भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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चन्द्रमा के शुक्ल भाग का भीतरी किनारा है और उस दिन चन्द्रमा के शुक्ल भाग की वही आकृति होगी जो उ छ द और उ पू द धनुओं के बीच में है। उ छ द धनु खींचने के लिए यह रीति बतलायी गयी है कि उ को केन्द्र मानकर छ पर धनु खींचो और छ को केन्द्र मानकर उ पर धनु खींचो; इन दोनों धनुओं के योग- विन्दुओं को मिलाने वाली रेखा खींचो। इसी प्रकार द और छ विन्दुओं पर भी धनु खींच कर उनके योग-विन्दुओं को मिलाने वाली रेखा खींचो। यह दोनों रेखाएँ जहाँ चन्द्रबिम्ब के भीतर काटें उसको केन्द्र मान कर छ विन्दु पर जो धनु खींचा जायगा वह उ छ द विन्दुओं को स्पर्श करेगा और वही चन्द्रमा के शुक्ल भाग का भीतरी किनारा होगा। उ, छ, द, विन्दुओं पर जानेवाले वृत्त का केन्द्र जानने की रीति रेखा- गणित की रीति से मिलती जुलती है क्योंकि धनुओं के योग विन्दुओं को मिलाने- वाली रेखाएँ उ छ और द छ रेखाओं की समविभाजक लम्ब रेखाएँ हैं जिनका सम्पात् विन्दु उ छ द वृत्त का केन्द्र है। चित्र में क विन्दु इसी रीति से स्थिर किया गया है। अब क को केन्द्र मानकर क छ त्रिज्या से उ छ द धनु खींचा गया और उ छ द पू क्षेत्र की आकृति जानी गयी जो चन्द्रमा के शुक्ल भाग की आकृति है जिसमें उ द चन्द्रमा के शृङ्ग हैं। यह जानने के लिए कि कौन शृङ्ग उन्नत अर्थात् उठा हुआ है चन्द्र-विम्ब की दिशाओं में दूसरी कल्पना करने को १४वें श्लोक में कहा गया है परन्तु मेरी समझ में इसकी आवश्यकता नहीं है। कोटि-अग्र च से भुजा भ र के समानान्तर एक रेखा खींचो। जो शृङ्ग इस रेखा के ऊपर होता है वही उन्नत कहा जाता है। दिये हुए चित्र में उत्तर शृङ्ग उन्नत है। चित्र से स्पष्ट है कि यदि भुज की दिशा दक्षिण हो तो चन्द्रमा का उत्तर शृङ्ग उन्नत होगा और भुज की दिशा उत्तर हो तो दक्षिण शृङ्ग उन्नत होगा। परन्तु यदि भुजा शून्य हो अर्थात् न उत्तर हो, न दक्षिण, तो चन्द्रमा का कोई शृङ्ग उन्नत न होगा वरन् सम होगा। यह बतलाया जा चुका है कि शुक्ल भाग की वृद्धि जानने की जो रीति दी गयी है वह स्थूल है और उ छ द धनु भी वृत्त की परिधि का अंश नहीं है वरन् दीर्घवृत्त की परिधि का अंश है। इसलिए परिलेख की यह रीति स्थूल है परन्तु काम चलाने के लिए पर्याप्त है। कृष्ण पक्ष के लिए नियम में जो संशोधन किया गया है उससे चन्द्रमा के असित भाग का ज्ञान होता है। परन्तु मेरी समझ में यदि सूर्योदयकालिक सूर्य की १७