सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाताधिकार ७११ क्रान्ति के समान होती है तब तक सब कर्मों का नाश करनेवाले इस पात की स्थिति रहती है। (१८) इस काल में स्नान, दान, जप, श्राद्ध, व्रत, होम आदि कर्मों से अत्यन्त पुण्य प्राप्त होता है और इस काल के ज्ञान से भी पुण्य होता है । विज्ञान-भाष्य -- जैसे पूर्णिमा, अमावस्या आदि कालों में स्नान, दान, जप अदि काम अच्छे समझे जाते हैं वैसे ही पातकाल में भी यह कर्म अच्छे बतलाये गये हैं और जिस प्रकार मुहूर्त-चिंतामणि में बतलाये गये बहुत से योगों में शुभ कर्म करना वर्जित है उसी प्रकार यहाँ भी । परन्तु ज्योतिषी लोग यथार्थ में इन महापातों का विचार कम करते हैं, वह शायद इसलिए कि इसकी गणना पुराने सिद्धान्तों के आधार पर तो असम्भव ही है । इसीलिए पंचांगों में इनकी चर्चा नहीं के बराबर रहती है। हिन्दू विश्वविद्यालय के विश्व-पंचांग में भी दो एक जगह चर्चा करके छोड़ दिया जाता है यद्यपि इसके लेखकों को नाविक-पंचांग की सहायता से पातकाल का जानना बड़ा सुगम होता है क्योंकि और बातों में तो ये नाविक पंचांग से सहायता लेते ही हैं। १८वें श्लोक की अंतिम बात निस्संदेह बहुत सुन्दर है। उसमें यह बतलाया गया है कि पातकाल के जानने से भी पुण्य होता है अर्थात् पातकाल का शुद्ध-शुद्ध ज्ञान प्राप्त करना भी पुण्य कार्य है जो तभी संभव है जब सूर्य, चन्द्रमा इत्यादि की गणना ठीक-ठीक दृक्तुल्यता से की जाय और ज्योतिष सिद्धान्त का पठन-पाठन नवीन वैज्ञानिक रीति से किया जाय। केवल प्राचीन सिद्धान्तों को ही सब कुछ समझना और उनमें देशकाल के अनुसार संशोधन न करना तथा शुद्ध वैज्ञानिक रीति को निंदित समझना बुद्धिमानी नहीं है और न प्राचीन ज्योतिषाचार्यों की पद्धति के ही अनुकूल है। रवीन्द्वोः तुल्यता क्रान्त्योर्विषुवत्सन्निधौ यदा । द्विर्भवत्येव तदा पात: स्यादभावो विपर्ययात् ।।१६।। अनुवाद - जब विषुवद् वृत्त के निकट अर्थात् वसंत संपात या शरद संपात के पास सूर्य चन्द्रमा की क्रान्तियाँ समान होती हैं तब पात दो बार होते हैं। इसके विपरीत दशा में अर्थात् सायन कर्क या सायन मकर बिन्दु के समीप पात का अभाव होता है। विज्ञान-भाष्य - जब सूर्य और चन्द्रमा वसंत या शरद सम्पात के पास होते हैं तब इनकी क्रान्तियों की गति बहुत तीव्र होती है। इसलिए जब चन्द्रमा विषुवत् वृत्त के दक्षिण होता है और सूर्य उत्तर तब दोनों की क्रान्तियाँ समान होती हैं। इसके बाद जब चन्द्रमा शीघ्र गति से कारण उत्तर हो जाता है तब भी इसकी क्रान्ति सूर्य की क्रान्ति के समान हो जाती है। इस प्रकार क्रान्ति-साम्य दो बार एक ही दो दिन के बीच में हो सकता है। परन्तु जब सूर्य और चन्द्रमा दोनों