सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोलाध्याय ७२७ इस चित्र में चन्द्रमा की कक्षा नहीं दिखलायी गयी है क्योंकि चन्द्रमा पृथिवी की परिक्रमा करता है और पृथ्वी के साथ-साथ सूर्य के भी चारों ओर जाता है। ऐसे कई चन्द्रमा मंगल, गुरु और शनि के चारों ओर भी भ्रमण करते हुए देखे गये हैं। चित्र १२२ में कक्षाओं की दूरी प्रायः समान देख पड़ती है और आकार गोल, परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। इसका विचार आगे किया जायगा; यहाँ तो केवल क्रम दिखलाया गया है। श्लोक ३२ में जिस धारणात्मिका शक्ति की चर्चा है उसे ही आजकल गुरुत्वाकर्षण कहते हैं। इस श्लोक से यह स्पष्ट हो जाता है कि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार हमारी पृथ्वी शून्य में स्थित मानी गयी है। इसको कोई जीव थामे हुए नहीं है। परमेश्वर की जिस शक्ति के बल पर यह पृथ्वी शून्य में ठहरी हुई है उसे धारणा- त्मिकाशक्ति कहा गया है। आजकल यह माना जाता है कि पृथ्वी, चन्द्रमा, ग्रह इत्यादि सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से बँधे हुए हैं और ग्रहों, उपग्रहों की गतियों का कारण भी यही गुरुत्वाकर्षण है। भूगोल में पाताल, सुमेरु आदि के स्थान :— तदन्तरपुटास्सप्त नागासुरसमाश्रयाः । दिव्यौषधिरसोपेता रम्याः पातालभूमयः ।।३३।। अनेकरत्ननिचयो जाम्बूनदमयो गिरिः । भूगोलमध्यगो मेरुः उभयत्र विनिर्गतः ।।३४।। उपरिष्टात्स्थितास्तस्य सेन्द्रा देवा महर्षयः । अधस्तादसुरास्तद्वत् द्विषन्तोऽन्योन्यमाश्रिताः ।।३५।। ततस्समन्तात्परिधिः क्रमेणायं महार्णवः । मेखलावत्स्थितो धात्र्या देवासुरविभागकृत् ।।३६।। अनुवाद—(३३) इस भूगोल के भीतरी परतों में अति सुन्दर सात पाताल भूमि हैं जहाँ नाग और असुर रहते हैं और जहाँ प्रकाश देनेवाले और रसीले वृक्ष हैं। (३४) नाना प्रकार के रत्नों से भरा हुआ, स्वर्णमयी जम्बू नदी से सुशोभित, भूगोल के आर पार दोनों ओर निकला हुआ सुमेरु पर्वत है। (३५) इस सुमेरु पर्वत के ऊपर की ओर इन्द्र के साथ देवता और महर्षि लोग रहते हैं और असुर रहते हैं। ये देवता और असुर एक दूसरे के शत्रु हैं। (३६) इस सुमेरु पर्वत के चारों ओर घेरे हुए यह महासागर (लवण समुद्र) पृथ्वी की मेखला की तरह स्थित है तथा देवताओं और असुरों का विभाग कर देता है।