भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 743, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 743

द्वादश अध्याय भूगोलाध्याय (संक्षिप्त वर्णन) [ श्लोक १-६—मयासुर के भूगोल, खगोल तथा ऋतु सम्बन्धी अनेक प्रश्न । श्लोक १०-११—सूर्यांश पुरुष का मयासुर से उत्तर सुनने के लिए कहना । श्लोक १२-२३—वासुदेव से लेकर पंच महाभूतों तक की उत्पत्ति का क्रम । श्लोक २४—पाँच ताराग्रहों की उत्पत्ति । श्लोक २५—बारह राशियों और २७ नक्षत्रों की उत्पत्ति । श्लोक २६-३०—चराचर जगत् की उत्पत्ति । श्लोक ३०-३३—ब्रह्माण्ड में ग्रहों की कक्षाओं का क्रम और पृथ्वी का स्थान । श्लोक ३३-३६—भूगोल में पाताल, सुमेरु आदि के स्थान । श्लोक ३७-४२—विषुवत्रेखा पर स्थित चार नगरों के स्थान । श्लोक ४३-४५—विषुवत्रेखा और उत्तर दक्षिण ध्रुवों का सम्बन्ध । श्लोक ४६—भिन्न ऋतुओं में सूर्य की किरणें मन्द और तीव्र क्यों होती हैं । श्लोक ४७- ५०—उत्तर ध्रुवनिवासियों अर्थात् देवताओं और दक्षिण ध्रुव निवासियों अर्थात् असुरों के दिन रात का विभाग । श्लोक ५१—देवताओं और असुरों के मध्याह्न और मध्यरात्रि का समय । श्लोक ५२-५३—भूगोल पर १८० अंश की दूरी पर रहने वाले एक दूसरे को ऊपर नीचे क्यों समझते हैं । श्लोक ५४—भूगोल चाक की तरह क्यों देख पड़ता है । श्लोक ५५-५८—भूतल पर दिन रात के घटने-बढ़ने का कारण । श्लोक ५६—किसी समय विषुवत्रेखा से कितनी दूरी पर सूर्य ठीक ऊपर देख पड़ता है । श्लोक ६०-६१—विषुवत्रेखा से कितनी दूरी पर ६० घड़ी का दिन और ६० घड़ी की रात होती है । श्लोक ६२-६०—घड़ी से भी बड़ा दिन या रात कहाँ होती है । श्लोक ६३-६७—दो दो महीने, चार चार और छः छः महीने का दिन या रात कहाँ होती है । श्लोक ६८—उत्तरायण और दक्षिणायन के दिन सूर्य कहाँ ठीक देख पड़ता है । श्लोक ६६—किसी वस्तु की छाया कहाँ किस दिशा में होती है । श्लोक ७०-७१—भूतल पर जब एक जगह सूर्य का उदय होता है तब कहाँ मध्याह्न रहता है और कहाँ मध्यरात्रि अथवा अस्तकाल । श्लोक ७२— ध्रुवों की दिशा में जाने से आकाशीय ध्रुवों की उन्नति और नक्षत्र-कक्षा की अवनति देख पड़ती है । श्लोक ७३—प्रवह वायु के द्वारा नक्षत्र-चक्र कैसे भ्रमण करता है । श्लोक ७४—देवताओं, पितरों और मनुष्यों के दिन रात का प्रमाण । श्लोक ७५-७७—ग्रहों की कक्षाओं और उनके भ्रमणकालों का सम्बन्ध । श्लोक