सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२२ सूर्य-सिद्धान्त इनका मंडल ऋग्वेद, करण सामवेद और मूर्ति यजुर्वेद हैं। (१८) इसलिए इनको वेदत्रयात्मक कहते हैं। इनसे काल की गणना होती है इसलिए इनको कालात्मा और कालकृत कहते हैं । यह सब की आत्मा, सर्वव्यापक, सूक्ष्म हैं और सब सृष्टि इनमें स्थित है । (१६) संसार रूपी रथ में संवत्सर रूपी चक्र बनाकर सात छंदों के सात घोड़ों से युक्त होकर यह सर्वदा भ्रमण करते हैं । (२०) इनके तीन चरण अमृत होने से अगम्य हैं और यह एक चरण प्रकट हुआ है । इसी प्रभु ने जगत् की सृष्टि के लिए अहङ्काररूपी ब्रह्मा को बनाया । (२१) इसके बाद सब लोकों के पितामह ब्रह्मा को श्रेष्ठ वेदों को देकर और इन्हें अंडे के बीच में स्थापित करके अनिरुद्ध भगवान् स्वयम् लोकों को प्रकाशित करते हुए भ्रमण करते हैं । (२२) इसके पश्चात् अहङ्कार मूर्तिधारी ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना करने का विचार किया । ब्रह्मा के मन से चंद्रमा और नेत्रों से तेजपुञ्ज सूर्य उत्पन्न हुए । (२३) मन से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी पांच महाभूत क्रम से एक एक गुण की वृद्धि से उत्पन्न हुए । विज्ञान भाष्य—सूर्यांश पुरुष ने मयासुर से उपर्युक्त सृष्टिक्रम का जो वर्णन किया है वह वेदान्त, सांख्य, श्रीमद्भागवत् आदि में बतलाये गये सृष्टि-क्रम का मिश्रण है । यह क्रम भिन्न भिन्न ग्रंथों में भिन्न-भिन्न रीति से बतलाया गया है इसलिए यह संभव नहीं कि उन सबकी व्याख्या यहाँ की जाय । इस विषय पर लोकमान्य तिलक ने अपने गीता-रहस्य के ६-६ प्रकरणों में अच्छी तरह विचार किया है और कहीं-कहीं यूरोपीय विद्वानों के मतों की भी तुलना की है इसलिए इसकी जानकारी के लिए पाठकों को उसीका अध्ययन करना चाहिए । यहाँ उसीका सार दिया जा सकता है । सांख्यशास्त्र के अनुसार ब्रह्मांड का वंश-वृक्ष ७२३ पृष्ठ पर दिया जाता है । देखो गी० र० (पृ० १७६) :- वेदान्त का परब्रह्म इन २५ तत्वों से परे है जिसकी चर्चा सूर्य-सिद्धान्त के १२वें श्लोक में है (देखो गीता रहस्य पृ० २०३) । सूर्य-सिद्धान्त में संकर्षण, और अनिरुद्ध की जो चर्चा है उसकी चर्चा भागवतधर्म में इस प्रकार आयी है 'वासुदेव रूपी परमेश्वर से संकर्षण रूपी जीव उत्पन्न हुआ; और फिर संकर्षण से प्रद्युम्न अर्थात् मन तथा प्रद्युम्न से अनिरुद्ध अर्थात् अहङ्कार हुआ; कुछ लोग तो इन चार व्यूहों में से दो, तीन या एक ही को मानते हैं (देखो गीता रहस्य पृ० ४२६) । सूर्य- सिद्धान्त में प्रद्युम्न की चर्चा नहीं है। यहां अहङ्कार को ही ब्रह्मा बतलाया है । *पृष्ठों की संख्या सं० १६७३ के छपे हुए हिन्दी गीता-रहस्य के अनुसार है ।