सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
शृङ्गोन्नत्यधिकार ६६१ इस प्रकार ६-८ श्लोकों की उपपत्ति सिद्ध हुई। चन्द्रबिम्ब का शुक्ल भाग जानने की रीति— सूर्योनशीतगोर्लिप्ताः शुक्लं नवशतोद्धृताः । चन्द्रबिम्बांगुलाभ्यस्तं हृतं द्वादशभिः स्फुटम् ॥९॥ अनुवाद—चंद्रमा के भोगांश से सूर्य का भोगांश घटाने से जो आवे उसकी कला बनाकर ९०० से भाग देने पर जो आता है वह अंगुलों में चन्द्रमा का शुक्ल भाग होता है। इसको चन्द्रमा के तात्कालिक अंगुलात्मक बिम्ब से गुणा करके १२ से भाग देने पर स्फुट शुक्ल भाग का मान अंगुलों में आ जाता है। विज्ञान भाष्य—पूर्ण चन्द्रमा का मध्यम बिम्ब १२ अंगुल का माना गया है। जिस समय चन्द्रमा पूर्ण होता है उस समय यह पूरा शुक्ल देख पड़ता है और जिस समय अमावस्या होती है उस समय चंद्रमा के शुक्ल भाग का अभाव रहता है। जैसे-जैसे चन्द्रमा सूर्य से आगे बढ़ता है तैसे-तैसे इसका शुक्ल भाग भी बढ़ता जाता है और अन्त में पूर्णिमा काल में इसका पूरा बिम्ब शुक्ल देख पड़ता है। ऐसी दशा में चन्द्रमा का सूर्य से अन्तर १८० अंश या १८० x ६० = १०८०० कला होता है इसलिए चन्द्रमा के शुक्ल भाग का परिमाण इस प्रकार हुआ कि जब सूर्य से चन्द्रमा १०८०० कला आगे जाता है तब इसका शुक्ल भाग १२ अंगुल के समान होता है इसलिए जब किसी काल में चन्द्रमा सूर्य से अ कला आगे हो तब उसका शुक्ल भाग = (अ x १२) / १०८०० = अ / ९०० अंगुल परन्तु यह मध्यम बिम्बमान से लगाया गया है। स्पष्ट बिम्ब इससे भिन्न होता है जिसकी गणना चन्द्रग्रहणाधिकार (पृष्ठ ४८१-८२) के अनुसार करनी चाहिए। जब स्पष्ट बिम्ब का मान अंगुलों में आ जाय तब फिर अनुपात करना चाहिए कि जब मध्यम बिम्ब १२ अंगुल का होता है तब इष्ट शुक्ल भाग अ / ९०० अंगुल होता है, इसलिए जब स्पष्ट बिम्ब च है तब शुक्ल भाग = स्पष्ट बिम्ब x अ / ९०० ÷ १२ = स्पष्ट बिम्ब x अ / ९०० x १ / १२
६६२ सूर्य-सिद्धान्त यह नियम स्थूल है क्योंकि चन्द्रबिम्ब के शुक्ल भाग की वृद्धि तिथि वृद्धि के अनुपात में नहीं बढ़ती जैसा कि अभी प्रकट होगा । चन्द्रमा के शुक्ल भाग की नोकों को शृंग (cusp या horn) कहते हैं । दोनों शृंगों को मिलाने वाली रेखा चन्द्रबिम्ब के उस वृत्त का व्यास है जो उसके प्रकाशित भाग को अप्रकाशित भाग से अलग करता है । इसलिए यह चन्द्र सूर्य के केन्द्रों को मिलानेवाली रेखा से समकोण पर होता है। यह उस वृत्त का भी व्यास है जो चन्द्रमा के द्रष्टा के सामने वाले भाग को उसके दूसरी ओर वाले भाग से अलग करता है । इसलिए यह द्रष्टा और चन्द्र- केन्द्र को मिलानेवाली रेखा से भी समकोण पर होता है। जब दोनों शृंगों को मिलानेवाली रेखा द्रष्टा और चन्द्रकेन्द्र तथा सूर्य और चन्द्र केन्द्रों को मिलाने वाली रेखाओं के समकोण पर होती है तब यह उस तल (plane) के भी समकोण पर होगी जो द्रष्टा चन्द्रकेन्द्र और सूर्यकेन्द्र से होकर जाता है अर्थात् सूर्य और चन्द्र केन्द्रों से होकर जाननेवाला महावृत्त (great circle) शृंगों को मिलानेवाले व्यास को दो समान भागों में काटता है । यह महावृत्त क्षितिज-तल से जो कोण बनाता है वह बहुत परिवर्त्तनशील है इसलिए चन्द्रमा का शृंग भिन्न-भिन्न मासों में भिन्न-भिन्न रीति से झुका रहता है अर्थात् कभी क्षितिज-तल के समानान्तर होता है और कभी लम्ब की दिशा में । चन्द्रमा के दृश्य गोलार्ध का शुक्ल भाग दो वृत्तार्धों के बीच में होता है जिनमें से एक वृत्तार्ध द्रष्टा के सामनेवाले चन्द्रबिम्ब का होता है और दूसरा सूर्य के सामने वाले चन्द्रबिम्ब का । द्रष्टा के सामने वाले चन्द्रबिम्ब का वृत्तार्ध सूर्य की ओर किनारे पर होता है परन्तु सूर्य के सामने वाले चन्द्रबिम्ब का वृत्तार्ध भीतर की ओर होता है और द्रष्टा को तिरछी (obliquely) दिशा में देख पड़ता है इसलिए यह दीर्घ वृत्तार्ध के आकार का देख पड़ता है क्योंकि किसी वृत्त का छेद (projection) तिरछी रेखा में देखने पर दीर्घवृत्त (ellipse) होता है । इसकी जाँच कोई मनुष्य एक गोल चूड़ी और दीपक से सहज ही कर सकता है । चूड़ी लेकर दीवाल और दीपक के बीच में इस प्रकार थामना चाहिए कि चूड़ी का तल दीवाल के समानान्तर हो और दीपक का केन्द्र, चूड़ी का केन्द्र और दीवाल पर चूड़ी की छाया का केन्द्र समसूत्र में दीवाल के तल से समकोण पर हो । ऐसी दशा में चूड़ी की छाया गोल होगी। यदि चूड़ी इसी जगह थामे हुए तिरछी कर दी जाय जिससे इसका तल दीवाल से समानान्तर न रहे अथवा चूड़ी के तल को दीवाल के समानान्तर रखते हुए चूड़ी को नीचे ले जायँ या ऊपर उठा दें जिससे तीनों के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा दीवाल की लम्ब दिशा में न हो तब दीवाल पर चूड़ी की
शृङ्गोन्नत्यधिकार ६८३ जो छाया पड़ेगी वह बिल्कुल गोल न होगी वरन् दीर्घवृत्त के आकार की होगी। पहली दशा में छाया के दीर्घवृत्त का दीर्घ अक्ष सम दिशा (horizontal) में होगा और दूसरी दशा में ऊर्ध्वाधर (vertical) । इसी प्रकार चन्द्रबिम्ब के शुक्ल भाग की भीतरी सीमा दीर्घवृत्तार्ध होती है जिसका दीर्घ अक्ष चन्द्रबिम्ब के व्यास के चित्र ११६ चित्र ११६ Hugh Godfray M. A. की A Treatise on Astronomy से लिया गया है।
६६४ सूर्य-सिद्धान्त समान होता है और लघु अक्ष सदैव परिवर्त्तनशील । अब यह बतलाया जायगा कि सूर्य और चन्द्रमा के स्थानों के अनुसार शुक्ल भाग की वृद्धि या क्षीणता किस प्रकार होती है। मान लो कि च चन्द्रमा का केन्द्र, च द द्रष्टा की दिशा, क ख ग घ चन्द्र बिम्ब का वह तल जो द्रष्टा की दिशा से समकोण पर है, च र सूर्य की दिशा और ख ज घ चन्द्रबिम्ब का वह तल है जो च र दिशा से समकोण पर है। चन्द्र-पृष्ठ का जो खण्ड ख क घ और ख ज घ वृत्तार्धों के बीच में है वही चन्द्रबिम्ब का शुक्ल भाग है जो द्रष्टा को देख पड़ता है। परन्तु ख ज घ वृत्तार्ध को द्रष्टा तिरछा देखता है इसलिए यह क ख ग घ तल पर प्रलम्बित (projected) होकर दीर्घ वृत्तार्ध ख ट घ के रूप में देख पड़ता है। यही दीर्घवृत्तार्ध ख ट घ चंद्रबिम्ब के शुक्ल भाग की भीतरी सीमा है। यहाँ च ज चंद्रगोल की त्रिज्या है इसलिए च क के समान है और च ट च ज का छेद्य है इसलिए च ट = च ज कोज्या ज च ट = च क कोज्या र च चा क्योंकि कोण ज च ट चंद्रमा के उन तलों के बीच का कोण है जो द्रष्टा और सूर्य की दिशाओं से समकोण पर हैं इसलिये यह द्रष्टा की दिशा द च चा और सूर्य की दिशा च र के बीच के कोण र च चा के समान है। इसलिए ट क = च क - च ट = च क - च क कोज्या र च चा = च क (१ - कोज्या र च चा) = च क उत्क्रमज्या र च चा कोण र च चा का मान सहज ही जाना जा सकता है क्योंकि त्रिभुज द च र का यह बहिःकोण है और इसके तीन भुज द च, च र और द र क्रमानुसार द्रष्टा से चंद्रमा, चंद्रमा से सूर्य और द्रष्टा से सूर्य की दूरियां हैं जो ज्ञात हो सकती हैं। इस प्रकार यह सिद्ध है कि शुक्ल भाग का मान तिथि-वृद्धि के अनुपात के अनुसार नहीं बढ़ता जैसा कि नौवें श्लोक में बतलाया गया है क्योंकि किसी कोण की उत्क्रमज्या का मान उस कोण की वृद्धि के अनुपात से नहीं बढ़ता, जैसे यदि कोण दूना हो जाय तो उसकी उत्क्रमज्या भी दूनी नहीं हो जाती (देखो पृष्ठ १२०) । शृङ्गोन्नति जानने का परिलेख— दत्त्वार्कसंज्ञितं बिन्दुं ततो बाहुं स्वदिक्मुखम् । ततः पश्चान्मुखं कोटिं कर्णं कोट्यग्रमानुगम् ॥११॥
शृङ्गोन्नत्यधिकार ६६५ कोटिकर्णयुतेरिन्दोः बिम्बं तात्कालिकं लिखेत् । कर्णसूत्रेण दिश्वसिद्धिं प्रथमं परिकल्पयेत् ॥१२॥ शुक्लं कर्णेन तद्विम्बद्योगावन्तर्मुखं नयेत् । शुक्लाग्रयाम्योत्तरयो र्मध्ये मत्स्यौ प्रसाधयेत् ॥१३॥ तन्मध्यसूत्रसंयोगाद् बिन्दुं त्रिस्पृग्लिखेद्धनुः । प्राग्विम्बं यावद्गेव स्यात्तादृक् तत्र दिने शशी ॥१४॥ कोट्या दिक्साधनात्तिर्यक् शुक्लं तच्छृङ्गमुन्नतम् । दर्शयेदुन्नतां कोटिं कृत्वा चन्द्रस्य साऽऽकृतिः ॥१५॥ कृष्णे षड्भयुतं सूर्य विशोध्येन्दोस्तथाऽसितम् । दद्याद्धामं भुजं तत्र पश्चिमे मण्डलं विधोः ॥१६॥ अनुवाद—(१०) समतल भूमि में सूर्य को सूचित करनेवाला विन्दु लिखकर इससे भुजकी दिशा में भुज के समान रेखा खींचकर इसके अग्र विन्दु से पच्छिम की ओर १२ अंगुल की कोटि रेखा खींचे और इस कोटि रेखा के अग्रविन्दु को सूर्य को सूचित करनेवाले विन्दु से मिलाकर कर्ण खींचे । (११) कोटि और कर्ण के संपात- विन्दु को केन्द्र मान कर तात्कालिक चंद्रबिम्ब के समान एक वृत्त बनावे । पहले इसकी परिधि पर कर्ण रेखा के आधार पर दिशाओं के चिह्न बनावे । (१२) कर्ण रेखा और चन्द्रबिम्ब के सम्पात विन्दु से केन्द्र की ओर कर्ण-रेखा पर चन्द्रमा के शुक्ल भाग का चिह्न बनावे । इस चिह्न और चन्द्रबिम्ब के उत्तर दक्षिण विन्दुओँ से दो मत्स्य बनावे । (१३) इन मत्स्यों के मध्य से जाने वाली रेखाओं के सम्पात विन्दु को केन्द्र मानकर एक धनु खींचे जो तीनों विन्दुओं को अर्थात् शुक्लाग्र विन्दु और उत्तर दक्षिण विन्दुओं को स्पर्श करे । इस धनु और चन्द्रबिम्ब के पूर्व भाग के बीच- में जैसा चित्र होता है वैसा ही चन्द्रमा उस दिन देख पड़ता है । (१४) अब कोटि के आधार पर चन्द्रबिम्ब की परिधि पर दिशाओं के चिह्न बनावे । कोटि रेखा से सम- कोण बनानेवाली और चन्द्रबिम्ब के जानेवाली रेखा के ऊपर शुक्ल भाग का जो शृङ्ग रहेगा वही उन्नत देख पड़ेगा और आकाश में चन्द्रमा की आकृति वैसी ही देख पड़ेगी । (१५) कृष्णपक्ष में सूर्य की राशि में ६ राशि जोड़ने से जो आवे उसे चन्द्रमा के भोगांश से घटाकर चन्द्रबिम्ब के असित अर्थात् अप्रकाशित भाग का साधन उसी प्रकार करना चाहिए । यहाँ भुज की दिशा उलटी होती है और चन्द्रबिम्ब के पच्छिम भाग में काले भाग की वृद्धि होती है । विज्ञान-भाष्य—इन श्लोकों में यह बतलाया गया है कि चन्द्रमा के शुक्ल भाग का परिलेख किस प्रकार बनाया जाता है । मान लो कागज का पृष्ठ समतल
६९६ सूर्य-सिद्धान्त भूमि या पट्टी है जिस पर परिलेख बनाना है और बिन्दु रवि का स्थान है (देखो चित्र ११७) । यदि ६-८ श्लोकों के अनुसार जाने हुए भुज का मान र भ के समान चित्र ११७ हो और इसकी दिशा दक्षिण हो तो र बिन्दु से दक्षिण ओर, और उत्तर हो तो उत्तर की ओर र भ के समान एक रेखा खींचो जिसका भ सिरा भुज-अग्र कहा जा सकता है । इस भुज-अग्र से पच्छि की ओर कोटि के समान अर्थात् १२ अंगुल के समान एक रेखा च तक खींचो । इस च बिन्दु को कोटि-अग्र कहते हैं और इसी को तात्कालिक चन्द्रबिम्ब का केन्द्र समझना चाहिए । र च रेखा को कर्ण कहते हैं जिसकी चर्चा आठवें श्लोक में की गयी है । च को केन्द्र मानकर तात्कालिक चन्द्रबिम्ब के व्यासार्ध च पर एक वृत्त खींचो जो परिलेख में चन्द्रबिम्ब सूचित करता है । कर्ण-रेखा को इतना बढ़ाओ कि वह चन्द्रबिम्ब के दूसरी ओर प तक पहुँच जाय । च बिन्दु से जाती हुई एक लम्ब रेखा प पू पर खींचो जो चन्द्रबिम्ब के उ, द बिन्दुओं पर पहुँचे । इन उ, पू, द, प बिन्दुओं को चन्द्रबिम्ब की क्रमानुसार उत्तर, दक्षिण और पच्छिम दिशाएँ समझो । नौवें श्लोक के अनुसार आये हुए चन्द्रमा के शुक्ल भाग का जो परिमाण हो पू से उतनी ही दूरी पर च की ओर एक बिन्दु छ रखो । उ छ द बिन्दुओं से होता हुआ जो धनु खींचा जायगा वही
चन्द्रमा के शुक्ल भाग का भीतरी किनारा है और उस दिन चन्द्रमा के शुक्ल भाग की वही आकृति होगी जो उ छ द और उ पू द धनुओं के बीच में है। उ छ द धनु खींचने के लिए यह रीति बतलायी गयी है कि उ को केन्द्र मानकर छ पर धनु खींचो और छ को केन्द्र मानकर उ पर धनु खींचो; इन दोनों धनुओं के योग- विन्दुओं को मिलाने वाली रेखा खींचो। इसी प्रकार द और छ विन्दुओं पर भी धनु खींच कर उनके योग-विन्दुओं को मिलाने वाली रेखा खींचो। यह दोनों रेखाएँ जहाँ चन्द्रबिम्ब के भीतर काटें उसको केन्द्र मान कर छ विन्दु पर जो धनु खींचा जायगा वह उ छ द विन्दुओं को स्पर्श करेगा और वही चन्द्रमा के शुक्ल भाग का भीतरी किनारा होगा। उ, छ, द, विन्दुओं पर जानेवाले वृत्त का केन्द्र जानने की रीति रेखा- गणित की रीति से मिलती जुलती है क्योंकि धनुओं के योग विन्दुओं को मिलाने- वाली रेखाएँ उ छ और द छ रेखाओं की समविभाजक लम्ब रेखाएँ हैं जिनका सम्पात् विन्दु उ छ द वृत्त का केन्द्र है। चित्र में क विन्दु इसी रीति से स्थिर किया गया है। अब क को केन्द्र मानकर क छ त्रिज्या से उ छ द धनु खींचा गया और उ छ द पू क्षेत्र की आकृति जानी गयी जो चन्द्रमा के शुक्ल भाग की आकृति है जिसमें उ द चन्द्रमा के शृङ्ग हैं। यह जानने के लिए कि कौन शृङ्ग उन्नत अर्थात् उठा हुआ है चन्द्र-विम्ब की दिशाओं में दूसरी कल्पना करने को १४वें श्लोक में कहा गया है परन्तु मेरी समझ में इसकी आवश्यकता नहीं है। कोटि-अग्र च से भुजा भ र के समानान्तर एक रेखा खींचो। जो शृङ्ग इस रेखा के ऊपर होता है वही उन्नत कहा जाता है। दिये हुए चित्र में उत्तर शृङ्ग उन्नत है। चित्र से स्पष्ट है कि यदि भुज की दिशा दक्षिण हो तो चन्द्रमा का उत्तर शृङ्ग उन्नत होगा और भुज की दिशा उत्तर हो तो दक्षिण शृङ्ग उन्नत होगा। परन्तु यदि भुजा शून्य हो अर्थात् न उत्तर हो, न दक्षिण, तो चन्द्रमा का कोई शृङ्ग उन्नत न होगा वरन् सम होगा। यह बतलाया जा चुका है कि शुक्ल भाग की वृद्धि जानने की जो रीति दी गयी है वह स्थूल है और उ छ द धनु भी वृत्त की परिधि का अंश नहीं है वरन् दीर्घवृत्त की परिधि का अंश है। इसलिए परिलेख की यह रीति स्थूल है परन्तु काम चलाने के लिए पर्याप्त है। कृष्ण पक्ष के लिए नियम में जो संशोधन किया गया है उससे चन्द्रमा के असित भाग का ज्ञान होता है। परन्तु मेरी समझ में यदि सूर्योदयकालिक सूर्य की १७
६६८ सूर्य-सिद्धान्त राशि से चन्द्रमा की राशि घटाकर शुक्ल भाग की गणना की जाय और परिक्षेख बनाया जाय तो अधिक अच्छा है । अब संक्षेप में यह बतला देना उचित होगा कि शुद्ध गणित की रीति से शृङ्गोन्नति की गणना कैसे की जाती है । शृङ्गोन्नति की गणना की नवीन रीति— सूर्य और चन्द्र बिम्बों के केन्द्रों से जानेवाले महावृत्त से चन्द्रशृङ्गों को मिलानेवाली रेखा समकोण बनाती है । खमध्य और चन्द्र बिम्ब के केन्द्र से जाने वाला महावृत्त अर्थात् दृङ्मण्डल पहले महावृत्त से जो कोण बनाता है वही शृङ्गोन्नति के कोण के समान होता है इसलिए शृङ्गोन्नति जानने के लिए इसी कोण के जानने की आवश्यकता होती है जो गोलीय त्रिकोणमिति के एक सूत्र के अनुसार जिसकी चर्चा त्रिप्रश्नाधिकार में कई स्थानों पर की गयी है सहज ही चित्र ११८ उ ख द == यामोत्तर वृत्त ख = खमध्य ज = देखने वाले का स्थान उ ज द = उत्तर-दक्षिण रेखा उ प द = पच्छिम क्षितिज च = पच्छिम गोल में चन्द्रमा का स्थान र = अस्त हुए सूर्य का स्थान ख च = चन्द्रमा का नतांश ख र = सूर्य का नतांश च र = सूर्य और चन्द्रमा के बीच का अन्तर ∠ र ख च = सूर्य और चन्द्रमा के दिगंशों का अन्तर
शृङ्गोन्नत्यधिकार ६६६ मालूम हो सकता है। यदि सूर्य और चन्द्रमा के विषुवांश और क्रान्ति मालूम हों तो विषुवांश से विषुव काल और नतकाल जाने जा सकते हैं और नतकाल, क्रान्ति तथा अक्षांश से पृष्ठ २६१ के सूत्र (१) के नतांश और इससे पृष्ठ २७३ में दिये हुए सूत्र से दिगंश जाने जा सकते हैं। चित्र ११८ से विदित होता है कि इनके आधार पर शृङ्गोन्नति कैसे जानी-जा सकती है। चित्र ११८ च = चन्द्र बिम्ब का केन्द्र उ च = चन्द्र केन्द्र का ऊर्ध्व वृत्त (दृङ्मण्डल) र च = सूर्य की दिशा क ख ग घ = चन्द्रमा का शुक्ल भाग ∠ उ च र = शृङ्गोन्नति का कोण = ∠ क च प
७०० सूर्य-सिद्धान्त गोलीय त्रिकोणमिति के सूत्र के अनुसार, कोज्या च र = कोज्या ख र × कोज्या ख च + ज्या ख र × ज्या ख च × कोज्या ∠ र ख च इस सूत्र से जब च र आ जाय तब, कोज्या ∠ ख च र = कोज्या ख र - कोज्या ख च × कोज्या च र / ज्या ख च × ज्या च र कोण ख च र को १८० अंश से घटाने पर जो कोण आवेगा वही शृङ्गोन्नति वा कोण होगा क्योंकि यह ∠ छ च र के समान है। यदि चन्द्रमा से सूर्य उत्तर होगा तो उत्तर शृङ्ग उन्नत होगा और दक्षिण होगा तो दक्षिण शृङ्ग उन्नत रहेगा। यदि सूर्य और चन्द्रमा दोनों के दिगंश एक होंगे तो शृङ्ग सम होगा। इतना जान लेने पर चन्द्रमा के शृङ्गोन्नति का परिलेख इस प्रकार खींचना चाहिए जैसा चित्र ११६ से प्रकट होता है। यह स्पष्ट है कि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार सूर्य और चन्द्रमा को स्पष्ट करने से शृङ्गोन्नति की गणना ठीक नहीं हो सकती क्योंकि सूर्य-सिद्धान्त के ध्रुवाङ्कों में कुछ स्थूलता आ गयी है। इसलिए उचित है कि ग्रहों के ध्रुवाङ्क शुद्ध वेध द्वारा फिर से स्थिर किये जायँ। इस प्रकार शृङ्गोन्नत्यधिकार नामक दसवें अध्याय का विज्ञान-भाष्य समाप्त हुआ।
एकादश अध्याय पाताधिकार (संक्षिप्त वर्णन) [श्लोक १-२—वैधृति और व्यतीपात पातों की परिभाषा। श्लोक ३-५— दोनों पातों का स्वरूप और प्रभाव । श्लोक ६—सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति कब निश्चय करे । श्लोक ७-८—यह जानना कि पातकाल बीत चुका है अथवा होने- वाला है। श्लोक ६-११—सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तियाँ कब समान होती हैं । श्लोक १२-१३—स्पष्ट क्रान्ति से शुद्ध पातकाल जानना । श्लोक १४-१५—पातकाल का आरम्भ, मध्य और अंत कब होता है। श्लोक १६-१८—पातकाल में. क्या करना चाहिये । श्लोक १६—पात दो बार कब होते हैं, और अभाव कब होता है । श्लोक २०—पंचांग संबंधी व्यतीपात योग जानना । श्लोक २१—भसंधि और गंडांत काल की परिभाषा । श्लोक २२—पात और गंडांतकाल किस लिए निषिद्ध हैं श्लोक २३—उपसंहार ।] इस अधिकार में गणितज्योतिष के साथ साथ फलितज्योतिष का भी समावेश है। यही इसकी विशेषता है। दूसरी विशेषता यह है कि इसके बाद जो तीन अध्याय आवेंगे उनका नाम 'अधिकार' नहीं है वरन् 'अध्याय' है। इस अधिकार में जिन पातों की चर्चा है उनको महापात भी कहते हैं। वैधृति और व्यतीपात की परिभाषा— एकायनगतौ स्यातां सूर्याचन्द्रमसौ यदा । तद्यु तौ मण्डशे क्रान्त्योः तुल्यत्वे वैधृताभिधः ॥ विपरीतायनगतौ चन्द्रार्कौ क्रान्तिलिप्तिकाः । समस्तदा व्यतीपातो भगणार्धे तयोर्युतौः ।। अनुवाद—(१) जब सूर्य और चन्द्रमा एक अयन में होते हैं और जब इनके भोगांशों का योग १२ राशि के समान होता है तब दोनों की क्रान्तियाँ समान होने से वैधृति नामक पात होता है। (२) जब सूर्य और चन्द्रमा भिन्न अयनों में होते हैं और जब इनके भोगांशों का योग ६ राशि के समान होता है तब इनकी क्रान्तियाँ समान होने से व्यतीपात नामक पात होता है।
७०२ सूर्य-सिद्धान्त विज्ञान-भाष्य — जब सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तियां समान होती हैं तभी वैधृति और व्यतीपात नामक पात होते हैं अर्थात् जब विषुवद्वृत्त से सूर्य और चन्द्रमा की दूरियाँ समान होती हैं तभी वैधृत और व्यतीपात होते हैं। परन्तु सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तियां समान होते हुए भी दोनों उत्तर हो सकती हैं या दोनों दक्षिण; अथवा एक उत्तर और दूसरी दक्षिण । अब यह देखना है कि यह दशा कब होती है। जब सूर्य विषुवद्वृत्त पर होता है तब इसकी क्रान्ति शून्य होती है। यह घटना वर्ष में दो बार होती है—सायन मेष और सायन तुला संक्रान्ति के दिन । सायन मेष से सायन कर्क तक सूर्य की उत्तर क्रान्ति शून्य से बढ़ते-बढ़ते आजकल २३ अंश २७ कला तक हो जाती है। सायन कर्क से घटने लगती है और सायन तुला तक घट कर शून्य फिर हो जाती है। सायन तुला से क्रान्ति दक्षिण हो कर सायन मकर तक बढ़कर २३ अंश २७ कला हो जाती है। सायन मकर से सायन मेष तक घटते- घटते शून्य हो जाती है। जब सूर्य सायन मकर से आगे बढ़ता है तब यह उदय या अस्त होने के समय क्षितिज पर उत्तर की ओर खसकता हुआ देख पड़ता और यह गति सायन कर्क तक देखी जाती है इसीलिए सायन मकर संक्रान्ति से सायन कर्क संक्रान्ति तक के समय को उत्तरायण कहते हैं। परन्तु सायन कर्क संक्रान्ति के उपरान्त सूर्य क्षितिज पर दक्षिण की ओर खसकता हुआ देख पड़ता है इसीलिए सायन कर्क संक्रान्ति से सायन मकर संक्रान्ति तक के समय को दक्षिणायन कहते हैं। चन्द्रमा भी सूर्य की तरह अपने लगभग एक मास के चक्कर में आधे मास तक उत्तरायण और आधे मास तक दक्षिणायन रहता है परन्तु इसकी कक्षा क्रान्ति- वृत्त से कुछ भिन्न होने के कारण तथा इसकी कक्षा और क्रान्तिवृत्त के सम्पात स्थानों राहु और केतु से स्वयम् वक्री होने के कारण इसके उत्तरायण और दक्षिणायन का समय स्थिर करना कुछ कठिन है। परन्तु मोटे हिसाब से यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि जब चन्द्रमा सायन मकर राशि के निकट आता है तब यह उत्तरायण होता है और जब सायन कर्क राशि के निकट आता है तब दक्षिणायन होता है क्योंकि चन्द्र-कक्षा और क्रान्तिवृत्त के बीच का कोण अर्थात् चन्द्रमा का परमशर केवल ५° ६′ के लगभग है। दिये हुए चित्र १२० से यह बात स्पष्ट हो जाती है । मान लो दिया हुआ दीर्घवृत्त क्रान्तिवृत्त है और इसके व और श बिन्दु क्रम से वसन्तऔर शरद सम्पात हैं जहाँ विषुवद्वृत्त क्रान्तिवृत्त से मिलता है। सरलता के लिए विषुवद् वृत्त नहीं दिखलाया गया है। यदि मान लिया जाय कि चन्द्रमा की कक्षा क्रान्तिवृत्त ही है तो यह स्पष्ट है कि जब सूर्य और चन्द्रमा व और श बिन्दुओं से समान दूरी पर होंगे तभी दोनों की क्रान्तियां समान होंगी। अब देखना है कि
पाताधिकार ७०३
[चित्र १२०]
चन्द्रमा के एक फेरे के यह घटना कितनी बार हो सकती है। मान लो र सूर्य का स्थान वसंत-सम्पात व और दक्षिणायन बिन्दु द के बीच में किसी जगह है। जब चन्द्रमा भी र पर रहेगा अर्थात् अमावस्या के दिन, तब दोनों की क्रान्तियाँ एक ही रहेंगी। जब चन्द्रमा च, चा और चि पर रहेगा तब भी दोनों की क्रान्ति समान रहेंगी यदि वर = चश = शचा = चिव । परन्तु जब चन्द्रमा चा बिन्दु पर रहेगा तब पूर्णिमा होगी। सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार पातकालिक क्रान्तिसाम्य के लिए अमावस्या और पूर्णिमा के दिन का विचार नहीं किया जाता इसलिए जब चन्द्रमा च और चि पर रहेगा तभी क्रान्ति साम्य का योग आवेगा ।
पहले श्लोक में बतलाया गया है कि जब सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का योग ३६० अंश हो तब वैधृति नामक पात होता है। यह दशा तभी हो सकती है जब सूर्य र, च, चा या चि पर हो तो चन्द्रमा क्रम से चि, चा, च या र पर हो क्योंकि तभी वसंत सम्पात व से सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का योग ३६० अंश हो सकता है। चित्र से स्पष्ट है कि र और चि स्थान उत्तरायण बिन्दु उ, वसंत सम्पात व और दक्षिणायन बिन्दु द के बीच में है इसलिए र और चि दोनों उत्तरायण हैं। इसी प्रकार च, चा दोनों दक्षिणायन हैं। इसीलिए पहले श्लोक में बतलाया गया है कि जब सूर्य और चन्द्रमा एक अयन में हों और दोनों के (सायन) भोगांशों का योग ३६० अंश हो तभी वैधृति पात होता है। इसके प्रतिकूल जब दोनों भिन्न अयन में हों और भोगांशों का योग १८० अंश हो तब व्यतीपात होता है। चित्र में यदि सूर्य और चन्द्रमा र, च पर हों तो दोनों के भोगांशों का योग १८०° होगा और चा, चि पर हों तो भी दोनों के भोगांशों का योग ३६० + १८० अंश अथवा १८० अंश होगा । परन्तु र और च अथवा च और चि स्थान भिन्न अयनों में हैं, इसलिए व्यतीतपात नामक क्रान्तिसाम्य योग तभी होता है जब सूर्य और चन्द्रमा भिन्न अयनों
७०४ सूर्य-सिद्धान्त में हों और सूर्य वसंत-सम्पात से जितना आगे या पीछे हो उतना ही चन्द्रमा शरद सम्पात से पीछे या आगे हो । दोनों पातों का स्वरूप और स्वभाव— तुल्यांशुजालसंपर्कातयोस्तु प्रवाहातात् १ । तद्दृक्क्रोधभवो वह्निः लोकाभावाय जायते ॥३॥ विनाशयति पातोऽस्य लोकानामसकृद्यतः । व्यतीपातः प्रसिद्धोऽत्र संज्ञाभेदेन वैधृतः ॥४॥ स कृष्णो दारुणवपुः लोहिताक्षो महोदरः । सर्वानिष्टकरो रौद्रः भूयोभूयः प्रजायते ॥५॥ अनुवाद—(३) क्रान्ति-साम्य-कालिक सूर्य और चन्द्रमा की समान किरणों के मिलने से और उनकी दृष्टि रूपी क्रोध से उत्पन्न अग्नि प्रवह वायु से प्रज्वलित होकर संसार के लिए अशुभ फल उत्पन्न करती है। (४) जब सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तियाँ समान होती हैं तब यह पात संसार को बारंबार नाश करता है। इसे व्यतीपात और वैधृति कहते हैं । (५) यह पात रंग में काला, कठिन शरीरवाला, लाल नेत्रोंवाला, बड़ा पेटवाला, सबका अशुभ करने वाला और भयंकर है और बार-बार उत्पन्न होता है । विज्ञान भाष्य—इन तीन श्लोकों में दोनों पातों का बड़ा भयंकर चित्र खींचा गया है परन्तु तो भी काशी के अच्छे-अच्छे पंचांगों में भी इनकी चर्चा बहुत कम रहती है। बम्बई प्रान्त के भी पंचांगों में इनकी चर्चा नहीं देख पड़ती । हाँ, गुजराती के 'प्रत्यक्ष पंचांग' में इसका विचार अवश्य रहता है । इससे जान पड़ता है कि सूर्य- सिद्धान्त के इन महापातों का विचार फलित ज्योतिषी लोग बहुत कम करते हैं। व्यतीपात और वैधृति नाम के योग भी होते हैं । पहले की क्रम संख्या १७ और दूसरे की २७ है । व्यतीपात नामक योग का सम्बन्ध व्यतीपात नामक पात से कुछ भी नहीं है परन्तु वैधृत योग का सम्बन्ध इस नाम के पात से उस समय अवश्य रहा होगा जब वसंत-संपात अश्विनी नक्षत्र के आदि स्थान में था । सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति कब निश्चय करनी चाहिए— भास्करेन्द्वोर्भवक्रान्तश्चक्रार्धावधिसंस्थयोः । दृक्तुल्यसाधितांशादि युक्तयोः स्त्रावपक्रमौ ।।६।। १. वेंकटेश्वर प्रेस वाले और बंगला संस्करण में प्रवाहतः पाठ है ।
पाताधिकार ७०५ अनुवाद—(६) त्रिप्रश्नाधिकार में बतलायी हुई रीति से छाया सूर्य का भोगांश जानकर इससे स्पष्टाधिकार की रीति से जाने हुए स्पष्ट सूर्य को घटाकर अयनांश निकाले और यह अयनांश स्पष्ट सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों में जोड़े । अयनांश-संस्कृत सूर्य और चन्द्रमा अर्थात् सायन सूर्य और सायन चन्द्रमा के भोगांशों का जोड़ जब १२ राशि या ६ राशि हो तब इन दोनों की स्पष्ट क्रान्ति निश्चय करनी चाहिए । विज्ञान-भाष्य—यह जानने के लिए कि सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति कब समान होती है, सायन सूर्य और सायन चन्द्रमा के भोगांश जानने की आवश्यकता है इसीलिए स्पष्ट सूर्य और चन्द्रमा में अयनांश जोड़ने की विधि बतलायी गयी है । इस रीति से क्रान्ति-साम्य का जो समय आवेगा वह स्थूल होगा क्योंकि चन्द्रमा की कक्षा क्रान्तिवृत्त से भिन्न है । इस विषय की और बातें चित्र १२० के साथ ही बतला दी गयी हैं । यह जानना कि पात-काल बीत गया है या आनेवाला है— अथौजपदगस्येन्दोः क्रान्तिविक्षेपसंस्कृता । यदि स्यादधिका भानोः क्रान्तेः पातो गतस्तदा ॥७॥ ऊना चेत्स्यात्तदा भावी वामं युग्मपदस्य च । पदान्यत्वं विधोः क्रान्तिर्विक्षेपाच्चेद्विशुध्यति ॥८॥ अनुवाद—(७) सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्ति जानने के बाद यह देखना चाहिये कि चन्द्रमा वसंत-संपात से विषम पद में है या सम पद में । यदि चन्द्रमा विषम पद में हो और इसकी विक्षेप-संस्कृत क्रान्ति अर्थात् स्पष्ट क्रान्ति सूर्य की स्पष्ट क्रान्ति से अधिक हो तो समझना चाहिये कि पातकाल बीत गया है, (८) और यदि कम हो तो समझना चाहिये कि पातकाल आनेवाला है । परन्तु यदि चन्द्रमा समपद में हो तो इसका उलटा समझना चाहिये अर्थात् समपद में चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्ति सूर्य की क्रान्ति से अधिक हो तो समझना चाहिए कि पातकाल आनेवाला है और कम हो तो समझना चाहिए कि पातकाल बीत गया है । यदि चन्द्रमा के विक्षेप या शर से इसकी क्रान्ति कम हो और घटाना पड़े तो ऊपर के नियम में विषमपद के बारे में जो कुछ कहा गया है वह समपद के बारे में समझना चाहिये और समपद के बारे में जो कहा गया है वह विषमपद के बारे में समझना चाहिए । विज्ञान-भाष्य—ओज और युग्मपद अथवा विषम और समपद की चर्चा स्पष्टाधिकार पृष्ठ १२६-२७ में अच्छी तरह हुई है । यहाँ वसंत-संपात बिन्दु से सायन कर्क बिन्दु या दक्षिणायन बिन्दु तक प्रथम पद, दक्षिणायन बिन्दु से शरद सम्पात
७०६ सूर्य-सिद्धान्त बिन्दु तक द्वितीय पद, शरद सम्पात से सायन मकर या उत्तरायण बिन्दु तक तृतीय पद और उत्तरायण बिन्दु से बसंत सम्पात तक चतुर्थ पद है । प्रथम और तृतीय पदों को विषम या ओज पद और द्वितीय तथा चतुर्थ पद को सम पद या युग्म पद कहा गया है । चित्र १२० से स्पष्ट होता है कि जब चन्द्रमा विषमपद अर्थात् व द या श उ में कहीं रहेगा तब व्यतीपात या वैधृति के लिए सूर्य को क्रमानुसार द श या उ व में होना चाहिए । यह भी स्पष्ट है कि सूर्य या चन्द्रमा की क्रान्ति विषम पद में बढ़ती रहती है और समपद में घटती रहती है । इसलिए जब चन्द्रमा विषम पद में और सूर्य सम पद में होता है तब चन्द्रमा की क्रान्ति बढ़ती रहती है और सूर्य की घटती रहती है । इसलिए छठें श्लोक से पातकाल का जो स्थूल समय निकाला जाता है उस समय यदि चन्द्रमा की क्रान्ति सूर्य की क्रान्ति से अधिक है तो चन्द्रमा की क्रान्ति और बढ़ती जायगी और सूर्य की क्रान्ति घटती जायगी । इसलिए दोनों की क्रान्ति इस समय से पहले ही समान हो चुकी है और पातकाल बीत गया है। इसके विरुद्ध यदि चन्द्रमा की क्रान्ति सूर्य की क्रान्ति से कम हो तो चन्द्रमा की क्रान्ति बढ़ती रहने के कारण वह समय आने वाला है जब दोनों की क्रान्ति समान होगी और तभी ातकाल होगा । इसी तरह जब चन्द्रमा समपदों में होगा तब सूर्य विषम पदों में होगा । ऐसी दशा में चन्द्रमा की क्रान्ति घटती और सूर्य की बढ़ती रहेगी । इसलिए यदि चन्द्र- क्रान्ति अधिक है तो घटते-घटते सूर्य की क्रान्ति के बराबर हो जायगी और पातकाल श्लोक ६ से निकाले हुए समय के बाद आवेगा । परन्तु यदि चन्द्रक्रान्ति कम हो तो पातकाल बीता हुआ समझना चाहिए । आठवें श्लोक के उत्तरार्ध में यह बतलाया गया है कि यदि विक्षेप से मध्यक्रान्ति घटाकर स्पष्ट क्रान्ति आती हो तो ऊपर बतलाए हुए नियम से भिन्न नियम काम में लाना होगा क्योंकि यदि मध्य क्रान्ति और शर की दिशा भिन्न है तो सीधे ही यह नहीं बतलाया जा सकता कि चन्द्रक्रान्ति बढ़ रही है या घट रही है। ऐसी दशा में १ दिन आगे और पीछे की क्रान्ति जानने से ही काम चलेगा । असकृत्कर्म से तुल्य क्रान्तियों का स्थान निश्चय करना— क्रान्तिज्ये त्रिज्ययाऽभ्यस्ते परक्रान्तिज्ययोद्धृते । तच्चापान्तरमधं वा योज्यं भाविनि शीतगौ ॥६॥ शोध्यं चन्द्राद् गते पाते सूर्यस्य गन्तिताडितम् । चन्द्रभुक्त्या हृतं भानो लिप्तादि शशिवत्फलम् ॥१०॥ तद्वच्छशाङ्क पातस्य फलं देयं विपर्ययात् । कर्मेतदसकृत्कुर्यात् यावत्क्रान्ती समे तयोः ॥११॥
पाताधिकार ७०७ अनुवाद—(६) सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तिज्या को त्रिज्या से गुणा करके परम क्रान्तिज्या से भाग देना चाहिये । लब्धियों के धनु बनाकर उनका अन्तर निकाले । इस अन्तर को या इसके आधे को चन्द्रमा के भोगांश में जोड़ दे यदि पात- काल आने वाला हो और (१०) यदि पातकाल बीत चुका हो तो उस अन्तर या इसके उसके आधे को चन्द्रमा के भोगांश से घटा दे । इस अन्तर या आधे को जिसको जोड़ा या घटाया जाय उस दिन की सूर्य की गति से गुणा करके उस दिन की चन्द्रगति से भाग देना चाहिए । जो लब्धि आवे उसे सूर्य के भोगांश में उसी तरह जोड़ना या घटाना चाहिए जैसे चन्द्रमा में जोड़ा या घटाया है। (११) इसी प्रकार उस अन्तर या उसके आधे को चन्द्रपात अर्थात् राहु की गति से गुणा करके चन्द्र गति से भाग देकर जो लब्धि आवे उसे राहु के भोगांश में उलटे क्रम से संस्कार दे अर्थात् यदि चन्द्रमा में अन्तर जोड़ा हो तो राहु में घटाना चाहिए और घटाया है तो जोड़ना चाहिए। इन संस्कारों के बाद सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्ति फिर जाननी चाहिए। यदि दोनों समान न हों तो फिर ६-१० श्लोकों में बतलायी गयी क्रिया करनी चाहिए। यह असकृत्कर्म (Method of approxim- ation) तब तक करना चाहिए जब तक सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति समान न हो जायें । विज्ञान-भाष्य—नौवें श्लोक के पूर्वार्ध में जो नियम बतलाया गया है वह स्पष्टाधिकार के २८वें श्लोक में बतलाये गये नियम का विलोम है (पृष्ठ १२२- २३) । यहाँ क्रान्तिज्या, त्रिज्या और परम क्रान्तिज्या से भोगांश जानने की रीति है। इस रीति से जो भोगांश आवेगा वह ६० अंश से कम होगा । इससे अधिक जानने की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि हमको तो यही देखना है कि वसंत या शरद सम्पात से सूर्य और चन्द्रमा कितनी दूर हैं। स्पष्ट क्रान्ति भिन्न होने से यह भोगांश भी भिन्न होंगे परन्तु एक दूसरे के निकट अवश्य होंगे। इन भोगांशों का जो अन्तर होगा उतना ही चन्द्रमा पातकाल से आगे या पीछे होगा। यदि पातकाल आनेवाला है तो यह अन्तर चन्द्रमा के भोगांश में जोड़ना चाहिए क्योंकि उस समय तक चन्द्रमा इतना ही आगे बढ़ जायगा और यदि पातकाल बीत चुका है तो यह अन्तर चन्द्रमा के भोगांश से घटाना चाहिए क्योंकि बीते हुए पातकाल के समय चन्द्रमा इतना ही पीछे रहेगा। परन्तु सूर्य भी इतने समय में कुछ न कुछ स्थान छोड़ेगा । इसलिए पातकाल का सूर्य का स्थान भी स्पष्ट करना आवश्यक है। इसके लिए अनुपात से काम लेना चाहिए कि जब चन्द्रमा की दैनिक गति इतनी है तो सूर्य की दैनिक इतनी है इसलिए जब चन्द्रमा की गति उस अन्तर के समान होगी तब सूर्य की गति क्या होगी अर्थात् चन्द्र
७०८ सूर्य-सिद्धान्त दैनिक गति : चन्द्र अन्तर :: सूर्य की दैनिक : सूर्य अन्तर । इस प्रकार जो अन्तर आवे उसे सूर्य के भोगांश में जोड़ना चाहिए यदि चन्द्रमा का अन्तर जोड़ा गया हो, नहीं तो घटाना चाहिए। इस प्रकार पातकाल में सूर्य और चन्द्रमा के स्पष्ट भोगांश मालूम हो जायेंगे । इससे फिर सूर्य और चंद्रमा की स्पष्ट क्रान्ति जाननी चाहिये । परन्तु चन्द्रमा की स्पष्ट क्रांति जानने के लिए चंद्रमा का शर जानना आवश्यक है जो चंद्रमा के पात राहु या केतु पर अवलम्बित है और इतनी देर में चंद्रपात भी वक्रीगति से अपना स्थान बदल देगा इसलिए उसी प्रकार अनुपात से राहु का भी परिवर्तन जान लेना चाहिये । परन्तु इस परिवर्तन का संस्कार राहु में विलोम रीति से करना चाहिए अर्थात् जब चंद्रमा और सूर्य में जोड़ना हो तो इसमें घटाना चाहिये और घटाना हो तो जोड़ना चाहिये क्योंकि राहु की गति उलटी होती है । जब चंद्र- क्रांति में चंद्र-शर का संस्कार करके स्पष्ट क्रान्ति आ जाय तब देख पड़ेगा कि सूर्य की क्रान्ति अब भी कुछ भिन्न है । इन क्रान्तियों से ६-११ श्लोकों में बतलायी गयी रीति को फिर दुहरावे और तब तक दुहरावे जब तक दोनों की क्रान्ति समान न हो जाय । इसी को असकृत्कर्म कहते हैं जिसकी चर्चा पीछे कई जगह हो चुकी है । ६-११ श्लोकों में बतलाये गये नियम की इतनी व्याख्या पर्याप्त है । यहाँ मुझे केवल इतना ही कहना है कि यह सब झंझट करने पर भी पातकाल का ठीक-ठीक ज्ञान होना असंभव है क्योंकि चंद्रमा की गति इतनी सरल नहीं है जैसी सूर्य-सिद्धान्त में बतलायी गयी है । इसका शुद्ध स्थान जानने के लिए कई संस्कार करने पड़ते हैं जिनकी चर्चा स्पष्टाधिकार में अच्छी तरह की गयी है । इसलिए यदि पातकाल का ठीक-ठीक निर्णय करना हो तो आधुनिक वेधों से ही काम लेना चाहिए जिसके लिए आधुनिक सिद्धान्त के आधार पर सारणी आदि तैयार करनी चाहिये । नौवें श्लोक के उत्तरार्ध में बतलाया गया है कि सूर्य और चंद्रमा के भोगांशों के अंतर या इस अन्तर के आधे को जोड़ना या घटाना चाहिए । टीकाकारों ने लिखा है कि आधा तब लेना चाहिए जब अन्तर अधिक हो । इससे गणना में तो कोई भेद नहीं पड़ता, केवल कुछ सरलता आ जाती है क्योंकि उद्देश्य तो यह है कि असकृत्कर्म से वह समय जाना जाय जिस समय दोनों की क्रान्ति समान होती है । पातकाल अर्धरात्रि से पहले या पीछे- क्रान्त्योस्समत्वे पातोऽथ प्रक्षिप्तांशोनिते विधौ । हीनेऽर्धरात्रिकाद्यातो भावि तात्कालिकेऽधिके ॥१२॥ अनुवाद-सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्तियाँ जब समान होती हैं तभी पातकाल होता है। नौवें श्लोक के अनुसार जाना हुआ पातकालिक स्पष्ट चन्द्रमा का
पाताधिकार ७०६ भोगांश स्पष्टाधिकार के अनुसार जाने हुए उस दिन के अर्धरात्रिकालिक स्पष्ट चन्द्रमा के भोगांश से कम हो तो समझना चाहिए कि पातकाल अर्धरात्रि से पहले हो चुका है और अधिक हो तो समझना चाहिए कि पातकाल अर्धरात्रि के बाद होगा । विज्ञान-भाष्य-चन्द्रमा का भोगांश सदैव बढ़ता रहता है इसलिए यदि पातकालिक स्पष्ट चन्द्रमा का भोगांश अर्धरात्रिकालिक स्पष्ट चन्द्रमा के भोगांश से कम हो तो निश्चय है कि पातकाल अर्धरात्रि से पहले हो चुका है और अधिक है तो अर्धरात्रि के बाद होगा । पातकाल अर्धरात्रि से कितना पहले या पीछे है- स्थिरीकृतार्धरात्रेन्द्वोर्द्वयोर्विवरलिप्तिकाः । षष्टिघ्नाश्चन्द्रभुक्त्याप्ताः पातकालस्य नाडिकाः ॥१३॥ अनुवाद-उपर्युक्त नियम से निश्चित किया हुआ पातकालिक चन्द्र-भोगांश और उस दिन के अर्धरात्रिकालिक चन्द्रभोगांश के अंतर को कलाओं में लिखकर साठ से गुणा करने और गुणनफल को अर्धरात्रिकालिक चन्द्रगति से भाग देने से जो लब्धि आवेगी उतनी ही घड़ी पहले या पीछे पातकाल हुआ है या होगा । विज्ञान-भाष्य-पातकालिक चन्द्रमा और अर्धरात्रिकालिक चंद्रमा के भोगांशों के अंतर से यह मालूम होगा कि पातकालिक चन्द्रमा अर्धरात्रिकालिक चन्द्रमा से कितना पहले या पीछे था । फिर यह गणना करनी चाहिए कि अर्धरात्रि- कालिक चन्द्रमा की दैनिक गति ६० घड़ी में होती है तो वह अंतर कितनी घड़ी में हुआ होगा । इतना ही आगे या पीछे पातकाल होना चाहिए । यदि सूर्य और चन्द्र की गणना आधुनिक सिद्धान्त द्वारा बहुत सूक्ष्म की जाय तो भी इस नियम से जो पातकाल आवेगा वह स्थूल होगा क्योंकि पातकालिक गणना बहुत सूक्ष्म होती है और चन्द्रमा की दैनिक गति इतनी अधिक होती है कि यदि अर्द्धरात्रिकालिक गति को पातकालिक समझ लिया जाय जैसा कि इस नियम में समझा गया है तो सूक्ष्मता नहीं आ सकती क्योंकि यदि पातकाल और अर्द्धरात्रि काल में बहुत अंतर है तो दोनों समय की चन्द्रगतियाँ समान नहीं होंगी इसलिए मेरी समझ में यह अच्छा होगा कि इस नियम से जो पातकाल आवे उस समय से दो घड़ी आगे और पीछे की चन्द्रगतियों से काम लिया जाय । पातकाल के आरम्भ और समाप्त होने का समय जानना- रवीन्दोर्मानयोगार्धं षष्ट्या संगुण्य भाजयेत् । तयोर्भुक्त्यन्यरेणाप्तं स्थित्यर्धं नाडिकादिकम् ॥१४॥
७१० सूर्य-सिद्धान्त पातकालस्फुटो मध्यः सोऽपि स्थित्यर्धर्वाजितः । तस्य संभवकालस्स्यात् संयुक्तस्तद्वान्तसंज्ञितः ॥१५॥ अनुवाद—(१४) सूर्य और चन्द्रबिम्बों के मानों को जोड़कर आधा करे और इसको ६० से गुणा करके दोनों की गतियों के अन्तर से भाग दे दे तो लब्धि स्थित्यर्ध घड़ी होती है । (१५) इसको स्पष्ट पातकाल से जो पात का मध्यकाल होता है घटा देने से जो समय आता है उसी समय पातकाल का आरम्भ होता है और जोड़ने से जो समय आता है उसी समय पातकाल का अन्त होता है । विज्ञान-भाष्य — स्थित्यर्ध की जो परिभाषा चन्द्रग्रहणाधिकार पृष्ठ ४६८- ७० में दी गयी है वही यहाँ भी समझनी चाहिए । पृष्ठ ४६६ में ६० × च फ / चा - रा सूत्र दिया गया है । यदि इसमें च फ की जगह सूर्य और चन्द्र-बिम्बों के योग का आधा रख दिया जाय तो पातकाल का स्थित्यर्ध हो जायगा जिसे जानने का नियम १४वें श्लोक में बतलाया गया है । १५वें श्लोक में स्थित्यर्ध से आरम्भ और अन्तकाल उसी तरह जाना जाता है जिस तरह ग्रहण का स्पर्श और मोक्षकाल जाना जाता है । इसका सार यह है कि जिस समय चन्द्रमा और सूर्य के बिम्बों के किनारों की क्रान्ति समान होती है उस समय से पातकाल का आरम्भ होता है और जिस समय दोनों बिम्बों के केन्द्रों की क्रान्ति समान होती है उस समय पात का मध्य- काल होता है जिसके जानने की रीति १३ श्लोकों तक बतलायी गयी है और जिस समय दोनों बिम्बों के दूसरे किनारों की क्रान्तियाँ भी समान हो जाती हैं उस समय पातकाल का अन्त होता है । पातकाल का प्रभाव और उसके योग्य कर्म— आद्यन्तकालयोर्मध्ये कालो ज्ञेयोऽतिदारुणः । प्रज्वलज्जलनाकारः सर्वकर्मसु गर्हितः ॥१६॥ एककाष्ठां गतं यावदर्कैन्दोर्मण्डलान्तरम् । संभवस्तावदेवास्य सर्वकर्मविनाशकृत् ॥१७॥ स्नानदानजपश्राद्धव्रतहोमादिकर्मसु । प्राप्यते सुमहच्छ्रेयः तत्कालज्ञानतस्तदा ॥१८॥ अनुवाद—(१६) पातकाल के आरंभ से अंत तक का समय बड़ा दारुण, प्रज्वलित, और अग्नि स्वरूप होता है। यह सब शुभ कार्यों के लिए निन्दित है । (१७) जब तक सूर्य बिम्ब के किसी विन्दु की क्रान्ति चन्द्रबिम्ब के किसी विन्दु की