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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

७१४ सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—मैंने यह परम पवित्र अत्यन्त रहस्ययुक्त और हितकर ज्योति- विज्ञान की कथा कही, अब और क्या सुनना चाहता है ? विज्ञान-भाष्य — सूर्यांश पुरुष ने मयासुर से जिस ज्योतिर्विज्ञान की कथा पहले अधिकार में आरंभ की थी उसका अंत यहाँ हुआ । इस पर मयासुर ने जो प्रश्न किये उसकी चर्चा आगे तीन अध्यायों में होगी । इसलिए यहाँ तक जो कुछ कहा गया है उसे सूर्य-सिद्धान्त का पूर्वार्ध कहते हैं । इसके आगे जो तीन अध्याय हैं उन्हें उत्तरार्ध कहते हैं । अब हम यहाँ संक्षेप में यह बतला कर कि महापातों की गणना कैसे की जाती है इस पूर्वार्ध को समाप्त करेंगे । पंचांगों से महापातों का स्थूलकाल निश्चय करना—विष्कम्भादि २७ योगों की गणना पंचांगों में अवश्य रहती है । इनको जानने की रीति स्पष्टा- धिकार के ६५ वें श्लोक में बतलायी गयी है जो यह है—सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों को जोड़ कर कला बनाओ और इसको ८०० से भाग दे दो। जो लब्धि आवे उससे बीते हुए योगों की संख्या मालूम होती है और जो शेष बचता है उससे वर्तमान योग का ज्ञान होता है । इस नियम में सूर्य और चन्द्रमा के भोगांश अश्विनी नक्षत्र के आदि बिन्दु से नापे जाते हैं और महापातों की गणना के लिए भोगांशों की नाप वसंत-संपात विन्दु से की जाती है । यदि दोनों के लिए भोगांशों की नाप वसंत-संपात से होती तो महापातों का समय जानना बड़ा सुगम होता क्योंकि जिस समय १४वें योग हर्षण का आधा समय बीतता उस समय सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का जोड़ १८० अंश होता और व्यतीपात नामक पातकाल का मध्य होता है और जिस समय वैधृति योग का अंत होता उसी समय वैधृति नामक पात का मध्यकाल होता । परन्तु बात ऐसी नहीं है । इसलिए इसमें थोड़ा सा संस्कार करना पड़ेगा । सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार अश्विनी का आदि-विन्दु आजकल जहाँ है वहाँ से वेध-द्वारा-सिद्ध वसंत संपात बिन्दु २२ अंश ४५ कला के लगभग पच्छिम है । इसी अन्तर को अयनांश कहते हैं । यदि यहाँ से सूर्य और चन्द्रमा के भोगांश लिये जायँ तो दोनों का जोड़ ४५ अंश ३० कला अधिक होता है । व्यतीपात के लिए सूर्य और चन्द्रमा के सायन भोगांशों का जोड़ १८० अंश होता है, इसलिए १८० अंश - ४५ अंश ३० कला = १३४ अंश ३० कला = ८०७० कला । यह अश्विनी नक्षत्र के आदि-विन्दु से व्यती- पातकालिक सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का जोड़ है । इसको ८०० कला से भाग देने पर १० लब्धि और ७० कला शेष होते हैं । १० से सिद्ध होता है कि व्यतीपात काल में गंड योग बीता रहता है और वृद्धि योग का आरम्भ हुआ रहता है । इस-

पाताधिकार ७१५ लिए स्थूल रूप से व्यतीपात काल को निश्चय करने के लिए जिस समय वृद्धि योग का आरम्भ होता है उसी समय के सूर्य चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्ति जानकर व्यतीपात काल की सूक्ष्म गणना करनी चाहिए । वैधृति नामक पातकाल का निश्चय करने के लिए ४५ अंश ३० कला को ३६० अंश से घटाना चाहिए। ऐसा करने से शेष आया ३१४ अंश ३० कला = १८८७० कला । इसको ८०० से भाग देने पर २३ लब्धि और ४७० कला शेष हुए, जिससे प्रकट होता है कि वैधृति नामक पातकाल में २३ वां योग शुभ बीता रहता है और २४वें योग शुक्ल का भी आधा बीत चुका रहता है। इसलिए स्थूल रूप से वैधृति नामक पात शुक्ल योग के आधे भाग पर होता है। इसलिए सूक्ष्म गणना करने के लिए इसी समय के सूर्य, और चन्द्रमा और स्पष्टक्रान्ति जाननी चाहिए। इसके लिए सूर्य, चन्द्रमा और राहु के स्पष्ट भोगांश, सूर्य की क्रान्ति, चन्द्रमा की मध्यमक्रान्ति और शर जानकर इसका संस्कार करके चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्ति जाननी चाहिए जिसकी रीति स्पष्टाधिकार पृ० १६६-२०० में बतलायी गयी है। इसलिए उदाहरण में इन सब बातों के बतलाने की आवश्यकता नहीं जाना पड़ती। यहाँ केवल यह दिखलाना पर्याप्त होगा कि सूर्य-सिद्धान्त के ध्रुवाङ्कों से महापातों के समय की गणना करना न तो सुगम ही है और न शुद्ध जब कि आधुनिक रीति से जाने हुए ध्रुवाङ्कों से यह बात शुद्धतापूर्वक जानी जा सकती है। मेरे पास इस समय १६२६ ई० का नाविक पंचांग मौजूद है इसलिए इसी की सहायता से वैशाख शुक्ल १८८६ विक्रमीय के व्यतीपात नामक महापात की गणना की जाती है । १८८६ के वैशाख शुक्ल पक्ष में गंड योग का अंत १४ मई को ४२ घड़ी ४० पल पर होता है और इसके बाद वृद्धि योग का आरम्भ होता है इसलिए १४ या १५ मई को व्यतीपात नामक महापात होगा : अब नाविक पंचांग से यह देखना चाहिए कि इन तारीखों में किस समय सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्तियां समान होंगी । नाविक पंचांग के पृष्ठ ५१ से जान पड़ता है कि १४ मई को सूर्य का उत्तर क्रान्ति १८ अंश ३४ कला और ४२ विकला है तथा १५ मई को १८ अंश ४६ कला और ६ विकला है। परन्तु चन्द्रमा की क्रान्ति १४ मई को २२ अंश से अधिक है इसलिए १४ मई को व्यतीपात काल नहीं आवेगा परन्तु १५ मई की शाम को यह घटना हो सकती है क्योंकि, अंश कला वि० १५ मई के मध्याह्न काल में सूर्य की क्रान्ति १८ ४६ ६.१ १६ " " " १६ ३ १०'६

७१६ सूर्य-सिद्धान्त २४ घंटे में क्रान्तिगति १४ ४.८ १५ मई के सायंकाल ६ बजे चंद्रक्रान्ति १८ ५४ ११.५ ,, ,, ७ ,, ,, १८ ४२ ३३.४ १ घंटे में चन्द्रक्रान्ति की गति ११ ३८.१ यहाँ सूर्य क्रान्ति बढ़ रही है और चन्द्रमा की घट रही है इसलिए चन्द्रमा की क्रान्ति की गति से यह निश्चय है कि ६ बजे के आसपास ही दोनों की क्रान्तियां समान होंगी । ६ घंटे में सूर्य की क्रान्ति की गति ६/२४ × (१ कला ४.८ विकला) = ३ कला ३१.२ विकला है। इसलिए ६ बजे सायंकाल सूर्य की क्रान्ति हुई १८ अंश ४६ कला ६.१ विकला + ३ कला ३१.२ विकला = १८ अंश ५२ कला ३७.३ विकला। यह छः बजे की चन्द्र क्रान्ति से कम है और चन्द्र-क्रान्ति घट रही है तथा सूर्य-क्रान्ति बढ़ रही है इसलिए छः बजे के बाद ही कुछ मिनिटों में दोनों की क्रान्तियाँ समान होंगी। यह जानने के लिये दोनों की क्रान्तियों के अन्तर को दोनों की क्रान्ति-गतियों के अंतर से भाग देना चाहिये । अंश कला विकला ६ बजे चन्द्र-क्रान्ति = १८ ५४ ११.५ ,, सूर्य क्रान्ति = १८ ५२ ३७.३ दोनों का अन्तर = १ ३४.२ = ६४.२ वि० सूर्य की १ घंटे की क्रान्ति-गति = (१४ कला ४.८ वि०) / २४ = ३५.२ विकला चंद्रमा की १ घंटे की क्रान्ति गति = ११ कला ३८.१ विकला दोनों की दिशाएँ भिन्न हैं इसलिए इनका अंतर जानने के लिए इनको जोड़ना चाहिए । इसलिए दोनों का योग = १२ कला १३.३ विकला = ७३३.३ विकला । जब ७३३.३ विकला का अंतर १ घंटे में होता है तब ६४.२ विकला का अंतर कितने समय में होगा । ७३३.३ : ६४.२ : : १ घंटा : इष्टकाल ∴ इष्टकाल = (६४.२ × १) / ७३३.३ घंटा = (६४.२ × १ × ६०) / ७३३.३ मिनट = ७ मिनट ४३ सेकंड के लगभग

पाताधिकार ७१७ इसलिए १५ मई को ६ बजकर ७ मिनट ४३ सेकंड पर व्यतीपात का मध्यकाल होगा । परन्तु यह गणना ग्रीनविच के टाइम से की गई है जो भारतवर्ष के रेलवे टाइम से ५ घंटा ३० मिनट पीछे है। इसलिए भारतवर्ष के रेलवे टाइम के अनुसार १५ मई की रात को ११ बजकर ३७ मिनट ४३ सेकंड पर व्यतीपात काल का मध्य होगा । अब स्थित्यर्ध-काल जानकर इससे घटाया जाय तो व्यतीपात काल का प्रारंभ काल आ जायगा और जोड़ा जाय तो अंतकाल आवेगा। यह १४वें श्लोक के अनुसार सुगमतापूर्वक हो सकता है इसलिए उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती । इस प्रकार पाताधिकार नामक ११वें अध्याय का विज्ञान भाष्य समाप्त हुआ ।

द्वादश अध्याय भूगोलाध्याय (संक्षिप्त वर्णन) [ श्लोक १-६—मयासुर के भूगोल, खगोल तथा ऋतु सम्बन्धी अनेक प्रश्न । श्लोक १०-११—सूर्यांश पुरुष का मयासुर से उत्तर सुनने के लिए कहना । श्लोक १२-२३—वासुदेव से लेकर पंच महाभूतों तक की उत्पत्ति का क्रम । श्लोक २४—पाँच ताराग्रहों की उत्पत्ति । श्लोक २५—बारह राशियों और २७ नक्षत्रों की उत्पत्ति । श्लोक २६-३०—चराचर जगत् की उत्पत्ति । श्लोक ३०-३३—ब्रह्माण्ड में ग्रहों की कक्षाओं का क्रम और पृथ्वी का स्थान । श्लोक ३३-३६—भूगोल में पाताल, सुमेरु आदि के स्थान । श्लोक ३७-४२—विषुवत्रेखा पर स्थित चार नगरों के स्थान । श्लोक ४३-४५—विषुवत्रेखा और उत्तर दक्षिण ध्रुवों का सम्बन्ध । श्लोक ४६—भिन्न ऋतुओं में सूर्य की किरणें मन्द और तीव्र क्यों होती हैं । श्लोक ४७- ५०—उत्तर ध्रुवनिवासियों अर्थात् देवताओं और दक्षिण ध्रुव निवासियों अर्थात् असुरों के दिन रात का विभाग । श्लोक ५१—देवताओं और असुरों के मध्याह्न और मध्यरात्रि का समय । श्लोक ५२-५३—भूगोल पर १८० अंश की दूरी पर रहने वाले एक दूसरे को ऊपर नीचे क्यों समझते हैं । श्लोक ५४—भूगोल चाक की तरह क्यों देख पड़ता है । श्लोक ५५-५८—भूतल पर दिन रात के घटने-बढ़ने का कारण । श्लोक ५६—किसी समय विषुवत्रेखा से कितनी दूरी पर सूर्य ठीक ऊपर देख पड़ता है । श्लोक ६०-६१—विषुवत्रेखा से कितनी दूरी पर ६० घड़ी का दिन और ६० घड़ी की रात होती है । श्लोक ६२-६०—घड़ी से भी बड़ा दिन या रात कहाँ होती है । श्लोक ६३-६७—दो दो महीने, चार चार और छः छः महीने का दिन या रात कहाँ होती है । श्लोक ६८—उत्तरायण और दक्षिणायन के दिन सूर्य कहाँ ठीक देख पड़ता है । श्लोक ६६—किसी वस्तु की छाया कहाँ किस दिशा में होती है । श्लोक ७०-७१—भूतल पर जब एक जगह सूर्य का उदय होता है तब कहाँ मध्याह्न रहता है और कहाँ मध्यरात्रि अथवा अस्तकाल । श्लोक ७२— ध्रुवों की दिशा में जाने से आकाशीय ध्रुवों की उन्नति और नक्षत्र-कक्षा की अवनति देख पड़ती है । श्लोक ७३—प्रवह वायु के द्वारा नक्षत्र-चक्र कैसे भ्रमण करता है । श्लोक ७४—देवताओं, पितरों और मनुष्यों के दिन रात का प्रमाण । श्लोक ७५-७७—ग्रहों की कक्षाओं और उनके भ्रमणकालों का सम्बन्ध । श्लोक

भूगोलाध्याय ७१६ ७८-७६-वर्षपति, मासपति, दिनपति तथा होरापतियों का सम्बन्ध । श्लोक ८०- नक्षत्र-कक्षा का विस्तार । श्लोक ८१-८४-आकाश-कक्षा का प्रमाण तथा इससे ग्रह की कक्षाओं और गतियों का सम्बन्ध । श्लोक ८५-६०-कक्षाओं का परिमाण योजनों में ।] इस अध्याय में भूगोल की उत्पत्ति, स्थिति, विस्तार आदि सभी बातों का निरूपण किया गया है, इसीलिए इसका नाम भूगोलाध्याय है । साथ ही साथ ग्रहों, नक्षत्रों और आकाश की कक्षाओं के प्रमाण भी दिये गये हैं । मयासुर के प्रश्न और सूर्यांश पुरुष के उत्तर की भूमिका - अथार्काशसमुद्भूतं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः । भक्त्या परमयाऽभ्यर्च्य पप्रच्छेदं मयोऽसुरः ॥१॥ भगवन् किंप्रमाणा भूः किमाकारा किमाश्रया । किविभागा कथं वाऽत्र सप्तपातालभूमयः ॥२॥ अहोरात्रव्यवस्थां च विदधाति कथं रविः । कथं पर्येति वसुधां भुवनानि विभावयन् ॥३॥ देवासुराणामन्योन्यमहोरात्रं विपर्ययात् । किमर्थं तत्कथं वा स्याद् भानोः भगणपूरणात् ॥४॥ पित्र्यं मासेन भवति नाडीषष्ट्या तु मानुषम् । तदेव किल सर्वत्र न भवेत् केन हेतुना ॥५॥ दिनाद्धमासमहोरात्रामषिषा न समाः कुतः । कथं पर्येति भगणः सग्रहोऽयं किमाश्रयः ॥६॥ भूमेरुपर्यधुर्युक्ताः किमुत्सेधाः किमन्तराः । ग्रहर्क्षकक्ष्याः किम्मान्त्राः स्थिताः केन क्रमेण ताः ॥७॥ ग्रीष्मे तीव्राः करा भानोः न हेमन्ते तथाविधाः । कियती तत्करव्याप्तिः मानानि कति किञ्च कैः ॥८॥ एतन्मे संशयं छिन्धि भगवन्भूतभावन । अन्यो न त्वामृते छेत्तां विद्यते सर्वदर्शिवान् ॥६॥ इति भक्त्योदितं श्रुत्वा मयेनार्काशसंभवः । रहस्यतरमध्यायं पुनः प्राह यथाश्रुतम् ॥१०॥ शृणुष्वैकमना भूत्वा गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् । वक्ष्याम्यतीवभक्तानां नादेयं विद्यते मम ॥११॥

७२० सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—(१) इसके उपरान्त मयासुर ने सूर्य के अंश से उत्पन्न हुए पुरुष को हाथ जोड़ कर प्रणाम करके और बड़ी भक्ति से पूजा करके यह पूछा । (२) हे भगवन्, इस पृथ्वी का परिमाण क्या है, इसका आकार कैसा है और यह किस के आधार पर है, इसके कितने विभाग हैं और इसमें सात पातालों की भूमि कैसे स्थित है । (३) सूर्य अहोरात्र की व्यवस्था कैसे करते हैं और भुवनों को प्रकाशित करते हुए पृथ्वी के चारों ओर कैसे घूमते हैं। (४) देवताओं और असुरों के दिन-रात एक दूसरे के विपरीत क्यों होते हैं और सूर्य का एक भगण (चक्कर) पूरा होने पर यह कैसे होता है । (५) पितरों का दिन-रात एक मास का और मनुष्यों का ६० घड़ियों का क्यों होता है । सब जगह एक ही प्रकार के दिन-रात क्यों नहीं होते । (६) दिन, वर्ष, मास और होरा (घंटा) के स्वामी समान क्यों नहीं होते, ग्रहों के साथ नक्षत्र मंडल कैसे घूमता है और इनका आधार क्या है । (७) ग्रहों और नक्षत्रों की कक्षाएँ पृथ्वी से ऊपर कितनी कितनी ऊँचाई पर तथा परस्पर कितने अन्तर पर हैं, इनके मान क्या हैं और ये किस क्रम से स्थित हैं। (८) ग्रीष्म ऋतु में सूर्य कि किरणें बहुत तीव्र क्यों होती हैं और हेमन्त ऋतु में वैसी क्यों नहीं होतीं । यह किरणें कितनी दूर दूर तक जाती हैं; सौर, चन्द्र आदि मान कितने हैं और इनसे क्या प्रयोजन निकलता है । (६) हे भूतभावन, भगवन् मेरी इन शंकाओं को दूर कीजिये क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं इसलिये आपके सिवा दूसरा मनुष्य मेरी शंकाओं को नहीं दूर कर सकता (१०) भक्ति से कहे हुए मयासुर के इन वचनों को सुनकर सूर्यांश पुरुष ने उससे फिर पहले के रहस्य स्वरूप दूसरा अध्याय कहा । (११) एकाग्रचित्त होकर यह अध्यात्म नामक तत्व सुनो जिसे मैं कहता हूं क्योंकि भक्तों के लिए मैं कोई वस्तु अदेय नहीं समझता । विज्ञान-भाष्य—मयासुर ने जितने प्रश्न किये हैं उनका उत्तर जानने की अभिलाषा सभी तत्वज्ञानियों को होती है । इस पर सूर्यांश पुरुष ने बतलाया है कि उत्तर में जिस रहस्य का प्रतिपादन किया जायगा वह अध्यात्म ज्ञान से सम्बन्ध रखता है । इस पर बहुत से लोग कह उठेंगे कि मयासुर के प्रश्नों का उत्तर तो कोई भी ज्योतिषी और भूगोलशास्त्री दे सकता है । यह विचार कुछ दूर तक ठीक है परन्तु सूर्यांश पुरुष ने इस संसार की उत्पत्ति की चर्चा की है वह तो अवश्य अध्यात्म संबंधी ही कही जा सकती है क्योंकि यह भौतिक विज्ञान से परे की बात है । सृष्टि का क्रम— वासुदेवः परं ब्रह्म तन्मूर्तिः पुरुषः परः । अव्यक्तो निर्गुणः शान्तः पञ्चविंशात्परोऽव्ययः ॥१२॥ प्रकृत्यन्तर्गतो देवः बोध्यमानश्च सर्वगः । संकर्षणोऽपः सृष्ट्वादौ तासुवीर्यमवासृजत् ॥१३॥

भूगोलाध्याय ७२१ तदण्डमभवद्धेमं सर्वत्रतमसाऽऽवृतम् । तत्रानिरुद्धः प्रथमं व्यक्तीभूतस्सनातनः ॥१४॥ हिरण्यगर्भो भगवानेषच्छन्दसि पठ्यते । आदित्यो ह्यादिभूतत्वात् प्रसूत्या सूर्य उच्यते ॥१५॥ परं ज्योतिस्तमःपारे सूर्योऽयं सवितेति च । पर्येति भुवनान्येव भावयन्भूतभावनः ॥१६॥ प्रकाशात्मा तमोहन्ता महानित्येष विश्रुतः । ऋचोऽस्य मण्डलं सामान्युक्षा मूर्तियंजूंषि च ॥१७॥ त्रयीमयोऽयं भगवान् कालात्मा कालकृद्विभुः । सर्वात्मा सर्वगस्सूक्ष्मः सर्वमस्मिन्प्रतिष्ठितम् ॥१८॥ रथे विश्वमये चक्रं कृत्वा संवत्सरात्मकम् । छन्दांस्यश्वाः सप्तयुक्तः पर्यटत्येष सर्वदा ॥१६॥ त्रिपादममृतं गुह्यं पादोऽयं प्रकटोऽभवत् । सोऽहङ्कारं जगत्सृष्ट्यै ब्रह्माणमसृजद्विभुः ॥२०॥ तस्मै वेदान्वरान्दत्त्वा सर्वलोकपितामहम् । प्रतिष्ठाप्याण्डमध्येतु स्वयं पर्येति भावयन् ॥२१॥ अथ सृष्ट्यां मनश्चक्रे ब्रह्माऽहङ्कारमूर्तिभृत् । मनसश्चन्द्रमा जज्ञे चक्षुशस्तेजसां निधिः ॥२२॥ मनसः खं ततो वायुरग्निरापो धरा क्रमात् । गुणैक वृद्धया पञ्चैव महाभूतानि जज्ञिरे ॥२३॥ अनुवाद-(१२) परं ब्रह्म वासुदेव हैं । इनकी मूर्ति परम पुरुष है जो अव्यक्त, निर्गुण, शान्त और अव्यय और सांख्य शास्त्र के पच्चीस तत्वों से परे हैं । (१३) बाहर भीतर सर्व व्यापक देवता ने प्रकृति में प्रवेश करके संकर्षण रूप से प्रारम्भ में जल की सृष्टि करके उसमें बीज रखा (१४) जो सोने का अंडा हो गया जिसके चारों ओर अंधकार था । इसमें सनातन अनिरुद्ध पहले प्रकट हुए । (१५) इन्हों को वेदों में हिरण्यगर्भ भगवान् कहा गया है। पहले होने के कारण इन्हें आदित्य और सब चराचर जीवों को उत्पन्न करने के कारण इन्हें सूर्य कहते हैं । (१६) परम प्रकाश- मय होने के कारण इन्हें सूर्य और अंधकार के अंत में होने के कारण सविता कहते हैं । यह भूतभावन अर्थात् स्थावर जंगम सृष्टि को उत्पन्न, पालन और संहार करने- वाले भगवान लोकों को प्रकाशमान करते हुए भ्रमण करते हैं । (१७) इन्हें ही प्रकाशात्मा अंधकार का नाश करनेवाले और वेदों में महान् तत्व कहते हैं ।

७२२ सूर्य-सिद्धान्त इनका मंडल ऋग्वेद, करण सामवेद और मूर्ति यजुर्वेद हैं। (१८) इसलिए इनको वेदत्रयात्मक कहते हैं। इनसे काल की गणना होती है इसलिए इनको कालात्मा और कालकृत कहते हैं । यह सब की आत्मा, सर्वव्यापक, सूक्ष्म हैं और सब सृष्टि इनमें स्थित है । (१६) संसार रूपी रथ में संवत्सर रूपी चक्र बनाकर सात छंदों के सात घोड़ों से युक्त होकर यह सर्वदा भ्रमण करते हैं । (२०) इनके तीन चरण अमृत होने से अगम्य हैं और यह एक चरण प्रकट हुआ है । इसी प्रभु ने जगत् की सृष्टि के लिए अहङ्काररूपी ब्रह्मा को बनाया । (२१) इसके बाद सब लोकों के पितामह ब्रह्मा को श्रेष्ठ वेदों को देकर और इन्हें अंडे के बीच में स्थापित करके अनिरुद्ध भगवान् स्वयम् लोकों को प्रकाशित करते हुए भ्रमण करते हैं । (२२) इसके पश्चात् अहङ्कार मूर्तिधारी ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना करने का विचार किया । ब्रह्मा के मन से चंद्रमा और नेत्रों से तेजपुञ्ज सूर्य उत्पन्न हुए । (२३) मन से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी पांच महाभूत क्रम से एक एक गुण की वृद्धि से उत्पन्न हुए । विज्ञान भाष्य—सूर्यांश पुरुष ने मयासुर से उपर्युक्त सृष्टिक्रम का जो वर्णन किया है वह वेदान्त, सांख्य, श्रीमद्भागवत् आदि में बतलाये गये सृष्टि-क्रम का मिश्रण है । यह क्रम भिन्न भिन्न ग्रंथों में भिन्न-भिन्न रीति से बतलाया गया है इसलिए यह संभव नहीं कि उन सबकी व्याख्या यहाँ की जाय । इस विषय पर लोकमान्य तिलक ने अपने गीता-रहस्य के ६-६ प्रकरणों में अच्छी तरह विचार किया है और कहीं-कहीं यूरोपीय विद्वानों के मतों की भी तुलना की है इसलिए इसकी जानकारी के लिए पाठकों को उसीका अध्ययन करना चाहिए । यहाँ उसीका सार दिया जा सकता है । सांख्यशास्त्र के अनुसार ब्रह्मांड का वंश-वृक्ष ७२३ पृष्ठ पर दिया जाता है । देखो गी० र० (पृ० १७६) :- वेदान्त का परब्रह्म इन २५ तत्वों से परे है जिसकी चर्चा सूर्य-सिद्धान्त के १२वें श्लोक में है (देखो गीता रहस्य पृ० २०३) । सूर्य-सिद्धान्त में संकर्षण, और अनिरुद्ध की जो चर्चा है उसकी चर्चा भागवतधर्म में इस प्रकार आयी है 'वासुदेव रूपी परमेश्वर से संकर्षण रूपी जीव उत्पन्न हुआ; और फिर संकर्षण से प्रद्युम्न अर्थात् मन तथा प्रद्युम्न से अनिरुद्ध अर्थात् अहङ्कार हुआ; कुछ लोग तो इन चार व्यूहों में से दो, तीन या एक ही को मानते हैं (देखो गीता रहस्य पृ० ४२६) । सूर्य- सिद्धान्त में प्रद्युम्न की चर्चा नहीं है। यहां अहङ्कार को ही ब्रह्मा बतलाया है । *पृष्ठों की संख्या सं० १६७३ के छपे हुए हिन्दी गीता-रहस्य के अनुसार है ।

भूगोलाध्याय ७२३ आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ही पंचमहाभूत कहते हैं । आकाश में एक गुण शब्द, वायु में दो गुण शब्द, स्पर्श, अग्नि में तीन गुण शब्द, स्पर्श और रूप; जल में चार गुण शब्द, स्पर्श, रूप और रस तथा पृथ्वी में पांच गुण शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध माने गये हैं इसीलिए २३वें श्लोक के उत्तरार्ध में बतलाया गया है कि एक एक गुण की वृद्धि से पंचमहाभूतों की उत्पत्ति क्रम से हुई है । ब्रह्मांड का वंशवृक्ष पुरुष ➔ (दोनों स्वयंभू और अनादि) 🡨—प्रकृति (अव्यक्त और सूक्ष्म) महान् अथवा बुद्धि (व्यक्त और सूक्ष्म) अहंकार (व्यक्त और सूक्ष्म) (सात्त्विक सृष्टि अर्थात् व्यक्त और सूक्ष्म इन्द्रियां) (तामस अर्थात् निर्निद्रिय सृष्टि) पञ्चतन्मात्राएँ (सूक्ष्म) पांच बुद्धीन्द्रियां पांच कर्मेन्द्रियां मन पञ्च महाभूत (स्थूल) पांच ग्रहों की उत्पत्ति— अग्नीषोमो भानुचन्द्रो ततस्त्वङ्गारकादयः । तेजो भूरवाम्बुवातेभ्यः क्रमशः पञ्च जज्ञिरे ॥२४॥ अनुवाद—अग्नि स्वरूप सूर्य और सोम स्वरूप चन्द्रमा की उत्पत्ति के बाद तेज अर्थात् अग्नि से मंगल, पृथ्वी से बुध, आकाश से बृहस्पति शुक्र और वायु से शनि उत्पन्न हुए । १२ राशियों और २७ नक्षत्रों की उत्पत्ति— पुनर्द्वादशधाऽऽत्मानं विभजे राशिसंज्ञितम् । नक्षत्ररूपिणं भूयः सप्तविंशात्मकं वशी ॥२५॥

७२४ सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—फिर जितात्मा ब्रह्मा ने मनः कल्पितवृत्त को पहले १२ राशियों में फिर २७ नक्षत्रों में बाँटा । चराचर जगत् की उत्पत्ति— ततश्चराचरं विश्वं निर्ममे देवपूर्वकम् । ऊर्ध्वमध्याधरेभ्योऽथ गात्रेभ्यः प्रकृतिं सृजन् ॥२६॥ गुणकर्मविभागेन सृष्ट्वा प्राग्वदनुक्रमात् । विभागं कल्पयामास यथास्वं वेददर्शनात् ॥२७॥ ग्रहर्क्षताराणां भूमेः विश्वस्य वा विभुः । देवानां च मनुष्याणां सिद्धानां च यथाक्रमम् ॥२८॥ ब्रह्माण्डमेतत् सुषिरं यत्रेवं भूर्भुवादिकम् । कटाहद्वितयस्यैव संपुटं गोलकाकृतिः ॥२६॥ अनुवाद—(२६) इसके पश्चात् श्रेष्ठ, मध्यम और अधम स्रोतों से सत्व, रज और तम विभेदात्मक प्रकृति का निर्माण करके देवता, मनुष्य, राक्षस आदि चराचर विश्व की रचना की । (२७) गुण और कर्म के अनुसार पूर्वोक्त क्रम से सृष्टि रचकर वेदों में बतलायी हुई रीति के अनुसार देश काल के अनुसार इसके विभाग किये । (२८) समर्थवान् ब्रह्मा ने ग्रहों, नक्षत्रों, तारों, पृथ्वी, संसार, देवताओं, मनुष्यों और सिद्धों का यथाक्रम स्थापन किया, (२६) दो समान कड़ाहों के मुंह मिला देने से जैसा खोखला गोला बनता है उसी प्रकार के इस ब्रह्माण्ड अवकाश में भूर्भुवः आदि लोक स्थित हैं । ब्रह्माण्ड में ग्रहों की कक्षाओं का क्रम— ब्रह्माण्डमध्यपरिधि व्योमकक्ष्याऽभिधीयते । तन्मध्ये भ्रमणं भानां तदधोऽधः क्रमादथ ॥३०॥ मन्दामरेज्यभूपुत्रसूर्यशुकेन्दुजेन्दवः । परिभ्रमन्त्यधोऽधस्तात्सिद्धाविद्याधरा घनाः ॥३१॥ मध्ये समन्तादण्डस्य भूगोलो व्योम्नि तिष्ठति । बिभ्राणः परमां शक्तिं ब्रह्मणो धारणात्मिकाम् ॥३२॥ अनुवाद—(३०) ब्रह्माण्ड की परिधि को आकाश कक्षा कहते हैं जिसके भीतर नक्षत्र भ्रमण करते हैं; फिर उसके नीचे क्रमानुसार (३१) शनि, वृहस्पति, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध और चन्द्रमा भ्रमण करते हैं । इसके नीचे सिद्ध, विद्याधर

भूगोलाध्याय ७२५ और मेघ हैं। (३२) इस ब्रह्माण्ड के बिल्कुल बीच में यह भूगोल ब्रह्मा की धारणा- त्मिका परम शक्ति के बल पर शून्य में ठहरा हुआ है। विज्ञान-भाष्य—इन तीनों श्लोकों में यह बतलाया गया है कि ब्रह्माण्ड की परम परिधि के भीतर नक्षत्रों और ग्रहों की कक्षाएँ किस क्रम से हैं। हमारी पृथ्वी का स्थान इन ब्रह्माण्ड के बिल्कुल मध्य में माना गया है अर्थात् यह भूगोल सारे ब्रह्माण्ड के केन्द्र में हैं। यह बात अर्वाचीन ज्योतिष-सिद्धान्त के प्रतिकूल है। अर्वाचीन ज्योतिष में सूर्य जगत् का केन्द्र समझा जाता है। सूर्य के सबसे निकट बुध ग्रह की कक्षा है, फिर शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति और शनि की कक्षाएँ क्रमानुसार आकाश नक्षत्र शनि गुरु मंगल रवि शुक्र बुध चन्द्र भू चित्र १२१ भारतीय ज्योतिष के अनुसार कक्षाओं का क्रम (पृथ्वी केन्द्र में) दूर होती गयी हैं। चन्द्रमा की कक्षा पृथ्वी के चारों ओर है। नक्षत्रों की कक्षा

७२६ सूर्य-सिद्धान्त अर्वाचीन ज्योतिष के अनुसार स्थिर नहीं की जा सकती क्योंकि सब तारे समान दूरी पर नहीं हैं। आकाश कक्षा की सीमा भी स्थिर नहीं की जा सकती क्योंकि आजकल कुछ तारों की दूरी इतनी अधिक समझी जाती है कि आकाश कक्षा की सीमा उसके सामने नगण्य है। चित्र १२१ तथा १२२ से हिन्दू ज्योतिष और अर्वाचीन ज्योतिष के मतों की भिन्नता अच्छी तरह समझ में आ जायगी । पृथ्वी और चन्द्रकक्षा के बीच में मेघों, विद्याधरों और सिद्धों के लोक हैं जो इस चित्र में नहीं दिखलाये जा सके ।

ने यु श गु मं भू शु बु सू

चित्र १२२ अर्वाचीन ज्योतिष के अनुसार ग्रह की कक्षाओं का क्रम (यहाँ सूर्य केन्द्र में है)

भूगोलाध्याय ७२७ इस चित्र में चन्द्रमा की कक्षा नहीं दिखलायी गयी है क्योंकि चन्द्रमा पृथिवी की परिक्रमा करता है और पृथ्वी के साथ-साथ सूर्य के भी चारों ओर जाता है। ऐसे कई चन्द्रमा मंगल, गुरु और शनि के चारों ओर भी भ्रमण करते हुए देखे गये हैं। चित्र १२२ में कक्षाओं की दूरी प्रायः समान देख पड़ती है और आकार गोल, परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। इसका विचार आगे किया जायगा; यहाँ तो केवल क्रम दिखलाया गया है। श्लोक ३२ में जिस धारणात्मिका शक्ति की चर्चा है उसे ही आजकल गुरुत्वाकर्षण कहते हैं। इस श्लोक से यह स्पष्ट हो जाता है कि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार हमारी पृथ्वी शून्य में स्थित मानी गयी है। इसको कोई जीव थामे हुए नहीं है। परमेश्वर की जिस शक्ति के बल पर यह पृथ्वी शून्य में ठहरी हुई है उसे धारणा- त्मिकाशक्ति कहा गया है। आजकल यह माना जाता है कि पृथ्वी, चन्द्रमा, ग्रह इत्यादि सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से बँधे हुए हैं और ग्रहों, उपग्रहों की गतियों का कारण भी यही गुरुत्वाकर्षण है। भूगोल में पाताल, सुमेरु आदि के स्थान :— तदन्तरपुटास्सप्त नागासुरसमाश्रयाः । दिव्यौषधिरसोपेता रम्याः पातालभूमयः ।।३३।। अनेकरत्ननिचयो जाम्बूनदमयो गिरिः । भूगोलमध्यगो मेरुः उभयत्र विनिर्गतः ।।३४।। उपरिष्टात्स्थितास्तस्य सेन्द्रा देवा महर्षयः । अधस्तादसुरास्तद्वत् द्विषन्तोऽन्योन्यमाश्रिताः ।।३५।। ततस्समन्तात्परिधिः क्रमेणायं महार्णवः । मेखलावत्स्थितो धात्र्या देवासुरविभागकृत् ।।३६।। अनुवाद—(३३) इस भूगोल के भीतरी परतों में अति सुन्दर सात पाताल भूमि हैं जहाँ नाग और असुर रहते हैं और जहाँ प्रकाश देनेवाले और रसीले वृक्ष हैं। (३४) नाना प्रकार के रत्नों से भरा हुआ, स्वर्णमयी जम्बू नदी से सुशोभित, भूगोल के आर पार दोनों ओर निकला हुआ सुमेरु पर्वत है। (३५) इस सुमेरु पर्वत के ऊपर की ओर इन्द्र के साथ देवता और महर्षि लोग रहते हैं और असुर रहते हैं। ये देवता और असुर एक दूसरे के शत्रु हैं। (३६) इस सुमेरु पर्वत के चारों ओर घेरे हुए यह महासागर (लवण समुद्र) पृथ्वी की मेखला की तरह स्थित है तथा देवताओं और असुरों का विभाग कर देता है।

७२८ सूर्य-सिद्धान्त विज्ञान भाष्य—भूगोल के भीतर सात पाताल देश माने गये हैं जिनके नाम अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल हैं। यहां नागों और असुरों का निवास है। सुमेरु पर्वत के पास जम्बू नदी है। यह पर्वत भूगोल के केन्द्र से होता हुआ दोनों ओर अर्थात् उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर निकला हुआ माना गया है। उत्तरी ध्रुव पर देवता और दक्षिणी ध्रुव पर असुर रहते हैं जो परस्पर शत्रु हैं। इस मेरु पर्वत को घेरे हुए पृथिवी के चारों ओर लवण समुद्र है जो देवताओं और असुरों की भूमि को अलग करता है और पृथिवी की मेखला की तरह है। इस वर्णन में बहुत सी बातें कल्पना से उत्पन्न हुई जान पड़ती हैं इसलिये इन सब का अस्तित्व नहीं बतलाया जा सकता। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों को सुमेरु पर्वत के ऊपर और नीचे वाले सिरे समझना चाहिये। इसके बीच में विषुवत् रेखा के पास लवण समुद्र माना गया है जो आजकल भी प्रायः इसी स्थिति में है। विषुवत् रेखा पर स्थित चार नगरियों का वर्णन : समन्तान्मेरुमध्यात् तुल्यभागेषु तोयधेः । द्वीपेषु दिक्षु पूर्वादिन्दर्गयो देवनिर्मिताः ॥३७॥ भूवृत्तपादे पूर्वस्यां यमकोटीति विश्रुता । भद्राश्ववर्षे नगरी स्वर्णप्राकारतोरणा ॥३८॥ याम्यायां भारते वर्षे लंका तद्वन्महापुरी । पश्चिमे केतुमालाख्ये रोमकख्या प्रकीर्तिता ॥३६॥ उदक्सिद्धपुरी नाम कुरुवर्षे प्रतिष्ठिता । तस्यां सिद्धा महात्मानो निवसन्ति गतव्यथाः ॥४०॥ भूवृत्तपादविवराः ताश्चान्योन्यं प्रतिष्ठिताः । ताभ्यश्चोत्तरतो मेरुः तावानेवासुराश्रयः ॥४१॥ तासामुपरिगो याति विषुवस्थो दिवाकरः । न तासु विषुवच्छाया नाक्षस्योन्नतिरिष्यते ॥४२॥ अनुवाद—(३७) मेरु के मध्य भाग के चारों ओर समुद्र के समान अन्तर पर जम्बू द्वीप के पूर्व दक्षिण, और उत्तर दिशाओं में देवताओं की बनाई हुई चार नगरी हैं। (३८) पूर्व में भूपरिधि के चतुर्थांश पर भद्राश्व वर्ष में यमकोटी नगरी प्रसिद्ध है जहां सोने के दीवार और फाटक हैं; (३६) दक्षिण में भारतवर्ष में उसी प्रकार लङ्कापुरी और पश्चिम में केतुमाल देश में रोमकपुरी प्रसिद्ध हैं; (४०) उत्तर में कुरु देश में सिद्धपुरी है जहाँ सब प्रकार के दुःखों से मुक्त सिद्ध, महात्मा लोग रहते

भूगोलाध्याय ७२६ हैं। (४१) यह नगरियां एक दूसरे से भूपरिधि के चतुर्थांश अन्तर पर स्थित हैं जिनके उत्तर दिशा में उतने ही अन्तर पर का निवास स्थान मेरु है। (४२) जब सूर्य विषुवद्वृत्त पर आता है तब इन नगरियों के ठीक ऊपर होता है इसलिए न वहाँ विषुवच्छाया होती है और न अक्षांश ही होता है। विज्ञान-भाष्य – इन छः श्लोकों में विषुवत् रेखा पर स्थित चार नगरियों की स्थिति का बड़ा ही स्पष्ट वर्णन है। ये नगरियां एक दूसरे से भूपरिधि के चतुर्थांश अन्तर पर हैं अर्थात् यह एक दूसरे से ६० अंश के अन्तर पर हैं और उत्तर मेरु (उत्तरी ध्रुव) भी इतने ही अन्तर पर इनसे उत्तर में है। इन नगरियों की दिशायें भारतवर्ष से मानी गयी हैं। भारतवर्ष के दक्षिण विषुवत् रेखा पर लङ्का नगरी है जिसका स्थान मध्यमाधिकार के ६२ वें श्लोक अनुसार के उज्जैन की देशान्तर रेखा माना जाना चाहिए (पृष्ठ ६५) । ग्रीनविच से उज्जैन का देशान्तर ७६ अंश के लगभग है। इसलिये यदि लङ्का इसी देशान्तर पर और विषुत् रेखा पर मानी जाय तो आजकल यहाँ समुद्र है। इससे ६० अंश पूर्व का स्थान ग्रीनविच से १६६ अंश पूर्व देशान्तर पर है। इसलिए यमकोटी नगरी की जगह भी आजकल समुद्र है । लङ्का से ६० अंश पच्छिम अथवा ग्रीनविच से १४ अंश पच्छिम देशान्तर पर भी विषुवत् रेखा पर स्थल का नाम नहीं हैं इसलिए रोमक नगरी का भी पता नहीं लगाया जा सकता । यह रोमक नगरी आजकल के पच्छिमी अफ्रीका के फ्रीटाउन से ५० मील के लगभग दक्षिण रही होगी । इसी प्रकार सिद्धपुरी वर्तमान् मेक्सिको से १००० मील से भी अधिक दक्षिण रही होगी । यदि इन चार पुरियों का अस्तित्व कभी रहा होगा तो वह काल बहुत ही प्राचीन होगा क्योंकि आजकल तो इतना अन्तर पड़ गया है कि उस काल का कोई चिह्न वर्तमान नहीं है। यह भी सम्भव है कि इन चार पुरियों का अस्तित्व कवि की कल्पना में ही रहा हो और आलंकारिक भाषा में इस बात का वर्णन किया गया हो कि विषुवत् रेखा पर ये चार स्थान ऐसे हैं कि जब लङ्का में मध्याह्न होता है तब रोमक में सूर्योदय, सिद्धपुरी में मध्यरात्रि और यमकोटि में सूर्यास्त । यह तो स्पष्ट ही है कि जब सूर्य विषुवत् रेखा के खस्वस्तिक पर रहता है तब वहां मध्याह्नकाल में किसी खड़ी वस्तु की कोई छाया नहीं पड़ती। इस रेखा के क्षितिज पर उत्तर और दक्षिण ध्रुव हैं इसलिए यहाँ ध्रुव तारे की ऊँचाई शून्य होती है। इसलिए अक्षांश भी शून्य होता है। इसी कारण विषुवत् रेखा को निरक्ष देश कहा गया है। इसका और स्पष्ट वर्णन अगले तीन श्लोकों में है। मेरु पृथिवी के बीच से होता हुआ दोनों ओर निकला हुआ बतलाया गया है इसलिए इसे पृथिवी का अक्ष समझना चाहिए जिसका उत्तरी सिरा उत्तरी ध्रुव १६

७३० सूर्य-सिद्धान्त और दक्षिणी सिरा दक्षिणी ध्रुव कहलाते हैं। इसी अक्ष के मध्य अर्थात् भूकेन्द्र के चारों ओर समान पूरी पर विषुवत रेखा मानी गयी है जो जम्बूद्वीप और लवण समुद्र की सीमा समझी गयी थी । विषुवत् रेखा और उत्तर दक्षिण ध्रुवों का सम्बन्ध मेरोरुभयतो मध्ये ध्रुवतारे नभःस्थिते । निरक्षदेशसंस्थानामुभये क्षितिजाश्रिये ॥४३॥ अतो नाक्षोच्छ्रयस्तासु ध्रुवयोः क्षितिजस्थयोः । नवतिर्लम्बकांशास्तु मेरावक्षांशकास्तथा ॥४४॥ मेषादौ देवभागस्थे देवानां याति दर्शनम् । असुराणां तुलादौ तु सूर्यस्तद्भागसञ्चरः ॥४५। अनुवाद—(४३) मेरु के दोनों ओर अर्थात् उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों की तरफ आकाश में स्थित ध्रुव तारे ठीक ख मध्य में हैं; निरक्ष देश में रहने वालों को ये दोनों तारे क्षितिज में देख पड़ते हैं। (४४) इसलिये इन नगरियों की क्षितिज रेखा पर दोनों ध्रुवतारों के होने के कारण इन पुरियों का अक्ष ऊँचा नहीं है अर्थात् इनका अक्षांश शून्य है परन्तु लम्बांश ६० है। इसी प्रकार मेरुओं का अर्थात् ध्रुवों का अक्षांश ६० है । (४५) सूर्य जब देव-भाग में अर्थात् उत्तरी गोलार्द्ध में रहता है तब मेष के आदि स्थान में देवताओं को उसका प्रथम दर्शन होता है और जब सूर्य असुर भाग में अर्थात् दक्षिणी गोलार्द्ध में रहता है तब तुला के आदि में वह असुरों को पहले पहल देख पड़ता है। विज्ञान-भाष्य—यहाँ बतलाया गया है कि उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के ख मध्य में ध्रुव तारे हैं जो निरक्ष देश की क्षितिज पर हैं। इससे यह अनुमान किया जा सकता है कि प्राचीन काल में जब सूर्य-सिद्धान्त कहा गया था तब दो ध्रुव तारे रहे होंगे। यह भी कहा जा सकता है कि जैसे उत्तरी ध्रुव के ख मध्य में एक तारा है वैसे ही दक्षिणी ध्रुव के ख मध्य में भी एक तारा समझा गया होगा । परन्तु यह निश्चय है कि उत्तरी ध्रुव के ख मध्य में इस समय जो तारा देख पड़ता है वह प्राचीन काल में इस स्थान पर नहीं था क्योंकि अयन-चलन के कारण इसका स्थान भी बदल रहा है (देखो पृष्ठ २४०-४२) । इसलिए यहाँ जिन ध्रुव तारों का वर्णन है वे आकाशीय ध्रुवों के स्थान हैं जो उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के ख मध्य में हैं । इनसे किसी तारे का सनातन सम्बन्ध नहीं है । जब अयन-चलन के कारण कोई तारा इनके पास आ जाता है तब यह भी प्रत्यक्ष में ध्रुव तारा कहलाने लगता है । यह कई जगह बतलाया जा चुका है कि विषुवत् रेखा पर अक्षांश शून्य और

भूगोलाध्याय ७३१ लम्बांश ९०° तथा उत्तरी दक्षिणी ध्रुवों पर अक्षांश ९० और लम्बांश शून्य कैसे होता है (देखो पृष्ठ ५८, ५९, २४६, २५७ इत्यादि) । श्लोक ४५ बड़े महत्व का है। इसमें बतलाया गया है कि जब सूर्य मेष राशि के आदि में होता है तब देवताओं को पहले पहल देख पड़ता है अर्थात् तब उत्तरी ध्रुव निवासियों के लिए सूर्य का उदय होता है और जब वह तुला राशि के आदि में होता है तब असुरों को पहले पहल देख पड़ता है अर्थात् तब दक्षिणी ध्रुव निवासियों के लिए उसका उदय होता है । इससे प्रकट होता है कि मेष राशि का आदि स्थान उसे ही समझना चाहिए जहां क्रान्तिवृत्त और विषुवन्मण्डल का योग होता है और जहां पहुँचकर सूर्य उत्तर गोल में हो जाता है। इसी स्थान को वसंत-संपात- बिन्दु कहते हैं । इसी प्रकार तुला का आदि बिन्दु शरद-सम्पात-बिन्दु है जहाँ पहुँच कर सूर्य दक्षिण गोल में हो जाता है। जब सूर्य मेष के आदि में विषुवन्मंडल पर आता है तभी उत्तरी ध्रुव वालों के लिए सूर्योदय होता है और इससे ६ महीने तक बराबर सूर्य देख पड़ता है। इसी समय को देवताओं का दिन कहते हैं। और असुरों की रात क्योंकि जब तक सूर्य उत्तर ध्रुव वालों को देख पड़ता है तब तक वह दक्षिण ध्रुव वालों के लिए अदृश्य रहता है और वहां रात रहती है । जिस समय सूर्य तुला राशि के आदि में पहुँचता है उस समय उत्तरी ध्रुव पर सूर्यास्त और दक्षिणी ध्रुव पर सूर्योदय होता है इस समय से ६ महीने तक सूर्य दक्षिण ध्रुव पर बराबर देख पड़ता है और वहाँ महीने का दिन होता है। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों तथा विषुवत् रेखा पर यह विशेषताएँ इसीलिए होती हैं कि ध्रुव विषुवत् रेखा से ९० अंश के अन्तर पर है (देखो पृष्ठ ६२) । सूर्य की किरणें मन्द और तीव्र क्यों होती हैं ? अत्यासन्नतया तेन ग्रीष्मे तीव्रकरा रवेः । देवभागे सुराणां तु हेमन्ते मन्दतान्यथा ॥४६॥ अनुवाद—जब सूर्य देव भाग में अर्थात् उत्तर गोल में रहता है तब देवताओं के बहुत निकट होने के कारण ग्रीष्म ऋतु में उसकी किरणें बड़ी तीव्र होती हैं और हेमन्त ऋतु में दूर होने के कारण मन्द होती हैं । विज्ञान-भाष्य—इस श्लोक में बतलाया गया है कि ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की किरणें इसलिए तीव्र होती हैं कि सूर्य निकट होता है और हेमन्त ऋतु में इसलिए मन्द होती हैं कि सूर्य दूर रहता है परन्तु यह ठीक नहीं है। आजकल यथार्थ में ग्रीष्म ऋतु में सूर्य पृथ्वी से दूर होता है और हेमन्त ऋतु में निकट जैसा कि उसके बिम्बों के आकार से जान पड़ता है (देखो पृष्ठ ८५) । यथार्थ कारण यह है

७३२ सूर्य-सिद्धान्त कि ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की किरणें लम्ब रूप में खड़ी आती हैं इसलिए उनकी प्रखरता अधिक होती है और हेमन्त ऋतु में सूर्य के नीचे होने के कारण किरणें टेढ़ी आती हैं इसलिए उनकी प्रखरता कम पड़ जाती है। यह बात प्रतिदिन देखी जाती है। मध्याह्न में सूर्य ऊँचा होता है इसलिए इसकी किरणें प्रायः खड़ी रहती हैं और गरमी भी बढ़ जाती है। परन्तु प्रातःकाल और सायंकाल इसकी किरणें बहुत तिरछी रहती हैं इसलिये उतनी गरमी नहीं रहती । यही दशा सारे भूपृष्ठ पर एक वर्ष की अवधि में होती है। विषुवत्रेखा के आस पास के देशों में सूर्य साल भर तक प्रायः सिर पर देख पड़ता है इसलिये इसकी किरणें लम्बरूप से खड़ी आती हैं और बड़ी तीव्र होती ख चित्र १२३ ग क

भूगोलाध्याय ७३३ हैं परन्तु उत्तर दक्षिण ध्रुवों पर सूर्य की किरणें बहुत तिरछी हो जाती हैं इसलिये वहां सदैव ठंडक रहती है। यह बात चित्र १२३ से स्पष्ट हो जायगी। इस चित्र में दिखलाया गया है कि सूर्य से आती हुई किरणें ग ख तल पर लम्ब हो कर गिरती हैं और वही किरणें क ख तल पर तिरछी हो जाती हैं। यह स्पष्ट है कि क ख तल ग ख तल से बड़ा है क्योंकि यह समकोण त्रिभुज क ग ख का कर्ण है इसलिये जब वही किरणें अधिक स्थान में फैल जाती हैं तब उनकी शक्ति कम पड़ जाती है और ग ख तल पर जितनी गरमी होती है उतनी क ख तल पर नहीं हो सकती। इसका अनुभव पढ़े, बेपढ़े सभी को है, क्योंकि जब सूर्य की किरणें तिरछी आती हैं तब

[चित्र १२४: चित्र में दर्शाए गए बिंदु एवं रेखाएँ:

  • ऊपर वृत्त चाप पर बिंदु: घ, ग, क, ख
  • क्षैतिज रेखा के सिरे: ङ, ह
  • ऊर्ध्व अधोरेखा: विषुवत रेखा]