सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 746, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूगोलाध्याय ७२१ तदण्डमभवद्धेमं सर्वत्रतमसाऽऽवृतम् । तत्रानिरुद्धः प्रथमं व्यक्तीभूतस्सनातनः ॥१४॥ हिरण्यगर्भो भगवानेषच्छन्दसि पठ्यते । आदित्यो ह्यादिभूतत्वात् प्रसूत्या सूर्य उच्यते ॥१५॥ परं ज्योतिस्तमःपारे सूर्योऽयं सवितेति च । पर्येति भुवनान्येव भावयन्भूतभावनः ॥१६॥ प्रकाशात्मा तमोहन्ता महानित्येष विश्रुतः । ऋचोऽस्य मण्डलं सामान्युक्षा मूर्तियंजूंषि च ॥१७॥ त्रयीमयोऽयं भगवान् कालात्मा कालकृद्विभुः । सर्वात्मा सर्वगस्सूक्ष्मः सर्वमस्मिन्प्रतिष्ठितम् ॥१८॥ रथे विश्वमये चक्रं कृत्वा संवत्सरात्मकम् । छन्दांस्यश्वाः सप्तयुक्तः पर्यटत्येष सर्वदा ॥१६॥ त्रिपादममृतं गुह्यं पादोऽयं प्रकटोऽभवत् । सोऽहङ्कारं जगत्सृष्ट्यै ब्रह्माणमसृजद्विभुः ॥२०॥ तस्मै वेदान्वरान्दत्त्वा सर्वलोकपितामहम् । प्रतिष्ठाप्याण्डमध्येतु स्वयं पर्येति भावयन् ॥२१॥ अथ सृष्ट्यां मनश्चक्रे ब्रह्माऽहङ्कारमूर्तिभृत् । मनसश्चन्द्रमा जज्ञे चक्षुशस्तेजसां निधिः ॥२२॥ मनसः खं ततो वायुरग्निरापो धरा क्रमात् । गुणैक वृद्धया पञ्चैव महाभूतानि जज्ञिरे ॥२३॥ अनुवाद-(१२) परं ब्रह्म वासुदेव हैं । इनकी मूर्ति परम पुरुष है जो अव्यक्त, निर्गुण, शान्त और अव्यय और सांख्य शास्त्र के पच्चीस तत्वों से परे हैं । (१३) बाहर भीतर सर्व व्यापक देवता ने प्रकृति में प्रवेश करके संकर्षण रूप से प्रारम्भ में जल की सृष्टि करके उसमें बीज रखा (१४) जो सोने का अंडा हो गया जिसके चारों ओर अंधकार था । इसमें सनातन अनिरुद्ध पहले प्रकट हुए । (१५) इन्हों को वेदों में हिरण्यगर्भ भगवान् कहा गया है। पहले होने के कारण इन्हें आदित्य और सब चराचर जीवों को उत्पन्न करने के कारण इन्हें सूर्य कहते हैं । (१६) परम प्रकाश- मय होने के कारण इन्हें सूर्य और अंधकार के अंत में होने के कारण सविता कहते हैं । यह भूतभावन अर्थात् स्थावर जंगम सृष्टि को उत्पन्न, पालन और संहार करने- वाले भगवान लोकों को प्रकाशमान करते हुए भ्रमण करते हैं । (१७) इन्हें ही प्रकाशात्मा अंधकार का नाश करनेवाले और वेदों में महान् तत्व कहते हैं ।