सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१४ सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—मैंने यह परम पवित्र अत्यन्त रहस्ययुक्त और हितकर ज्योति- विज्ञान की कथा कही, अब और क्या सुनना चाहता है ? विज्ञान-भाष्य — सूर्यांश पुरुष ने मयासुर से जिस ज्योतिर्विज्ञान की कथा पहले अधिकार में आरंभ की थी उसका अंत यहाँ हुआ । इस पर मयासुर ने जो प्रश्न किये उसकी चर्चा आगे तीन अध्यायों में होगी । इसलिए यहाँ तक जो कुछ कहा गया है उसे सूर्य-सिद्धान्त का पूर्वार्ध कहते हैं । इसके आगे जो तीन अध्याय हैं उन्हें उत्तरार्ध कहते हैं । अब हम यहाँ संक्षेप में यह बतला कर कि महापातों की गणना कैसे की जाती है इस पूर्वार्ध को समाप्त करेंगे । पंचांगों से महापातों का स्थूलकाल निश्चय करना—विष्कम्भादि २७ योगों की गणना पंचांगों में अवश्य रहती है । इनको जानने की रीति स्पष्टा- धिकार के ६५ वें श्लोक में बतलायी गयी है जो यह है—सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों को जोड़ कर कला बनाओ और इसको ८०० से भाग दे दो। जो लब्धि आवे उससे बीते हुए योगों की संख्या मालूम होती है और जो शेष बचता है उससे वर्तमान योग का ज्ञान होता है । इस नियम में सूर्य और चन्द्रमा के भोगांश अश्विनी नक्षत्र के आदि बिन्दु से नापे जाते हैं और महापातों की गणना के लिए भोगांशों की नाप वसंत-संपात विन्दु से की जाती है । यदि दोनों के लिए भोगांशों की नाप वसंत-संपात से होती तो महापातों का समय जानना बड़ा सुगम होता क्योंकि जिस समय १४वें योग हर्षण का आधा समय बीतता उस समय सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का जोड़ १८० अंश होता और व्यतीपात नामक पातकाल का मध्य होता है और जिस समय वैधृति योग का अंत होता उसी समय वैधृति नामक पात का मध्यकाल होता । परन्तु बात ऐसी नहीं है । इसलिए इसमें थोड़ा सा संस्कार करना पड़ेगा । सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार अश्विनी का आदि-विन्दु आजकल जहाँ है वहाँ से वेध-द्वारा-सिद्ध वसंत संपात बिन्दु २२ अंश ४५ कला के लगभग पच्छिम है । इसी अन्तर को अयनांश कहते हैं । यदि यहाँ से सूर्य और चन्द्रमा के भोगांश लिये जायँ तो दोनों का जोड़ ४५ अंश ३० कला अधिक होता है । व्यतीपात के लिए सूर्य और चन्द्रमा के सायन भोगांशों का जोड़ १८० अंश होता है, इसलिए १८० अंश - ४५ अंश ३० कला = १३४ अंश ३० कला = ८०७० कला । यह अश्विनी नक्षत्र के आदि-विन्दु से व्यती- पातकालिक सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का जोड़ है । इसको ८०० कला से भाग देने पर १० लब्धि और ७० कला शेष होते हैं । १० से सिद्ध होता है कि व्यतीपात काल में गंड योग बीता रहता है और वृद्धि योग का आरम्भ हुआ रहता है । इस-