सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१० सूर्य-सिद्धान्त पातकालस्फुटो मध्यः सोऽपि स्थित्यर्धर्वाजितः । तस्य संभवकालस्स्यात् संयुक्तस्तद्वान्तसंज्ञितः ॥१५॥ अनुवाद—(१४) सूर्य और चन्द्रबिम्बों के मानों को जोड़कर आधा करे और इसको ६० से गुणा करके दोनों की गतियों के अन्तर से भाग दे दे तो लब्धि स्थित्यर्ध घड़ी होती है । (१५) इसको स्पष्ट पातकाल से जो पात का मध्यकाल होता है घटा देने से जो समय आता है उसी समय पातकाल का आरम्भ होता है और जोड़ने से जो समय आता है उसी समय पातकाल का अन्त होता है । विज्ञान-भाष्य — स्थित्यर्ध की जो परिभाषा चन्द्रग्रहणाधिकार पृष्ठ ४६८- ७० में दी गयी है वही यहाँ भी समझनी चाहिए । पृष्ठ ४६६ में ६० × च फ / चा - रा सूत्र दिया गया है । यदि इसमें च फ की जगह सूर्य और चन्द्र-बिम्बों के योग का आधा रख दिया जाय तो पातकाल का स्थित्यर्ध हो जायगा जिसे जानने का नियम १४वें श्लोक में बतलाया गया है । १५वें श्लोक में स्थित्यर्ध से आरम्भ और अन्तकाल उसी तरह जाना जाता है जिस तरह ग्रहण का स्पर्श और मोक्षकाल जाना जाता है । इसका सार यह है कि जिस समय चन्द्रमा और सूर्य के बिम्बों के किनारों की क्रान्ति समान होती है उस समय से पातकाल का आरम्भ होता है और जिस समय दोनों बिम्बों के केन्द्रों की क्रान्ति समान होती है उस समय पात का मध्य- काल होता है जिसके जानने की रीति १३ श्लोकों तक बतलायी गयी है और जिस समय दोनों बिम्बों के दूसरे किनारों की क्रान्तियाँ भी समान हो जाती हैं उस समय पातकाल का अन्त होता है । पातकाल का प्रभाव और उसके योग्य कर्म— आद्यन्तकालयोर्मध्ये कालो ज्ञेयोऽतिदारुणः । प्रज्वलज्जलनाकारः सर्वकर्मसु गर्हितः ॥१६॥ एककाष्ठां गतं यावदर्कैन्दोर्मण्डलान्तरम् । संभवस्तावदेवास्य सर्वकर्मविनाशकृत् ॥१७॥ स्नानदानजपश्राद्धव्रतहोमादिकर्मसु । प्राप्यते सुमहच्छ्रेयः तत्कालज्ञानतस्तदा ॥१८॥ अनुवाद—(१६) पातकाल के आरंभ से अंत तक का समय बड़ा दारुण, प्रज्वलित, और अग्नि स्वरूप होता है। यह सब शुभ कार्यों के लिए निन्दित है । (१७) जब तक सूर्य बिम्ब के किसी विन्दु की क्रान्ति चन्द्रबिम्ब के किसी विन्दु की