भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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६६२ सूर्य-सिद्धान्त यह नियम स्थूल है क्योंकि चन्द्रबिम्ब के शुक्ल भाग की वृद्धि तिथि वृद्धि के अनुपात में नहीं बढ़ती जैसा कि अभी प्रकट होगा । चन्द्रमा के शुक्ल भाग की नोकों को शृंग (cusp या horn) कहते हैं । दोनों शृंगों को मिलाने वाली रेखा चन्द्रबिम्ब के उस वृत्त का व्यास है जो उसके प्रकाशित भाग को अप्रकाशित भाग से अलग करता है । इसलिए यह चन्द्र सूर्य के केन्द्रों को मिलानेवाली रेखा से समकोण पर होता है। यह उस वृत्त का भी व्यास है जो चन्द्रमा के द्रष्टा के सामने वाले भाग को उसके दूसरी ओर वाले भाग से अलग करता है । इसलिए यह द्रष्टा और चन्द्र- केन्द्र को मिलानेवाली रेखा से भी समकोण पर होता है। जब दोनों शृंगों को मिलानेवाली रेखा द्रष्टा और चन्द्रकेन्द्र तथा सूर्य और चन्द्र केन्द्रों को मिलाने वाली रेखाओं के समकोण पर होती है तब यह उस तल (plane) के भी समकोण पर होगी जो द्रष्टा चन्द्रकेन्द्र और सूर्यकेन्द्र से होकर जाता है अर्थात् सूर्य और चन्द्र केन्द्रों से होकर जाननेवाला महावृत्त (great circle) शृंगों को मिलानेवाले व्यास को दो समान भागों में काटता है । यह महावृत्त क्षितिज-तल से जो कोण बनाता है वह बहुत परिवर्त्तनशील है इसलिए चन्द्रमा का शृंग भिन्न-भिन्न मासों में भिन्न-भिन्न रीति से झुका रहता है अर्थात् कभी क्षितिज-तल के समानान्तर होता है और कभी लम्ब की दिशा में । चन्द्रमा के दृश्य गोलार्ध का शुक्ल भाग दो वृत्तार्धों के बीच में होता है जिनमें से एक वृत्तार्ध द्रष्टा के सामनेवाले चन्द्रबिम्ब का होता है और दूसरा सूर्य के सामने वाले चन्द्रबिम्ब का । द्रष्टा के सामने वाले चन्द्रबिम्ब का वृत्तार्ध सूर्य की ओर किनारे पर होता है परन्तु सूर्य के सामने वाले चन्द्रबिम्ब का वृत्तार्ध भीतर की ओर होता है और द्रष्टा को तिरछी (obliquely) दिशा में देख पड़ता है इसलिए यह दीर्घ वृत्तार्ध के आकार का देख पड़ता है क्योंकि किसी वृत्त का छेद (projection) तिरछी रेखा में देखने पर दीर्घवृत्त (ellipse) होता है । इसकी जाँच कोई मनुष्य एक गोल चूड़ी और दीपक से सहज ही कर सकता है । चूड़ी लेकर दीवाल और दीपक के बीच में इस प्रकार थामना चाहिए कि चूड़ी का तल दीवाल के समानान्तर हो और दीपक का केन्द्र, चूड़ी का केन्द्र और दीवाल पर चूड़ी की छाया का केन्द्र समसूत्र में दीवाल के तल से समकोण पर हो । ऐसी दशा में चूड़ी की छाया गोल होगी। यदि चूड़ी इसी जगह थामे हुए तिरछी कर दी जाय जिससे इसका तल दीवाल से समानान्तर न रहे अथवा चूड़ी के तल को दीवाल के समानान्तर रखते हुए चूड़ी को नीचे ले जायँ या ऊपर उठा दें जिससे तीनों के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा दीवाल की लम्ब दिशा में न हो तब दीवाल पर चूड़ी की