सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाताधिकार ७१३ गणना करनी चाहिए अर्थात् निरयण भोगांशों से ही इसकी गणना होनी चाहिए तथा गूढ़ार्थ प्रकाशिका के अयनांश-संस्कृत भोगांशों को न लेना चाहिए । सायन भोगांश लेने में एक अड़चन और है । वह यह कि इससे जो व्यतीपात या वैधृति काल आवेगा वह विष्कम्भादि योगों के व्यतीपात और वैधृति से भी भिन्न होगा । इस प्रकार एक मास में चार-चार व्यतीपात और वैधृति कालों की कल्पना करनी पड़ेगी जो ग्रन्थकार की तर्क-शैली से भी अनुचित जान पड़ती है । भसंधि और गंडान्त योग कब होता है— सार्पेन्द्रपौष्णधिष्ण्यानामन्त्याः पादा भसन्धयः । तदग्रभेष्वद्यपदो गण्डान्तं नाम कीर्त्यते ॥२१॥ अनुवाद—आश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्रों के चौथे चरण नक्षत्र-सन्धि हैं और इनके आगेवाले नक्षत्रों मघा, मूल, और अश्विनी के प्रथम चरण गंडांत कहलाते हैं । विज्ञान-भाष्य—मुहूर्त-चिन्तामणि तथा अन्य मुहूर्त ग्रन्थों में इनकी चर्चा विशेष प्रकार से है । नक्षत्र-संधि या गंडांत में जो संतान होती है उसके लिए साधा- रणतः कहा जाता है कि मूल में हुई है । इसे अशुभ मानते हैं । बच्चा पैदा होने के २७वें दिन जब वही गंडांत या भसंधि काल फिर आता है तब मूलशान्ति के लिए विशेष प्रकार की पूजा की जाती है । यहाँ गंडांत की चर्चा करने का अर्थ यही जान पड़ता है कि जो अशुभ फल महापातों का होता है यही गंडांत का भी होता है जैसा कि अगले श्लोक से प्रकट है । यह भसंधियां चौथी, आठवीं, और बारहवीं राशियों के अंतिम भाग हैं और गंडांत पांचवीं, नवीं और पहली राशियों के आरंभिक भाग हैं । व्यतीपातत्रयं घोरं गण्डान्तं त्रितयं तथा । एवं भसन्धित्रितयं सर्व कर्मसु वर्जयेत् ॥२२॥ अनुवाद—तीनों व्यतीपात, तीनों गंडांत और नक्षत्रसंधियां बहुत भयंकर होती हैं इसलिए ये सब शुभकामों में वर्जित हैं अर्थात् जब ये हों तब कोई शुभ कर्म नहीं करना चाहिये । विज्ञान-भाष्य—इस श्लोक में वैधृत व्यतीपात की चर्चा नहीं है परन्तु तर्क शैली से और पहले के श्लोकों से जान पड़ता है कि वैधृति भी इसमें सम्मिलित है । टीकाकारों ने ऐसा ही किया भी है । उपसंहार— इत्येवं परमं पुण्यं ज्योतिषां चरितं हितं । रहस्यमिदमाख्यातं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥२३॥ १८