सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१२ सूर्य-सिद्धान्त विषुवद्वृत्त से उत्तर रहेंगे तब अमावस्या का समय होगा और ऐसी दशा में पात- काल नहीं माना जाता जैसा कि पहले और दूसरे श्लोकों से सिद्ध होता है। इसलिए जान पड़ता है कि केवल यह विशेषता बतलाने के लिए श्लोक १६ दिया गया है कि क्रान्ति-साम्य दो बार हो सकता है, दो ही एक दिन के अन्तर पर । परन्तु यदि सूर्य सायन कर्क या सायन मकर विन्दुओं के समीप हो तो इसकी क्रान्ति परम क्रान्ति के निकट रहती है। यदि इस समय चन्द्रमा की क्रान्ति शर की दिशा भिन्न होने के कारण कम हो तो क्रान्ति साम्य नहीं हो सकता और न वैधृति या व्यतीपात का ही संयोग घट सकता है। तीसरे प्रकार का व्यतीपात जानने की रीति-- शशाङ्कार्कयुतेलिप्ता भभोगेन विभाजिताः । लब्धं सप्तदशान्तोऽन्यो व्यतीपातः तृतीयकः ॥२०॥ अनुवाद—सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों को जोड़कर कला बनावे और इसको ८०० से भाग दे दे। यदि लब्धि १७ के अन्त में हो अर्थात् १७ के निकट हो तो तीसरा व्यतीपात होता है। विज्ञान भाष्य—स्पष्टाधिकार के श्लोक ६५ में विष्कम्भादि २७ योगों के जानने की रीति दी हुई है। इनमें १७ वां योग व्यतीपात बतलाया गया है (देखो पृष्ठ २१६ ) । इसी के जानने की रीति यहाँ भी दुहरायी गयी है। वह इसलिए, जिससे मालूम हो जाय कि इस अधिकार में क्रान्ति-साम्य से उत्पन्न जिन महापातों की चर्चा है उन्हीं के समकक्ष व्यतीपात नामक योग भी होता है। इसी तर्क से कहा जा सकता है कि २७वें योग वैधृति को भी वैधृति नामक महापात के समान समझना चाहिए । यहां एक बात ध्यान देने की है। व्यतीपात और वैधृति योगों की गणना सूर्य और चन्द्रमा के निरयण भोगांशों से की जाती है परन्तु महापातों की गणना सायन भोगांशों से की जाती है। इसलिए यहां यह प्रश्न उपस्थित होता है कि २०वें श्लोक में जो नियम दिया गया है उसमें सायन भोगांशों का प्रयोग करना चाहिए या निरयण । गूढ़ार्थ प्रकाशिका संस्कृत टीका में तो अयनांश संस्कृत भोगांश अर्थात् सायन भोगांश से ही गणना करने को बतलाया गया है और इसी का अनुसरण पं० माधव पुरोहित ओर पं० इन्द्रनारायण द्विवेदी ने किया है। परन्तु स्वामी विज्ञानानन्द ने अपनी बंगला टीका में कोई चर्चा नहीं की है। मुझे जान पड़ता है कि यह व्यतीपात विष्कम्भादि योगों का ही व्यतीपात है, उससे भिन्न नहीं है। इसलिए जिस प्रकार इन योगों की गणना होती है उसी प्रकार इस श्लोक में बतलाये हुए व्यतीपात की