सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाताधिकार ७०६ भोगांश स्पष्टाधिकार के अनुसार जाने हुए उस दिन के अर्धरात्रिकालिक स्पष्ट चन्द्रमा के भोगांश से कम हो तो समझना चाहिए कि पातकाल अर्धरात्रि से पहले हो चुका है और अधिक हो तो समझना चाहिए कि पातकाल अर्धरात्रि के बाद होगा । विज्ञान-भाष्य-चन्द्रमा का भोगांश सदैव बढ़ता रहता है इसलिए यदि पातकालिक स्पष्ट चन्द्रमा का भोगांश अर्धरात्रिकालिक स्पष्ट चन्द्रमा के भोगांश से कम हो तो निश्चय है कि पातकाल अर्धरात्रि से पहले हो चुका है और अधिक है तो अर्धरात्रि के बाद होगा । पातकाल अर्धरात्रि से कितना पहले या पीछे है- स्थिरीकृतार्धरात्रेन्द्वोर्द्वयोर्विवरलिप्तिकाः । षष्टिघ्नाश्चन्द्रभुक्त्याप्ताः पातकालस्य नाडिकाः ॥१३॥ अनुवाद-उपर्युक्त नियम से निश्चित किया हुआ पातकालिक चन्द्र-भोगांश और उस दिन के अर्धरात्रिकालिक चन्द्रभोगांश के अंतर को कलाओं में लिखकर साठ से गुणा करने और गुणनफल को अर्धरात्रिकालिक चन्द्रगति से भाग देने से जो लब्धि आवेगी उतनी ही घड़ी पहले या पीछे पातकाल हुआ है या होगा । विज्ञान-भाष्य-पातकालिक चन्द्रमा और अर्धरात्रिकालिक चंद्रमा के भोगांशों के अंतर से यह मालूम होगा कि पातकालिक चन्द्रमा अर्धरात्रिकालिक चन्द्रमा से कितना पहले या पीछे था । फिर यह गणना करनी चाहिए कि अर्धरात्रि- कालिक चन्द्रमा की दैनिक गति ६० घड़ी में होती है तो वह अंतर कितनी घड़ी में हुआ होगा । इतना ही आगे या पीछे पातकाल होना चाहिए । यदि सूर्य और चन्द्र की गणना आधुनिक सिद्धान्त द्वारा बहुत सूक्ष्म की जाय तो भी इस नियम से जो पातकाल आवेगा वह स्थूल होगा क्योंकि पातकालिक गणना बहुत सूक्ष्म होती है और चन्द्रमा की दैनिक गति इतनी अधिक होती है कि यदि अर्द्धरात्रिकालिक गति को पातकालिक समझ लिया जाय जैसा कि इस नियम में समझा गया है तो सूक्ष्मता नहीं आ सकती क्योंकि यदि पातकाल और अर्द्धरात्रि काल में बहुत अंतर है तो दोनों समय की चन्द्रगतियाँ समान नहीं होंगी इसलिए मेरी समझ में यह अच्छा होगा कि इस नियम से जो पातकाल आवे उस समय से दो घड़ी आगे और पीछे की चन्द्रगतियों से काम लिया जाय । पातकाल के आरम्भ और समाप्त होने का समय जानना- रवीन्दोर्मानयोगार्धं षष्ट्या संगुण्य भाजयेत् । तयोर्भुक्त्यन्यरेणाप्तं स्थित्यर्धं नाडिकादिकम् ॥१४॥