सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाताधिकार ७०७ अनुवाद—(६) सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तिज्या को त्रिज्या से गुणा करके परम क्रान्तिज्या से भाग देना चाहिये । लब्धियों के धनु बनाकर उनका अन्तर निकाले । इस अन्तर को या इसके आधे को चन्द्रमा के भोगांश में जोड़ दे यदि पात- काल आने वाला हो और (१०) यदि पातकाल बीत चुका हो तो उस अन्तर या इसके उसके आधे को चन्द्रमा के भोगांश से घटा दे । इस अन्तर या आधे को जिसको जोड़ा या घटाया जाय उस दिन की सूर्य की गति से गुणा करके उस दिन की चन्द्रगति से भाग देना चाहिए । जो लब्धि आवे उसे सूर्य के भोगांश में उसी तरह जोड़ना या घटाना चाहिए जैसे चन्द्रमा में जोड़ा या घटाया है। (११) इसी प्रकार उस अन्तर या उसके आधे को चन्द्रपात अर्थात् राहु की गति से गुणा करके चन्द्र गति से भाग देकर जो लब्धि आवे उसे राहु के भोगांश में उलटे क्रम से संस्कार दे अर्थात् यदि चन्द्रमा में अन्तर जोड़ा हो तो राहु में घटाना चाहिए और घटाया है तो जोड़ना चाहिए। इन संस्कारों के बाद सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्ति फिर जाननी चाहिए। यदि दोनों समान न हों तो फिर ६-१० श्लोकों में बतलायी गयी क्रिया करनी चाहिए। यह असकृत्कर्म (Method of approxim- ation) तब तक करना चाहिए जब तक सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति समान न हो जायें । विज्ञान-भाष्य—नौवें श्लोक के पूर्वार्ध में जो नियम बतलाया गया है वह स्पष्टाधिकार के २८वें श्लोक में बतलाये गये नियम का विलोम है (पृष्ठ १२२- २३) । यहाँ क्रान्तिज्या, त्रिज्या और परम क्रान्तिज्या से भोगांश जानने की रीति है। इस रीति से जो भोगांश आवेगा वह ६० अंश से कम होगा । इससे अधिक जानने की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि हमको तो यही देखना है कि वसंत या शरद सम्पात से सूर्य और चन्द्रमा कितनी दूर हैं। स्पष्ट क्रान्ति भिन्न होने से यह भोगांश भी भिन्न होंगे परन्तु एक दूसरे के निकट अवश्य होंगे। इन भोगांशों का जो अन्तर होगा उतना ही चन्द्रमा पातकाल से आगे या पीछे होगा। यदि पातकाल आनेवाला है तो यह अन्तर चन्द्रमा के भोगांश में जोड़ना चाहिए क्योंकि उस समय तक चन्द्रमा इतना ही आगे बढ़ जायगा और यदि पातकाल बीत चुका है तो यह अन्तर चन्द्रमा के भोगांश से घटाना चाहिए क्योंकि बीते हुए पातकाल के समय चन्द्रमा इतना ही पीछे रहेगा। परन्तु सूर्य भी इतने समय में कुछ न कुछ स्थान छोड़ेगा । इसलिए पातकाल का सूर्य का स्थान भी स्पष्ट करना आवश्यक है। इसके लिए अनुपात से काम लेना चाहिए कि जब चन्द्रमा की दैनिक गति इतनी है तो सूर्य की दैनिक इतनी है इसलिए जब चन्द्रमा की गति उस अन्तर के समान होगी तब सूर्य की गति क्या होगी अर्थात् चन्द्र