहाँ कोटि कहा गया है परन्तु यह भारतीय प्रथा के अनुसार उन्नतांशज्या अथवा नतांश-कोटिज्या के समान होता है और नतांश-कोटिज्या का दूसरा नाम शंकु भी है (देखो पृष्ठ २८२) इस- लिए कोटि को शंकु कहा गया है। इसी कोटि के आधारबिंदु से सूर्य का जो रेखात्मक अंतर धरातल पर होता है उसे ही भुज या बाहु कहा गया है जिसको जानने की रीति श्लोक ६, ७ और ८ के पूर्वार्ध में बतलायी गयी है। यहाँ एक बात और ध्यान में रखनी चाहिए। इस नियम से तभी काम लिया जा सकता है जब सूर्यास्तकालिक सूर्य और चन्द्रमा को यामोत्तरवृत्त के तल (plane) में समझ लिया जाय अर्थात् चन्द्रमा द्रष्टा से जिस दिशा में हो उसे दक्षिण

६८८ सूर्य-सिद्धान्त या उत्तर दिशा समझनी चाहिए और चन्द्रमा के भुज कोटि और कर्ण को भी यामोत्तरवृत्त के तल में समझना चाहिए। यह सब बातें * चित्र ११५ से अच्छी तरह समझ में आ जायगी । चित्र ११५ प = क्षितिज का पच्छिम विन्दु द = " का दक्षिण विन्दु पद = पच्छिम विन्दु से दक्षिण बिन्दु तक का क्षितिज का चतुर्थांश ख = खस्वस्तिक र रि = सूर्य के अहोरात्र वृत्त का खंड जो यामोत्तर वृत्त और पच्छिम क्षितिज के बीच में है जब कि सूर्य की क्रान्ति उत्तर होती है । रा री = सूर्य के अहोरात्रवृत्त का खंड जब क्रान्ति दक्षिण हो । रि, री = पच्छिम क्षितिज के विन्दु जहाँ सूर्य अस्त होता है । च चा = चन्द्रमा के अहोरात्र वृत्त का खंड जो यामोत्तर वृत्त और पच्छिम क्षितिज के बीच में है । विप = विषुवद्वृत्त का चतुर्थांश जो यामोत्तरवृत्त और क्षितिज के बीच है ।

  • यह चित्र स्वामी विज्ञानानन्द के बङ्गला सूर्य-सिद्धान्त से लिया गया है।

शृङ्गोन्नत्यधिकार ६८६ श = सूर्यास्तकाल का चन्द्रमा का स्थान जब कि यह यामोत्तरवृत्त से पच्छिम होता है । शक = चन्द्रमा से क्षितिज तल पर लम्ब या चंद्र-शंकु या कोटि । शरि वा शरी = सूर्य से चन्द्रमा का रेखात्मक अंतर या कर्ण । करि या करी = भुज; पट और चाठ सूर्य के अहोरात्र वृत्त पर लम्ब हैं । इस चित्र में यामोत्तर-वृत्त के तल खदप पर क्षितिज के ऊपर के खगोल का वह अंश दिखलाया गया है जो पच्छिम क्षितिज के सूर्यास्त विन्दु से लेकर दक्षिण विन्दु तक फैला हुआ है । इसीलिए चन्द्रमा का स्थान श यामोत्तर वृत्त से पच्छिम होते हुए भी यामोत्तर वृत्त पर ही जान पड़ता है और चन्द्रमा के शंकु, भुज, कर्ण यामोत्तर-वृत्त के तल पर देख पड़ते हैं । सूर्य और चन्द्रमा के अहोरात्रवृत्त तथा विषुवद्वृत्त का चतुर्थांश भी यामोत्तरवृत्त के ही तल पर दिखलाये गये हैं । संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि पद क्षितिज के दक्षिणार्ध और यामोत्तरवृत्त की छेद रेखा (Projection) है र रि और च चा इष्ट काल के सूर्य और चन्द्रमा के अहो- रात्रवृत्त हैं । रा री भी सूर्य का अहोरात्रवृत्त है जब क्रान्ति दक्षिण होती है । इस- लिए विर सूर्य की उत्तर क्रान्ति, विच चन्द्रमा की दक्षिण क्रान्ति और वि रा सूर्य की दक्षिण क्रान्ति है । खवि इष्ट स्थान का अक्षांश और विद लम्बांश है । अहोरात्र वृत्तों और क्षितिज के बीच के कोण भी लम्बांश के समान हैं । चित्र से प्रकट है कि चन्द्रकर्ण शरि² = शक² + करि² इसमें शक इष्टकालिक चन्द्रमा का शंकु है जिसकी गणना चन्द्रमा के नतकाल से त्रिप्रश्नाधिकार के पृष्ठ २६० के सूत्र (क) अथवा पृष्ठ २६२ के सूत्र (ग) के अनुसार सहज ही जाना जा सकता है और करि चंद्रमा का भुज है जिसको जानने की रीति ऊपर के ढाई श्लोकों में बतलायी गयी है । करि = रिचा + चाक, जिसमें रिचा सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तियों के अन्तर पर आश्रित है और चाक चन्द्रमा के उन्नतांश पर । समकोण त्रिभुज चाठरि में भारतीय रीति के अनुसार, चाठ / ज्या चारिठ = चारि / त्रिज्या ∵ चारि = चाठ × त्रिज्या / ज्या चारिठ परन्तु चाठ = चाड + ड ठ = चन्द्रक्रान्तिज्या + सूर्यक्रान्ति ज्या और ज्या चारिठ = लम्बज्या

६६० सूर्य-सिद्धान्त (चंद्रक्रान्तिज्या + सूर्यक्रान्तिज्या ) त्रिज्या ∴ चारि = -------------------------------------------------- लम्बज्या इसी प्रकार समकोण त्रिभुज शकचा में चाक शक ----------- = ------------ ज्या चाशक ज्या शचाक परन्तु कोण शचाक = लम्बांश और कोण चाशक लम्बांश का पूरक है इसलिए यह अक्षांश के समान हुआ और शक चंद्रमा का शंकु है इसलिए, शंकु × अक्षज्या चाक = ---------------- लम्बज्या यहाँ चाक और चारि के मान कलाओं में हैं क्योंकि भारतीय रीति से ज्या के मान कलाओं में होते हैं। परन्तु परलेख के लिए नाप अंगुलों में की जाती है इस- लिए इसको अंगुलों में बदलने के लिए यह मान लेना होगा कि चन्द्रमा का शंकु शक १२ अंगुल है और इसका तात्कालिक अंगुलात्मक छायाकर्ण त्रिज्या अर्थात् ३४३८ के समान है। यदि मान लिया जाय कि चारि और चाक के अंगुलात्मक मान क्रमानुसार त और थ हैं तो नीचे लिखे तीन अनुपात सिद्ध होते हैं— त्रिज्या शक चारि चाक ---------- = ----- = ------ = ----- छायाकर्ण १२ त थ १२ × चारि १२ × चारि × छायाकर्ण ∴ त = ------------ = --------------------------- शक १२ × त्रिज्या १२ × (चंद्रक्रांतिज्या + सूर्यक्रांतिज्या) त्रिज्या × छायाकर्ण = ------------------------------------------------------------- १२ × त्रिज्या × लम्बज्या छायाकर्ण × (चंद्रक्रांतिज्या + सूर्यक्रांतिज्या) = ------------------------------------------------ लम्बज्या १२ × चाक १२ × शंकु × अक्षज्या इसी तरह थ = ----------- = ----------------------- शक शक × लम्बज्या १२अक्षज्या = ----------------- लम्बज्या क्योंकि शक और शंकु एक ही वस्तु है। यहाँ चंद्रमा और सूर्य की क्रांतिज्याएँ जोड़ी गयी हैं क्योंकि इनकी क्रांतियों की दिशाएँ भिन्न हैं। यदि दोनों की क्रांतियों की दिशा एक ही हो तो अंतर निकालना पड़ेगा जैसे यदि सूर्य रा पर हो तो अंतर निकालना पड़ेगा क्योंकि इस दशा में करी = चाक - चारी

शृङ्गोन्नत्यधिकार ६६१ इस प्रकार ६-८ श्लोकों की उपपत्ति सिद्ध हुई। चन्द्रबिम्ब का शुक्ल भाग जानने की रीति— सूर्योनशीतगोर्लिप्ताः शुक्लं नवशतोद्धृताः । चन्द्रबिम्बांगुलाभ्यस्तं हृतं द्वादशभिः स्फुटम् ॥९॥ अनुवाद—चंद्रमा के भोगांश से सूर्य का भोगांश घटाने से जो आवे उसकी कला बनाकर ९०० से भाग देने पर जो आता है वह अंगुलों में चन्द्रमा का शुक्ल भाग होता है। इसको चन्द्रमा के तात्कालिक अंगुलात्मक बिम्ब से गुणा करके १२ से भाग देने पर स्फुट शुक्ल भाग का मान अंगुलों में आ जाता है। विज्ञान भाष्य—पूर्ण चन्द्रमा का मध्यम बिम्ब १२ अंगुल का माना गया है। जिस समय चन्द्रमा पूर्ण होता है उस समय यह पूरा शुक्ल देख पड़ता है और जिस समय अमावस्या होती है उस समय चंद्रमा के शुक्ल भाग का अभाव रहता है। जैसे-जैसे चन्द्रमा सूर्य से आगे बढ़ता है तैसे-तैसे इसका शुक्ल भाग भी बढ़ता जाता है और अन्त में पूर्णिमा काल में इसका पूरा बिम्ब शुक्ल देख पड़ता है। ऐसी दशा में चन्द्रमा का सूर्य से अन्तर १८० अंश या १८० x ६० = १०८०० कला होता है इसलिए चन्द्रमा के शुक्ल भाग का परिमाण इस प्रकार हुआ कि जब सूर्य से चन्द्रमा १०८०० कला आगे जाता है तब इसका शुक्ल भाग १२ अंगुल के समान होता है इसलिए जब किसी काल में चन्द्रमा सूर्य से अ कला आगे हो तब उसका शुक्ल भाग = (अ x १२) / १०८०० = अ / ९०० अंगुल परन्तु यह मध्यम बिम्बमान से लगाया गया है। स्पष्ट बिम्ब इससे भिन्न होता है जिसकी गणना चन्द्रग्रहणाधिकार (पृष्ठ ४८१-८२) के अनुसार करनी चाहिए। जब स्पष्ट बिम्ब का मान अंगुलों में आ जाय तब फिर अनुपात करना चाहिए कि जब मध्यम बिम्ब १२ अंगुल का होता है तब इष्ट शुक्ल भाग अ / ९०० अंगुल होता है, इसलिए जब स्पष्ट बिम्ब च है तब शुक्ल भाग = स्पष्ट बिम्ब x अ / ९०० ÷ १२ = स्पष्ट बिम्ब x अ / ९०० x १ / १२

६६२ सूर्य-सिद्धान्त यह नियम स्थूल है क्योंकि चन्द्रबिम्ब के शुक्ल भाग की वृद्धि तिथि वृद्धि के अनुपात में नहीं बढ़ती जैसा कि अभी प्रकट होगा । चन्द्रमा के शुक्ल भाग की नोकों को शृंग (cusp या horn) कहते हैं । दोनों शृंगों को मिलाने वाली रेखा चन्द्रबिम्ब के उस वृत्त का व्यास है जो उसके प्रकाशित भाग को अप्रकाशित भाग से अलग करता है । इसलिए यह चन्द्र सूर्य के केन्द्रों को मिलानेवाली रेखा से समकोण पर होता है। यह उस वृत्त का भी व्यास है जो चन्द्रमा के द्रष्टा के सामने वाले भाग को उसके दूसरी ओर वाले भाग से अलग करता है । इसलिए यह द्रष्टा और चन्द्र- केन्द्र को मिलानेवाली रेखा से भी समकोण पर होता है। जब दोनों शृंगों को मिलानेवाली रेखा द्रष्टा और चन्द्रकेन्द्र तथा सूर्य और चन्द्र केन्द्रों को मिलाने वाली रेखाओं के समकोण पर होती है तब यह उस तल (plane) के भी समकोण पर होगी जो द्रष्टा चन्द्रकेन्द्र और सूर्यकेन्द्र से होकर जाता है अर्थात् सूर्य और चन्द्र केन्द्रों से होकर जाननेवाला महावृत्त (great circle) शृंगों को मिलानेवाले व्यास को दो समान भागों में काटता है । यह महावृत्त क्षितिज-तल से जो कोण बनाता है वह बहुत परिवर्त्तनशील है इसलिए चन्द्रमा का शृंग भिन्न-भिन्न मासों में भिन्न-भिन्न रीति से झुका रहता है अर्थात् कभी क्षितिज-तल के समानान्तर होता है और कभी लम्ब की दिशा में । चन्द्रमा के दृश्य गोलार्ध का शुक्ल भाग दो वृत्तार्धों के बीच में होता है जिनमें से एक वृत्तार्ध द्रष्टा के सामनेवाले चन्द्रबिम्ब का होता है और दूसरा सूर्य के सामने वाले चन्द्रबिम्ब का । द्रष्टा के सामने वाले चन्द्रबिम्ब का वृत्तार्ध सूर्य की ओर किनारे पर होता है परन्तु सूर्य के सामने वाले चन्द्रबिम्ब का वृत्तार्ध भीतर की ओर होता है और द्रष्टा को तिरछी (obliquely) दिशा में देख पड़ता है इसलिए यह दीर्घ वृत्तार्ध के आकार का देख पड़ता है क्योंकि किसी वृत्त का छेद (projection) तिरछी रेखा में देखने पर दीर्घवृत्त (ellipse) होता है । इसकी जाँच कोई मनुष्य एक गोल चूड़ी और दीपक से सहज ही कर सकता है । चूड़ी लेकर दीवाल और दीपक के बीच में इस प्रकार थामना चाहिए कि चूड़ी का तल दीवाल के समानान्तर हो और दीपक का केन्द्र, चूड़ी का केन्द्र और दीवाल पर चूड़ी की छाया का केन्द्र समसूत्र में दीवाल के तल से समकोण पर हो । ऐसी दशा में चूड़ी की छाया गोल होगी। यदि चूड़ी इसी जगह थामे हुए तिरछी कर दी जाय जिससे इसका तल दीवाल से समानान्तर न रहे अथवा चूड़ी के तल को दीवाल के समानान्तर रखते हुए चूड़ी को नीचे ले जायँ या ऊपर उठा दें जिससे तीनों के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा दीवाल की लम्ब दिशा में न हो तब दीवाल पर चूड़ी की

शृङ्गोन्नत्यधिकार ६८३ जो छाया पड़ेगी वह बिल्कुल गोल न होगी वरन् दीर्घवृत्त के आकार की होगी। पहली दशा में छाया के दीर्घवृत्त का दीर्घ अक्ष सम दिशा (horizontal) में होगा और दूसरी दशा में ऊर्ध्वाधर (vertical) । इसी प्रकार चन्द्रबिम्ब के शुक्ल भाग की भीतरी सीमा दीर्घवृत्तार्ध होती है जिसका दीर्घ अक्ष चन्द्रबिम्ब के व्यास के चित्र ११६ चित्र ११६ Hugh Godfray M. A. की A Treatise on Astronomy से लिया गया है।

६६४ सूर्य-सिद्धान्त समान होता है और लघु अक्ष सदैव परिवर्त्तनशील । अब यह बतलाया जायगा कि सूर्य और चन्द्रमा के स्थानों के अनुसार शुक्ल भाग की वृद्धि या क्षीणता किस प्रकार होती है। मान लो कि च चन्द्रमा का केन्द्र, च द द्रष्टा की दिशा, क ख ग घ चन्द्र बिम्ब का वह तल जो द्रष्टा की दिशा से समकोण पर है, च र सूर्य की दिशा और ख ज घ चन्द्रबिम्ब का वह तल है जो च र दिशा से समकोण पर है। चन्द्र-पृष्ठ का जो खण्ड ख क घ और ख ज घ वृत्तार्धों के बीच में है वही चन्द्रबिम्ब का शुक्ल भाग है जो द्रष्टा को देख पड़ता है। परन्तु ख ज घ वृत्तार्ध को द्रष्टा तिरछा देखता है इसलिए यह क ख ग घ तल पर प्रलम्बित (projected) होकर दीर्घ वृत्तार्ध ख ट घ के रूप में देख पड़ता है। यही दीर्घवृत्तार्ध ख ट घ चंद्रबिम्ब के शुक्ल भाग की भीतरी सीमा है। यहाँ च ज चंद्रगोल की त्रिज्या है इसलिए च क के समान है और च ट च ज का छेद्य है इसलिए च ट = च ज कोज्या ज च ट = च क कोज्या र च चा क्योंकि कोण ज च ट चंद्रमा के उन तलों के बीच का कोण है जो द्रष्टा और सूर्य की दिशाओं से समकोण पर हैं इसलिये यह द्रष्टा की दिशा द च चा और सूर्य की दिशा च र के बीच के कोण र च चा के समान है। इसलिए ट क = च क - च ट = च क - च क कोज्या र च चा = च क (१ - कोज्या र च चा) = च क उत्क्रमज्या र च चा कोण र च चा का मान सहज ही जाना जा सकता है क्योंकि त्रिभुज द च र का यह बहिःकोण है और इसके तीन भुज द च, च र और द र क्रमानुसार द्रष्टा से चंद्रमा, चंद्रमा से सूर्य और द्रष्टा से सूर्य की दूरियां हैं जो ज्ञात हो सकती हैं। इस प्रकार यह सिद्ध है कि शुक्ल भाग का मान तिथि-वृद्धि के अनुपात के अनुसार नहीं बढ़ता जैसा कि नौवें श्लोक में बतलाया गया है क्योंकि किसी कोण की उत्क्रमज्या का मान उस कोण की वृद्धि के अनुपात से नहीं बढ़ता, जैसे यदि कोण दूना हो जाय तो उसकी उत्क्रमज्या भी दूनी नहीं हो जाती (देखो पृष्ठ १२०) । शृङ्गोन्नति जानने का परिलेख— दत्त्वार्कसंज्ञितं बिन्दुं ततो बाहुं स्वदिक्‌मुखम् । ततः पश्चान्मुखं कोटिं कर्णं कोट्यग्रमानुगम् ॥११॥

शृङ्गोन्नत्यधिकार ६६५ कोटिकर्णयुतेरिन्दोः बिम्बं तात्कालिकं लिखेत् । कर्णसूत्रेण दिश्वसिद्धिं प्रथमं परिकल्पयेत् ॥१२॥ शुक्लं कर्णेन तद्विम्बद्योगावन्तर्मुखं नयेत् । शुक्लाग्रयाम्योत्तरयो र्मध्ये मत्स्यौ प्रसाधयेत् ॥१३॥ तन्मध्यसूत्रसंयोगाद् बिन्दुं त्रिस्पृग्लिखेद्धनुः । प्राग्विम्बं यावद्गेव स्यात्तादृक् तत्र दिने शशी ॥१४॥ कोट्या दिक्साधनात्तिर्यक् शुक्लं तच्छृङ्गमुन्नतम् । दर्शयेदुन्नतां कोटिं कृत्वा चन्द्रस्य साऽऽकृतिः ॥१५॥ कृष्णे षड्भयुतं सूर्य विशोध्येन्दोस्तथाऽसितम् । दद्याद्धामं भुजं तत्र पश्चिमे मण्डलं विधोः ॥१६॥ अनुवाद—(१०) समतल भूमि में सूर्य को सूचित करनेवाला विन्दु लिखकर इससे भुजकी दिशा में भुज के समान रेखा खींचकर इसके अग्र विन्दु से पच्छिम की ओर १२ अंगुल की कोटि रेखा खींचे और इस कोटि रेखा के अग्रविन्दु को सूर्य को सूचित करनेवाले विन्दु से मिलाकर कर्ण खींचे । (११) कोटि और कर्ण के संपात- विन्दु को केन्द्र मान कर तात्कालिक चंद्रबिम्ब के समान एक वृत्त बनावे । पहले इसकी परिधि पर कर्ण रेखा के आधार पर दिशाओं के चिह्न बनावे । (१२) कर्ण रेखा और चन्द्रबिम्ब के सम्पात विन्दु से केन्द्र की ओर कर्ण-रेखा पर चन्द्रमा के शुक्ल भाग का चिह्न बनावे । इस चिह्न और चन्द्रबिम्ब के उत्तर दक्षिण विन्दुओँ से दो मत्स्य बनावे । (१३) इन मत्स्यों के मध्य से जाने वाली रेखाओं के सम्पात विन्दु को केन्द्र मानकर एक धनु खींचे जो तीनों विन्दुओं को अर्थात् शुक्लाग्र विन्दु और उत्तर दक्षिण विन्दुओं को स्पर्श करे । इस धनु और चन्द्रबिम्ब के पूर्व भाग के बीच- में जैसा चित्र होता है वैसा ही चन्द्रमा उस दिन देख पड़ता है । (१४) अब कोटि के आधार पर चन्द्रबिम्ब की परिधि पर दिशाओं के चिह्न बनावे । कोटि रेखा से सम- कोण बनानेवाली और चन्द्रबिम्ब के जानेवाली रेखा के ऊपर शुक्ल भाग का जो शृङ्ग रहेगा वही उन्नत देख पड़ेगा और आकाश में चन्द्रमा की आकृति वैसी ही देख पड़ेगी । (१५) कृष्णपक्ष में सूर्य की राशि में ६ राशि जोड़ने से जो आवे उसे चन्द्रमा के भोगांश से घटाकर चन्द्रबिम्ब के असित अर्थात् अप्रकाशित भाग का साधन उसी प्रकार करना चाहिए । यहाँ भुज की दिशा उलटी होती है और चन्द्रबिम्ब के पच्छिम भाग में काले भाग की वृद्धि होती है । विज्ञान-भाष्य—इन श्लोकों में यह बतलाया गया है कि चन्द्रमा के शुक्ल भाग का परिलेख किस प्रकार बनाया जाता है । मान लो कागज का पृष्ठ समतल

६९६ सूर्य-सिद्धान्त भूमि या पट्टी है जिस पर परिलेख बनाना है और बिन्दु रवि का स्थान है (देखो चित्र ११७) । यदि ६-८ श्लोकों के अनुसार जाने हुए भुज का मान र भ के समान चित्र ११७ हो और इसकी दिशा दक्षिण हो तो र बिन्दु से दक्षिण ओर, और उत्तर हो तो उत्तर की ओर र भ के समान एक रेखा खींचो जिसका भ सिरा भुज-अग्र कहा जा सकता है । इस भुज-अग्र से पच्छि की ओर कोटि के समान अर्थात् १२ अंगुल के समान एक रेखा च तक खींचो । इस च बिन्दु को कोटि-अग्र कहते हैं और इसी को तात्कालिक चन्द्रबिम्ब का केन्द्र समझना चाहिए । र च रेखा को कर्ण कहते हैं जिसकी चर्चा आठवें श्लोक में की गयी है । च को केन्द्र मानकर तात्कालिक चन्द्रबिम्ब के व्यासार्ध च पर एक वृत्त खींचो जो परिलेख में चन्द्रबिम्ब सूचित करता है । कर्ण-रेखा को इतना बढ़ाओ कि वह चन्द्रबिम्ब के दूसरी ओर प तक पहुँच जाय । च बिन्दु से जाती हुई एक लम्ब रेखा प पू पर खींचो जो चन्द्रबिम्ब के उ, द बिन्दुओं पर पहुँचे । इन उ, पू, द, प बिन्दुओं को चन्द्रबिम्ब की क्रमानुसार उत्तर, दक्षिण और पच्छिम दिशाएँ समझो । नौवें श्लोक के अनुसार आये हुए चन्द्रमा के शुक्ल भाग का जो परिमाण हो पू से उतनी ही दूरी पर च की ओर एक बिन्दु छ रखो । उ छ द बिन्दुओं से होता हुआ जो धनु खींचा जायगा वही

चन्द्रमा के शुक्ल भाग का भीतरी किनारा है और उस दिन चन्द्रमा के शुक्ल भाग की वही आकृति होगी जो उ छ द और उ पू द धनुओं के बीच में है। उ छ द धनु खींचने के लिए यह रीति बतलायी गयी है कि उ को केन्द्र मानकर छ पर धनु खींचो और छ को केन्द्र मानकर उ पर धनु खींचो; इन दोनों धनुओं के योग- विन्दुओं को मिलाने वाली रेखा खींचो। इसी प्रकार द और छ विन्दुओं पर भी धनु खींच कर उनके योग-विन्दुओं को मिलाने वाली रेखा खींचो। यह दोनों रेखाएँ जहाँ चन्द्रबिम्ब के भीतर काटें उसको केन्द्र मान कर छ विन्दु पर जो धनु खींचा जायगा वह उ छ द विन्दुओं को स्पर्श करेगा और वही चन्द्रमा के शुक्ल भाग का भीतरी किनारा होगा। उ, छ, द, विन्दुओं पर जानेवाले वृत्त का केन्द्र जानने की रीति रेखा- गणित की रीति से मिलती जुलती है क्योंकि धनुओं के योग विन्दुओं को मिलाने- वाली रेखाएँ उ छ और द छ रेखाओं की समविभाजक लम्ब रेखाएँ हैं जिनका सम्पात् विन्दु उ छ द वृत्त का केन्द्र है। चित्र में क विन्दु इसी रीति से स्थिर किया गया है। अब क को केन्द्र मानकर क छ त्रिज्या से उ छ द धनु खींचा गया और उ छ द पू क्षेत्र की आकृति जानी गयी जो चन्द्रमा के शुक्ल भाग की आकृति है जिसमें उ द चन्द्रमा के शृङ्ग हैं। यह जानने के लिए कि कौन शृङ्ग उन्नत अर्थात् उठा हुआ है चन्द्र-विम्ब की दिशाओं में दूसरी कल्पना करने को १४वें श्लोक में कहा गया है परन्तु मेरी समझ में इसकी आवश्यकता नहीं है। कोटि-अग्र च से भुजा भ र के समानान्तर एक रेखा खींचो। जो शृङ्ग इस रेखा के ऊपर होता है वही उन्नत कहा जाता है। दिये हुए चित्र में उत्तर शृङ्ग उन्नत है। चित्र से स्पष्ट है कि यदि भुज की दिशा दक्षिण हो तो चन्द्रमा का उत्तर शृङ्ग उन्नत होगा और भुज की दिशा उत्तर हो तो दक्षिण शृङ्ग उन्नत होगा। परन्तु यदि भुजा शून्य हो अर्थात् न उत्तर हो, न दक्षिण, तो चन्द्रमा का कोई शृङ्ग उन्नत न होगा वरन् सम होगा। यह बतलाया जा चुका है कि शुक्ल भाग की वृद्धि जानने की जो रीति दी गयी है वह स्थूल है और उ छ द धनु भी वृत्त की परिधि का अंश नहीं है वरन् दीर्घवृत्त की परिधि का अंश है। इसलिए परिलेख की यह रीति स्थूल है परन्तु काम चलाने के लिए पर्याप्त है। कृष्ण पक्ष के लिए नियम में जो संशोधन किया गया है उससे चन्द्रमा के असित भाग का ज्ञान होता है। परन्तु मेरी समझ में यदि सूर्योदयकालिक सूर्य की १७

६६८ सूर्य-सिद्धान्त राशि से चन्द्रमा की राशि घटाकर शुक्ल भाग की गणना की जाय और परिक्षेख बनाया जाय तो अधिक अच्छा है । अब संक्षेप में यह बतला देना उचित होगा कि शुद्ध गणित की रीति से शृङ्गोन्नति की गणना कैसे की जाती है । शृङ्गोन्नति की गणना की नवीन रीति— सूर्य और चन्द्र बिम्बों के केन्द्रों से जानेवाले महावृत्त से चन्द्रशृङ्गों को मिलानेवाली रेखा समकोण बनाती है । खमध्य और चन्द्र बिम्ब के केन्द्र से जाने वाला महावृत्त अर्थात् दृङ्मण्डल पहले महावृत्त से जो कोण बनाता है वही शृङ्गोन्नति के कोण के समान होता है इसलिए शृङ्गोन्नति जानने के लिए इसी कोण के जानने की आवश्यकता होती है जो गोलीय त्रिकोणमिति के एक सूत्र के अनुसार जिसकी चर्चा त्रिप्रश्नाधिकार में कई स्थानों पर की गयी है सहज ही चित्र ११८ उ ख द == यामोत्तर वृत्त ख = खमध्य ज = देखने वाले का स्थान उ ज द = उत्तर-दक्षिण रेखा उ प द = पच्छिम क्षितिज च = पच्छिम गोल में चन्द्रमा का स्थान र = अस्त हुए सूर्य का स्थान ख च = चन्द्रमा का नतांश ख र = सूर्य का नतांश च र = सूर्य और चन्द्रमा के बीच का अन्तर ∠ र ख च = सूर्य और चन्द्रमा के दिगंशों का अन्तर

शृङ्गोन्नत्यधिकार ६६६ मालूम हो सकता है। यदि सूर्य और चन्द्रमा के विषुवांश और क्रान्ति मालूम हों तो विषुवांश से विषुव काल और नतकाल जाने जा सकते हैं और नतकाल, क्रान्ति तथा अक्षांश से पृष्ठ २६१ के सूत्र (१) के नतांश और इससे पृष्ठ २७३ में दिये हुए सूत्र से दिगंश जाने जा सकते हैं। चित्र ११८ से विदित होता है कि इनके आधार पर शृङ्गोन्नति कैसे जानी-जा सकती है। चित्र ११८ च = चन्द्र बिम्ब का केन्द्र उ च = चन्द्र केन्द्र का ऊर्ध्व वृत्त (दृङ्मण्डल) र च = सूर्य की दिशा क ख ग घ = चन्द्रमा का शुक्ल भाग ∠ उ च र = शृङ्गोन्नति का कोण = ∠ क च प

७०० सूर्य-सिद्धान्त गोलीय त्रिकोणमिति के सूत्र के अनुसार, कोज्या च र = कोज्या ख र × कोज्या ख च + ज्या ख र × ज्या ख च × कोज्या ∠ र ख च इस सूत्र से जब च र आ जाय तब, कोज्या ∠ ख च र = कोज्या ख र - कोज्या ख च × कोज्या च र / ज्या ख च × ज्या च र कोण ख च र को १८० अंश से घटाने पर जो कोण आवेगा वही शृङ्गोन्नति वा कोण होगा क्योंकि यह ∠ छ च र के समान है। यदि चन्द्रमा से सूर्य उत्तर होगा तो उत्तर शृङ्ग उन्नत होगा और दक्षिण होगा तो दक्षिण शृङ्ग उन्नत रहेगा। यदि सूर्य और चन्द्रमा दोनों के दिगंश एक होंगे तो शृङ्ग सम होगा। इतना जान लेने पर चन्द्रमा के शृङ्गोन्नति का परिलेख इस प्रकार खींचना चाहिए जैसा चित्र ११६ से प्रकट होता है। यह स्पष्ट है कि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार सूर्य और चन्द्रमा को स्पष्ट करने से शृङ्गोन्नति की गणना ठीक नहीं हो सकती क्योंकि सूर्य-सिद्धान्त के ध्रुवाङ्कों में कुछ स्थूलता आ गयी है। इसलिए उचित है कि ग्रहों के ध्रुवाङ्क शुद्ध वेध द्वारा फिर से स्थिर किये जायँ। इस प्रकार शृङ्गोन्नत्यधिकार नामक दसवें अध्याय का विज्ञान-भाष्य समाप्त हुआ।

एकादश अध्याय पाताधिकार (संक्षिप्त वर्णन) [श्लोक १-२—वैधृति और व्यतीपात पातों की परिभाषा। श्लोक ३-५— दोनों पातों का स्वरूप और प्रभाव । श्लोक ६—सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति कब निश्चय करे । श्लोक ७-८—यह जानना कि पातकाल बीत चुका है अथवा होने- वाला है। श्लोक ६-११—सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तियाँ कब समान होती हैं । श्लोक १२-१३—स्पष्ट क्रान्ति से शुद्ध पातकाल जानना । श्लोक १४-१५—पातकाल का आरम्भ, मध्य और अंत कब होता है। श्लोक १६-१८—पातकाल में. क्या करना चाहिये । श्लोक १६—पात दो बार कब होते हैं, और अभाव कब होता है । श्लोक २०—पंचांग संबंधी व्यतीपात योग जानना । श्लोक २१—भसंधि और गंडांत काल की परिभाषा । श्लोक २२—पात और गंडांतकाल किस लिए निषिद्ध हैं श्लोक २३—उपसंहार ।] इस अधिकार में गणितज्योतिष के साथ साथ फलितज्योतिष का भी समावेश है। यही इसकी विशेषता है। दूसरी विशेषता यह है कि इसके बाद जो तीन अध्याय आवेंगे उनका नाम 'अधिकार' नहीं है वरन् 'अध्याय' है। इस अधिकार में जिन पातों की चर्चा है उनको महापात भी कहते हैं। वैधृति और व्यतीपात की परिभाषा— एकायनगतौ स्यातां सूर्याचन्द्रमसौ यदा । तद्यु तौ मण्डशे क्रान्त्योः तुल्यत्वे वैधृताभिधः ॥ विपरीतायनगतौ चन्द्रार्कौ क्रान्तिलिप्तिकाः । समस्तदा व्यतीपातो भगणार्धे तयोर्युतौः ।। अनुवाद—(१) जब सूर्य और चन्द्रमा एक अयन में होते हैं और जब इनके भोगांशों का योग १२ राशि के समान होता है तब दोनों की क्रान्तियाँ समान होने से वैधृति नामक पात होता है। (२) जब सूर्य और चन्द्रमा भिन्न अयनों में होते हैं और जब इनके भोगांशों का योग ६ राशि के समान होता है तब इनकी क्रान्तियाँ समान होने से व्यतीपात नामक पात होता है।

७०२ सूर्य-सिद्धान्त विज्ञान-भाष्य — जब सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तियां समान होती हैं तभी वैधृति और व्यतीपात नामक पात होते हैं अर्थात् जब विषुवद्वृत्त से सूर्य और चन्द्रमा की दूरियाँ समान होती हैं तभी वैधृत और व्यतीपात होते हैं। परन्तु सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तियां समान होते हुए भी दोनों उत्तर हो सकती हैं या दोनों दक्षिण; अथवा एक उत्तर और दूसरी दक्षिण । अब यह देखना है कि यह दशा कब होती है। जब सूर्य विषुवद्वृत्त पर होता है तब इसकी क्रान्ति शून्य होती है। यह घटना वर्ष में दो बार होती है—सायन मेष और सायन तुला संक्रान्ति के दिन । सायन मेष से सायन कर्क तक सूर्य की उत्तर क्रान्ति शून्य से बढ़ते-बढ़ते आजकल २३ अंश २७ कला तक हो जाती है। सायन कर्क से घटने लगती है और सायन तुला तक घट कर शून्य फिर हो जाती है। सायन तुला से क्रान्ति दक्षिण हो कर सायन मकर तक बढ़कर २३ अंश २७ कला हो जाती है। सायन मकर से सायन मेष तक घटते- घटते शून्य हो जाती है। जब सूर्य सायन मकर से आगे बढ़ता है तब यह उदय या अस्त होने के समय क्षितिज पर उत्तर की ओर खसकता हुआ देख पड़ता और यह गति सायन कर्क तक देखी जाती है इसीलिए सायन मकर संक्रान्ति से सायन कर्क संक्रान्ति तक के समय को उत्तरायण कहते हैं। परन्तु सायन कर्क संक्रान्ति के उपरान्त सूर्य क्षितिज पर दक्षिण की ओर खसकता हुआ देख पड़ता है इसीलिए सायन कर्क संक्रान्ति से सायन मकर संक्रान्ति तक के समय को दक्षिणायन कहते हैं। चन्द्रमा भी सूर्य की तरह अपने लगभग एक मास के चक्कर में आधे मास तक उत्तरायण और आधे मास तक दक्षिणायन रहता है परन्तु इसकी कक्षा क्रान्ति- वृत्त से कुछ भिन्न होने के कारण तथा इसकी कक्षा और क्रान्तिवृत्त के सम्पात स्थानों राहु और केतु से स्वयम् वक्री होने के कारण इसके उत्तरायण और दक्षिणायन का समय स्थिर करना कुछ कठिन है। परन्तु मोटे हिसाब से यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि जब चन्द्रमा सायन मकर राशि के निकट आता है तब यह उत्तरायण होता है और जब सायन कर्क राशि के निकट आता है तब दक्षिणायन होता है क्योंकि चन्द्र-कक्षा और क्रान्तिवृत्त के बीच का कोण अर्थात् चन्द्रमा का परमशर केवल ५° ६′ के लगभग है। दिये हुए चित्र १२० से यह बात स्पष्ट हो जाती है । मान लो दिया हुआ दीर्घवृत्त क्रान्तिवृत्त है और इसके व और श बिन्दु क्रम से वसन्तऔर शरद सम्पात हैं जहाँ विषुवद्वृत्त क्रान्तिवृत्त से मिलता है। सरलता के लिए विषुवद् वृत्त नहीं दिखलाया गया है। यदि मान लिया जाय कि चन्द्रमा की कक्षा क्रान्तिवृत्त ही है तो यह स्पष्ट है कि जब सूर्य और चन्द्रमा व और श बिन्दुओं से समान दूरी पर होंगे तभी दोनों की क्रान्तियां समान होंगी। अब देखना है कि