सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशृङ्गोन्नत्यधिकार ६६१ इस प्रकार ६-८ श्लोकों की उपपत्ति सिद्ध हुई। चन्द्रबिम्ब का शुक्ल भाग जानने की रीति— सूर्योनशीतगोर्लिप्ताः शुक्लं नवशतोद्धृताः । चन्द्रबिम्बांगुलाभ्यस्तं हृतं द्वादशभिः स्फुटम् ॥९॥ अनुवाद—चंद्रमा के भोगांश से सूर्य का भोगांश घटाने से जो आवे उसकी कला बनाकर ९०० से भाग देने पर जो आता है वह अंगुलों में चन्द्रमा का शुक्ल भाग होता है। इसको चन्द्रमा के तात्कालिक अंगुलात्मक बिम्ब से गुणा करके १२ से भाग देने पर स्फुट शुक्ल भाग का मान अंगुलों में आ जाता है। विज्ञान भाष्य—पूर्ण चन्द्रमा का मध्यम बिम्ब १२ अंगुल का माना गया है। जिस समय चन्द्रमा पूर्ण होता है उस समय यह पूरा शुक्ल देख पड़ता है और जिस समय अमावस्या होती है उस समय चंद्रमा के शुक्ल भाग का अभाव रहता है। जैसे-जैसे चन्द्रमा सूर्य से आगे बढ़ता है तैसे-तैसे इसका शुक्ल भाग भी बढ़ता जाता है और अन्त में पूर्णिमा काल में इसका पूरा बिम्ब शुक्ल देख पड़ता है। ऐसी दशा में चन्द्रमा का सूर्य से अन्तर १८० अंश या १८० x ६० = १०८०० कला होता है इसलिए चन्द्रमा के शुक्ल भाग का परिमाण इस प्रकार हुआ कि जब सूर्य से चन्द्रमा १०८०० कला आगे जाता है तब इसका शुक्ल भाग १२ अंगुल के समान होता है इसलिए जब किसी काल में चन्द्रमा सूर्य से अ कला आगे हो तब उसका शुक्ल भाग = (अ x १२) / १०८०० = अ / ९०० अंगुल परन्तु यह मध्यम बिम्बमान से लगाया गया है। स्पष्ट बिम्ब इससे भिन्न होता है जिसकी गणना चन्द्रग्रहणाधिकार (पृष्ठ ४८१-८२) के अनुसार करनी चाहिए। जब स्पष्ट बिम्ब का मान अंगुलों में आ जाय तब फिर अनुपात करना चाहिए कि जब मध्यम बिम्ब १२ अंगुल का होता है तब इष्ट शुक्ल भाग अ / ९०० अंगुल होता है, इसलिए जब स्पष्ट बिम्ब च है तब शुक्ल भाग = स्पष्ट बिम्ब x अ / ९०० ÷ १२ = स्पष्ट बिम्ब x अ / ९०० x १ / १२