सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पाताधिकार ७०७ अनुवाद—(६) सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तिज्या को त्रिज्या से गुणा करके परम क्रान्तिज्या से भाग देना चाहिये । लब्धियों के धनु बनाकर उनका अन्तर निकाले । इस अन्तर को या इसके आधे को चन्द्रमा के भोगांश में जोड़ दे यदि पात- काल आने वाला हो और (१०) यदि पातकाल बीत चुका हो तो उस अन्तर या इसके उसके आधे को चन्द्रमा के भोगांश से घटा दे । इस अन्तर या आधे को जिसको जोड़ा या घटाया जाय उस दिन की सूर्य की गति से गुणा करके उस दिन की चन्द्रगति से भाग देना चाहिए । जो लब्धि आवे उसे सूर्य के भोगांश में उसी तरह जोड़ना या घटाना चाहिए जैसे चन्द्रमा में जोड़ा या घटाया है। (११) इसी प्रकार उस अन्तर या उसके आधे को चन्द्रपात अर्थात् राहु की गति से गुणा करके चन्द्र गति से भाग देकर जो लब्धि आवे उसे राहु के भोगांश में उलटे क्रम से संस्कार दे अर्थात् यदि चन्द्रमा में अन्तर जोड़ा हो तो राहु में घटाना चाहिए और घटाया है तो जोड़ना चाहिए। इन संस्कारों के बाद सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्ति फिर जाननी चाहिए। यदि दोनों समान न हों तो फिर ६-१० श्लोकों में बतलायी गयी क्रिया करनी चाहिए। यह असकृत्कर्म (Method of approxim- ation) तब तक करना चाहिए जब तक सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति समान न हो जायें । विज्ञान-भाष्य—नौवें श्लोक के पूर्वार्ध में जो नियम बतलाया गया है वह स्पष्टाधिकार के २८वें श्लोक में बतलाये गये नियम का विलोम है (पृष्ठ १२२- २३) । यहाँ क्रान्तिज्या, त्रिज्या और परम क्रान्तिज्या से भोगांश जानने की रीति है। इस रीति से जो भोगांश आवेगा वह ६० अंश से कम होगा । इससे अधिक जानने की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि हमको तो यही देखना है कि वसंत या शरद सम्पात से सूर्य और चन्द्रमा कितनी दूर हैं। स्पष्ट क्रान्ति भिन्न होने से यह भोगांश भी भिन्न होंगे परन्तु एक दूसरे के निकट अवश्य होंगे। इन भोगांशों का जो अन्तर होगा उतना ही चन्द्रमा पातकाल से आगे या पीछे होगा। यदि पातकाल आनेवाला है तो यह अन्तर चन्द्रमा के भोगांश में जोड़ना चाहिए क्योंकि उस समय तक चन्द्रमा इतना ही आगे बढ़ जायगा और यदि पातकाल बीत चुका है तो यह अन्तर चन्द्रमा के भोगांश से घटाना चाहिए क्योंकि बीते हुए पातकाल के समय चन्द्रमा इतना ही पीछे रहेगा। परन्तु सूर्य भी इतने समय में कुछ न कुछ स्थान छोड़ेगा । इसलिए पातकाल का सूर्य का स्थान भी स्पष्ट करना आवश्यक है। इसके लिए अनुपात से काम लेना चाहिए कि जब चन्द्रमा की दैनिक गति इतनी है तो सूर्य की दैनिक इतनी है इसलिए जब चन्द्रमा की गति उस अन्तर के समान होगी तब सूर्य की गति क्या होगी अर्थात् चन्द्र
७०८ सूर्य-सिद्धान्त दैनिक गति : चन्द्र अन्तर :: सूर्य की दैनिक : सूर्य अन्तर । इस प्रकार जो अन्तर आवे उसे सूर्य के भोगांश में जोड़ना चाहिए यदि चन्द्रमा का अन्तर जोड़ा गया हो, नहीं तो घटाना चाहिए। इस प्रकार पातकाल में सूर्य और चन्द्रमा के स्पष्ट भोगांश मालूम हो जायेंगे । इससे फिर सूर्य और चंद्रमा की स्पष्ट क्रान्ति जाननी चाहिये । परन्तु चन्द्रमा की स्पष्ट क्रांति जानने के लिए चंद्रमा का शर जानना आवश्यक है जो चंद्रमा के पात राहु या केतु पर अवलम्बित है और इतनी देर में चंद्रपात भी वक्रीगति से अपना स्थान बदल देगा इसलिए उसी प्रकार अनुपात से राहु का भी परिवर्तन जान लेना चाहिये । परन्तु इस परिवर्तन का संस्कार राहु में विलोम रीति से करना चाहिए अर्थात् जब चंद्रमा और सूर्य में जोड़ना हो तो इसमें घटाना चाहिये और घटाना हो तो जोड़ना चाहिये क्योंकि राहु की गति उलटी होती है । जब चंद्र- क्रांति में चंद्र-शर का संस्कार करके स्पष्ट क्रान्ति आ जाय तब देख पड़ेगा कि सूर्य की क्रान्ति अब भी कुछ भिन्न है । इन क्रान्तियों से ६-११ श्लोकों में बतलायी गयी रीति को फिर दुहरावे और तब तक दुहरावे जब तक दोनों की क्रान्ति समान न हो जाय । इसी को असकृत्कर्म कहते हैं जिसकी चर्चा पीछे कई जगह हो चुकी है । ६-११ श्लोकों में बतलाये गये नियम की इतनी व्याख्या पर्याप्त है । यहाँ मुझे केवल इतना ही कहना है कि यह सब झंझट करने पर भी पातकाल का ठीक-ठीक ज्ञान होना असंभव है क्योंकि चंद्रमा की गति इतनी सरल नहीं है जैसी सूर्य-सिद्धान्त में बतलायी गयी है । इसका शुद्ध स्थान जानने के लिए कई संस्कार करने पड़ते हैं जिनकी चर्चा स्पष्टाधिकार में अच्छी तरह की गयी है । इसलिए यदि पातकाल का ठीक-ठीक निर्णय करना हो तो आधुनिक वेधों से ही काम लेना चाहिए जिसके लिए आधुनिक सिद्धान्त के आधार पर सारणी आदि तैयार करनी चाहिये । नौवें श्लोक के उत्तरार्ध में बतलाया गया है कि सूर्य और चंद्रमा के भोगांशों के अंतर या इस अन्तर के आधे को जोड़ना या घटाना चाहिए । टीकाकारों ने लिखा है कि आधा तब लेना चाहिए जब अन्तर अधिक हो । इससे गणना में तो कोई भेद नहीं पड़ता, केवल कुछ सरलता आ जाती है क्योंकि उद्देश्य तो यह है कि असकृत्कर्म से वह समय जाना जाय जिस समय दोनों की क्रान्ति समान होती है । पातकाल अर्धरात्रि से पहले या पीछे- क्रान्त्योस्समत्वे पातोऽथ प्रक्षिप्तांशोनिते विधौ । हीनेऽर्धरात्रिकाद्यातो भावि तात्कालिकेऽधिके ॥१२॥ अनुवाद-सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्तियाँ जब समान होती हैं तभी पातकाल होता है। नौवें श्लोक के अनुसार जाना हुआ पातकालिक स्पष्ट चन्द्रमा का
पाताधिकार ७०६ भोगांश स्पष्टाधिकार के अनुसार जाने हुए उस दिन के अर्धरात्रिकालिक स्पष्ट चन्द्रमा के भोगांश से कम हो तो समझना चाहिए कि पातकाल अर्धरात्रि से पहले हो चुका है और अधिक हो तो समझना चाहिए कि पातकाल अर्धरात्रि के बाद होगा । विज्ञान-भाष्य-चन्द्रमा का भोगांश सदैव बढ़ता रहता है इसलिए यदि पातकालिक स्पष्ट चन्द्रमा का भोगांश अर्धरात्रिकालिक स्पष्ट चन्द्रमा के भोगांश से कम हो तो निश्चय है कि पातकाल अर्धरात्रि से पहले हो चुका है और अधिक है तो अर्धरात्रि के बाद होगा । पातकाल अर्धरात्रि से कितना पहले या पीछे है- स्थिरीकृतार्धरात्रेन्द्वोर्द्वयोर्विवरलिप्तिकाः । षष्टिघ्नाश्चन्द्रभुक्त्याप्ताः पातकालस्य नाडिकाः ॥१३॥ अनुवाद-उपर्युक्त नियम से निश्चित किया हुआ पातकालिक चन्द्र-भोगांश और उस दिन के अर्धरात्रिकालिक चन्द्रभोगांश के अंतर को कलाओं में लिखकर साठ से गुणा करने और गुणनफल को अर्धरात्रिकालिक चन्द्रगति से भाग देने से जो लब्धि आवेगी उतनी ही घड़ी पहले या पीछे पातकाल हुआ है या होगा । विज्ञान-भाष्य-पातकालिक चन्द्रमा और अर्धरात्रिकालिक चंद्रमा के भोगांशों के अंतर से यह मालूम होगा कि पातकालिक चन्द्रमा अर्धरात्रिकालिक चन्द्रमा से कितना पहले या पीछे था । फिर यह गणना करनी चाहिए कि अर्धरात्रि- कालिक चन्द्रमा की दैनिक गति ६० घड़ी में होती है तो वह अंतर कितनी घड़ी में हुआ होगा । इतना ही आगे या पीछे पातकाल होना चाहिए । यदि सूर्य और चन्द्र की गणना आधुनिक सिद्धान्त द्वारा बहुत सूक्ष्म की जाय तो भी इस नियम से जो पातकाल आवेगा वह स्थूल होगा क्योंकि पातकालिक गणना बहुत सूक्ष्म होती है और चन्द्रमा की दैनिक गति इतनी अधिक होती है कि यदि अर्द्धरात्रिकालिक गति को पातकालिक समझ लिया जाय जैसा कि इस नियम में समझा गया है तो सूक्ष्मता नहीं आ सकती क्योंकि यदि पातकाल और अर्द्धरात्रि काल में बहुत अंतर है तो दोनों समय की चन्द्रगतियाँ समान नहीं होंगी इसलिए मेरी समझ में यह अच्छा होगा कि इस नियम से जो पातकाल आवे उस समय से दो घड़ी आगे और पीछे की चन्द्रगतियों से काम लिया जाय । पातकाल के आरम्भ और समाप्त होने का समय जानना- रवीन्दोर्मानयोगार्धं षष्ट्या संगुण्य भाजयेत् । तयोर्भुक्त्यन्यरेणाप्तं स्थित्यर्धं नाडिकादिकम् ॥१४॥
७१० सूर्य-सिद्धान्त पातकालस्फुटो मध्यः सोऽपि स्थित्यर्धर्वाजितः । तस्य संभवकालस्स्यात् संयुक्तस्तद्वान्तसंज्ञितः ॥१५॥ अनुवाद—(१४) सूर्य और चन्द्रबिम्बों के मानों को जोड़कर आधा करे और इसको ६० से गुणा करके दोनों की गतियों के अन्तर से भाग दे दे तो लब्धि स्थित्यर्ध घड़ी होती है । (१५) इसको स्पष्ट पातकाल से जो पात का मध्यकाल होता है घटा देने से जो समय आता है उसी समय पातकाल का आरम्भ होता है और जोड़ने से जो समय आता है उसी समय पातकाल का अन्त होता है । विज्ञान-भाष्य — स्थित्यर्ध की जो परिभाषा चन्द्रग्रहणाधिकार पृष्ठ ४६८- ७० में दी गयी है वही यहाँ भी समझनी चाहिए । पृष्ठ ४६६ में ६० × च फ / चा - रा सूत्र दिया गया है । यदि इसमें च फ की जगह सूर्य और चन्द्र-बिम्बों के योग का आधा रख दिया जाय तो पातकाल का स्थित्यर्ध हो जायगा जिसे जानने का नियम १४वें श्लोक में बतलाया गया है । १५वें श्लोक में स्थित्यर्ध से आरम्भ और अन्तकाल उसी तरह जाना जाता है जिस तरह ग्रहण का स्पर्श और मोक्षकाल जाना जाता है । इसका सार यह है कि जिस समय चन्द्रमा और सूर्य के बिम्बों के किनारों की क्रान्ति समान होती है उस समय से पातकाल का आरम्भ होता है और जिस समय दोनों बिम्बों के केन्द्रों की क्रान्ति समान होती है उस समय पात का मध्य- काल होता है जिसके जानने की रीति १३ श्लोकों तक बतलायी गयी है और जिस समय दोनों बिम्बों के दूसरे किनारों की क्रान्तियाँ भी समान हो जाती हैं उस समय पातकाल का अन्त होता है । पातकाल का प्रभाव और उसके योग्य कर्म— आद्यन्तकालयोर्मध्ये कालो ज्ञेयोऽतिदारुणः । प्रज्वलज्जलनाकारः सर्वकर्मसु गर्हितः ॥१६॥ एककाष्ठां गतं यावदर्कैन्दोर्मण्डलान्तरम् । संभवस्तावदेवास्य सर्वकर्मविनाशकृत् ॥१७॥ स्नानदानजपश्राद्धव्रतहोमादिकर्मसु । प्राप्यते सुमहच्छ्रेयः तत्कालज्ञानतस्तदा ॥१८॥ अनुवाद—(१६) पातकाल के आरंभ से अंत तक का समय बड़ा दारुण, प्रज्वलित, और अग्नि स्वरूप होता है। यह सब शुभ कार्यों के लिए निन्दित है । (१७) जब तक सूर्य बिम्ब के किसी विन्दु की क्रान्ति चन्द्रबिम्ब के किसी विन्दु की
पाताधिकार ७११ क्रान्ति के समान होती है तब तक सब कर्मों का नाश करनेवाले इस पात की स्थिति रहती है। (१८) इस काल में स्नान, दान, जप, श्राद्ध, व्रत, होम आदि कर्मों से अत्यन्त पुण्य प्राप्त होता है और इस काल के ज्ञान से भी पुण्य होता है । विज्ञान-भाष्य -- जैसे पूर्णिमा, अमावस्या आदि कालों में स्नान, दान, जप अदि काम अच्छे समझे जाते हैं वैसे ही पातकाल में भी यह कर्म अच्छे बतलाये गये हैं और जिस प्रकार मुहूर्त-चिंतामणि में बतलाये गये बहुत से योगों में शुभ कर्म करना वर्जित है उसी प्रकार यहाँ भी । परन्तु ज्योतिषी लोग यथार्थ में इन महापातों का विचार कम करते हैं, वह शायद इसलिए कि इसकी गणना पुराने सिद्धान्तों के आधार पर तो असम्भव ही है । इसीलिए पंचांगों में इनकी चर्चा नहीं के बराबर रहती है। हिन्दू विश्वविद्यालय के विश्व-पंचांग में भी दो एक जगह चर्चा करके छोड़ दिया जाता है यद्यपि इसके लेखकों को नाविक-पंचांग की सहायता से पातकाल का जानना बड़ा सुगम होता है क्योंकि और बातों में तो ये नाविक पंचांग से सहायता लेते ही हैं। १८वें श्लोक की अंतिम बात निस्संदेह बहुत सुन्दर है। उसमें यह बतलाया गया है कि पातकाल के जानने से भी पुण्य होता है अर्थात् पातकाल का शुद्ध-शुद्ध ज्ञान प्राप्त करना भी पुण्य कार्य है जो तभी संभव है जब सूर्य, चन्द्रमा इत्यादि की गणना ठीक-ठीक दृक्तुल्यता से की जाय और ज्योतिष सिद्धान्त का पठन-पाठन नवीन वैज्ञानिक रीति से किया जाय। केवल प्राचीन सिद्धान्तों को ही सब कुछ समझना और उनमें देशकाल के अनुसार संशोधन न करना तथा शुद्ध वैज्ञानिक रीति को निंदित समझना बुद्धिमानी नहीं है और न प्राचीन ज्योतिषाचार्यों की पद्धति के ही अनुकूल है। रवीन्द्वोः तुल्यता क्रान्त्योर्विषुवत्सन्निधौ यदा । द्विर्भवत्येव तदा पात: स्यादभावो विपर्ययात् ।।१६।। अनुवाद - जब विषुवद् वृत्त के निकट अर्थात् वसंत संपात या शरद संपात के पास सूर्य चन्द्रमा की क्रान्तियाँ समान होती हैं तब पात दो बार होते हैं। इसके विपरीत दशा में अर्थात् सायन कर्क या सायन मकर बिन्दु के समीप पात का अभाव होता है। विज्ञान-भाष्य - जब सूर्य और चन्द्रमा वसंत या शरद सम्पात के पास होते हैं तब इनकी क्रान्तियों की गति बहुत तीव्र होती है। इसलिए जब चन्द्रमा विषुवत् वृत्त के दक्षिण होता है और सूर्य उत्तर तब दोनों की क्रान्तियाँ समान होती हैं। इसके बाद जब चन्द्रमा शीघ्र गति से कारण उत्तर हो जाता है तब भी इसकी क्रान्ति सूर्य की क्रान्ति के समान हो जाती है। इस प्रकार क्रान्ति-साम्य दो बार एक ही दो दिन के बीच में हो सकता है। परन्तु जब सूर्य और चन्द्रमा दोनों
७१२ सूर्य-सिद्धान्त विषुवद्वृत्त से उत्तर रहेंगे तब अमावस्या का समय होगा और ऐसी दशा में पात- काल नहीं माना जाता जैसा कि पहले और दूसरे श्लोकों से सिद्ध होता है। इसलिए जान पड़ता है कि केवल यह विशेषता बतलाने के लिए श्लोक १६ दिया गया है कि क्रान्ति-साम्य दो बार हो सकता है, दो ही एक दिन के अन्तर पर । परन्तु यदि सूर्य सायन कर्क या सायन मकर विन्दुओं के समीप हो तो इसकी क्रान्ति परम क्रान्ति के निकट रहती है। यदि इस समय चन्द्रमा की क्रान्ति शर की दिशा भिन्न होने के कारण कम हो तो क्रान्ति साम्य नहीं हो सकता और न वैधृति या व्यतीपात का ही संयोग घट सकता है। तीसरे प्रकार का व्यतीपात जानने की रीति-- शशाङ्कार्कयुतेलिप्ता भभोगेन विभाजिताः । लब्धं सप्तदशान्तोऽन्यो व्यतीपातः तृतीयकः ॥२०॥ अनुवाद—सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों को जोड़कर कला बनावे और इसको ८०० से भाग दे दे। यदि लब्धि १७ के अन्त में हो अर्थात् १७ के निकट हो तो तीसरा व्यतीपात होता है। विज्ञान भाष्य—स्पष्टाधिकार के श्लोक ६५ में विष्कम्भादि २७ योगों के जानने की रीति दी हुई है। इनमें १७ वां योग व्यतीपात बतलाया गया है (देखो पृष्ठ २१६ ) । इसी के जानने की रीति यहाँ भी दुहरायी गयी है। वह इसलिए, जिससे मालूम हो जाय कि इस अधिकार में क्रान्ति-साम्य से उत्पन्न जिन महापातों की चर्चा है उन्हीं के समकक्ष व्यतीपात नामक योग भी होता है। इसी तर्क से कहा जा सकता है कि २७वें योग वैधृति को भी वैधृति नामक महापात के समान समझना चाहिए । यहां एक बात ध्यान देने की है। व्यतीपात और वैधृति योगों की गणना सूर्य और चन्द्रमा के निरयण भोगांशों से की जाती है परन्तु महापातों की गणना सायन भोगांशों से की जाती है। इसलिए यहां यह प्रश्न उपस्थित होता है कि २०वें श्लोक में जो नियम दिया गया है उसमें सायन भोगांशों का प्रयोग करना चाहिए या निरयण । गूढ़ार्थ प्रकाशिका संस्कृत टीका में तो अयनांश संस्कृत भोगांश अर्थात् सायन भोगांश से ही गणना करने को बतलाया गया है और इसी का अनुसरण पं० माधव पुरोहित ओर पं० इन्द्रनारायण द्विवेदी ने किया है। परन्तु स्वामी विज्ञानानन्द ने अपनी बंगला टीका में कोई चर्चा नहीं की है। मुझे जान पड़ता है कि यह व्यतीपात विष्कम्भादि योगों का ही व्यतीपात है, उससे भिन्न नहीं है। इसलिए जिस प्रकार इन योगों की गणना होती है उसी प्रकार इस श्लोक में बतलाये हुए व्यतीपात की
पाताधिकार ७१३ गणना करनी चाहिए अर्थात् निरयण भोगांशों से ही इसकी गणना होनी चाहिए तथा गूढ़ार्थ प्रकाशिका के अयनांश-संस्कृत भोगांशों को न लेना चाहिए । सायन भोगांश लेने में एक अड़चन और है । वह यह कि इससे जो व्यतीपात या वैधृति काल आवेगा वह विष्कम्भादि योगों के व्यतीपात और वैधृति से भी भिन्न होगा । इस प्रकार एक मास में चार-चार व्यतीपात और वैधृति कालों की कल्पना करनी पड़ेगी जो ग्रन्थकार की तर्क-शैली से भी अनुचित जान पड़ती है । भसंधि और गंडान्त योग कब होता है— सार्पेन्द्रपौष्णधिष्ण्यानामन्त्याः पादा भसन्धयः । तदग्रभेष्वद्यपदो गण्डान्तं नाम कीर्त्यते ॥२१॥ अनुवाद—आश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्रों के चौथे चरण नक्षत्र-सन्धि हैं और इनके आगेवाले नक्षत्रों मघा, मूल, और अश्विनी के प्रथम चरण गंडांत कहलाते हैं । विज्ञान-भाष्य—मुहूर्त-चिन्तामणि तथा अन्य मुहूर्त ग्रन्थों में इनकी चर्चा विशेष प्रकार से है । नक्षत्र-संधि या गंडांत में जो संतान होती है उसके लिए साधा- रणतः कहा जाता है कि मूल में हुई है । इसे अशुभ मानते हैं । बच्चा पैदा होने के २७वें दिन जब वही गंडांत या भसंधि काल फिर आता है तब मूलशान्ति के लिए विशेष प्रकार की पूजा की जाती है । यहाँ गंडांत की चर्चा करने का अर्थ यही जान पड़ता है कि जो अशुभ फल महापातों का होता है यही गंडांत का भी होता है जैसा कि अगले श्लोक से प्रकट है । यह भसंधियां चौथी, आठवीं, और बारहवीं राशियों के अंतिम भाग हैं और गंडांत पांचवीं, नवीं और पहली राशियों के आरंभिक भाग हैं । व्यतीपातत्रयं घोरं गण्डान्तं त्रितयं तथा । एवं भसन्धित्रितयं सर्व कर्मसु वर्जयेत् ॥२२॥ अनुवाद—तीनों व्यतीपात, तीनों गंडांत और नक्षत्रसंधियां बहुत भयंकर होती हैं इसलिए ये सब शुभकामों में वर्जित हैं अर्थात् जब ये हों तब कोई शुभ कर्म नहीं करना चाहिये । विज्ञान-भाष्य—इस श्लोक में वैधृत व्यतीपात की चर्चा नहीं है परन्तु तर्क शैली से और पहले के श्लोकों से जान पड़ता है कि वैधृति भी इसमें सम्मिलित है । टीकाकारों ने ऐसा ही किया भी है । उपसंहार— इत्येवं परमं पुण्यं ज्योतिषां चरितं हितं । रहस्यमिदमाख्यातं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥२३॥ १८
७१४ सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—मैंने यह परम पवित्र अत्यन्त रहस्ययुक्त और हितकर ज्योति- विज्ञान की कथा कही, अब और क्या सुनना चाहता है ? विज्ञान-भाष्य — सूर्यांश पुरुष ने मयासुर से जिस ज्योतिर्विज्ञान की कथा पहले अधिकार में आरंभ की थी उसका अंत यहाँ हुआ । इस पर मयासुर ने जो प्रश्न किये उसकी चर्चा आगे तीन अध्यायों में होगी । इसलिए यहाँ तक जो कुछ कहा गया है उसे सूर्य-सिद्धान्त का पूर्वार्ध कहते हैं । इसके आगे जो तीन अध्याय हैं उन्हें उत्तरार्ध कहते हैं । अब हम यहाँ संक्षेप में यह बतला कर कि महापातों की गणना कैसे की जाती है इस पूर्वार्ध को समाप्त करेंगे । पंचांगों से महापातों का स्थूलकाल निश्चय करना—विष्कम्भादि २७ योगों की गणना पंचांगों में अवश्य रहती है । इनको जानने की रीति स्पष्टा- धिकार के ६५ वें श्लोक में बतलायी गयी है जो यह है—सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों को जोड़ कर कला बनाओ और इसको ८०० से भाग दे दो। जो लब्धि आवे उससे बीते हुए योगों की संख्या मालूम होती है और जो शेष बचता है उससे वर्तमान योग का ज्ञान होता है । इस नियम में सूर्य और चन्द्रमा के भोगांश अश्विनी नक्षत्र के आदि बिन्दु से नापे जाते हैं और महापातों की गणना के लिए भोगांशों की नाप वसंत-संपात विन्दु से की जाती है । यदि दोनों के लिए भोगांशों की नाप वसंत-संपात से होती तो महापातों का समय जानना बड़ा सुगम होता क्योंकि जिस समय १४वें योग हर्षण का आधा समय बीतता उस समय सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का जोड़ १८० अंश होता और व्यतीपात नामक पातकाल का मध्य होता है और जिस समय वैधृति योग का अंत होता उसी समय वैधृति नामक पात का मध्यकाल होता । परन्तु बात ऐसी नहीं है । इसलिए इसमें थोड़ा सा संस्कार करना पड़ेगा । सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार अश्विनी का आदि-विन्दु आजकल जहाँ है वहाँ से वेध-द्वारा-सिद्ध वसंत संपात बिन्दु २२ अंश ४५ कला के लगभग पच्छिम है । इसी अन्तर को अयनांश कहते हैं । यदि यहाँ से सूर्य और चन्द्रमा के भोगांश लिये जायँ तो दोनों का जोड़ ४५ अंश ३० कला अधिक होता है । व्यतीपात के लिए सूर्य और चन्द्रमा के सायन भोगांशों का जोड़ १८० अंश होता है, इसलिए १८० अंश - ४५ अंश ३० कला = १३४ अंश ३० कला = ८०७० कला । यह अश्विनी नक्षत्र के आदि-विन्दु से व्यती- पातकालिक सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का जोड़ है । इसको ८०० कला से भाग देने पर १० लब्धि और ७० कला शेष होते हैं । १० से सिद्ध होता है कि व्यतीपात काल में गंड योग बीता रहता है और वृद्धि योग का आरम्भ हुआ रहता है । इस-
पाताधिकार ७१५ लिए स्थूल रूप से व्यतीपात काल को निश्चय करने के लिए जिस समय वृद्धि योग का आरम्भ होता है उसी समय के सूर्य चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्ति जानकर व्यतीपात काल की सूक्ष्म गणना करनी चाहिए । वैधृति नामक पातकाल का निश्चय करने के लिए ४५ अंश ३० कला को ३६० अंश से घटाना चाहिए। ऐसा करने से शेष आया ३१४ अंश ३० कला = १८८७० कला । इसको ८०० से भाग देने पर २३ लब्धि और ४७० कला शेष हुए, जिससे प्रकट होता है कि वैधृति नामक पातकाल में २३ वां योग शुभ बीता रहता है और २४वें योग शुक्ल का भी आधा बीत चुका रहता है। इसलिए स्थूल रूप से वैधृति नामक पात शुक्ल योग के आधे भाग पर होता है। इसलिए सूक्ष्म गणना करने के लिए इसी समय के सूर्य, और चन्द्रमा और स्पष्टक्रान्ति जाननी चाहिए। इसके लिए सूर्य, चन्द्रमा और राहु के स्पष्ट भोगांश, सूर्य की क्रान्ति, चन्द्रमा की मध्यमक्रान्ति और शर जानकर इसका संस्कार करके चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्ति जाननी चाहिए जिसकी रीति स्पष्टाधिकार पृ० १६६-२०० में बतलायी गयी है। इसलिए उदाहरण में इन सब बातों के बतलाने की आवश्यकता नहीं जाना पड़ती। यहाँ केवल यह दिखलाना पर्याप्त होगा कि सूर्य-सिद्धान्त के ध्रुवाङ्कों से महापातों के समय की गणना करना न तो सुगम ही है और न शुद्ध जब कि आधुनिक रीति से जाने हुए ध्रुवाङ्कों से यह बात शुद्धतापूर्वक जानी जा सकती है। मेरे पास इस समय १६२६ ई० का नाविक पंचांग मौजूद है इसलिए इसी की सहायता से वैशाख शुक्ल १८८६ विक्रमीय के व्यतीपात नामक महापात की गणना की जाती है । १८८६ के वैशाख शुक्ल पक्ष में गंड योग का अंत १४ मई को ४२ घड़ी ४० पल पर होता है और इसके बाद वृद्धि योग का आरम्भ होता है इसलिए १४ या १५ मई को व्यतीपात नामक महापात होगा : अब नाविक पंचांग से यह देखना चाहिए कि इन तारीखों में किस समय सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्तियां समान होंगी । नाविक पंचांग के पृष्ठ ५१ से जान पड़ता है कि १४ मई को सूर्य का उत्तर क्रान्ति १८ अंश ३४ कला और ४२ विकला है तथा १५ मई को १८ अंश ४६ कला और ६ विकला है। परन्तु चन्द्रमा की क्रान्ति १४ मई को २२ अंश से अधिक है इसलिए १४ मई को व्यतीपात काल नहीं आवेगा परन्तु १५ मई की शाम को यह घटना हो सकती है क्योंकि, अंश कला वि० १५ मई के मध्याह्न काल में सूर्य की क्रान्ति १८ ४६ ६.१ १६ " " " १६ ३ १०'६
७१६ सूर्य-सिद्धान्त २४ घंटे में क्रान्तिगति १४ ४.८ १५ मई के सायंकाल ६ बजे चंद्रक्रान्ति १८ ५४ ११.५ ,, ,, ७ ,, ,, १८ ४२ ३३.४ १ घंटे में चन्द्रक्रान्ति की गति ११ ३८.१ यहाँ सूर्य क्रान्ति बढ़ रही है और चन्द्रमा की घट रही है इसलिए चन्द्रमा की क्रान्ति की गति से यह निश्चय है कि ६ बजे के आसपास ही दोनों की क्रान्तियां समान होंगी । ६ घंटे में सूर्य की क्रान्ति की गति ६/२४ × (१ कला ४.८ विकला) = ३ कला ३१.२ विकला है। इसलिए ६ बजे सायंकाल सूर्य की क्रान्ति हुई १८ अंश ४६ कला ६.१ विकला + ३ कला ३१.२ विकला = १८ अंश ५२ कला ३७.३ विकला। यह छः बजे की चन्द्र क्रान्ति से कम है और चन्द्र-क्रान्ति घट रही है तथा सूर्य-क्रान्ति बढ़ रही है इसलिए छः बजे के बाद ही कुछ मिनिटों में दोनों की क्रान्तियाँ समान होंगी। यह जानने के लिये दोनों की क्रान्तियों के अन्तर को दोनों की क्रान्ति-गतियों के अंतर से भाग देना चाहिये । अंश कला विकला ६ बजे चन्द्र-क्रान्ति = १८ ५४ ११.५ ,, सूर्य क्रान्ति = १८ ५२ ३७.३ दोनों का अन्तर = १ ३४.२ = ६४.२ वि० सूर्य की १ घंटे की क्रान्ति-गति = (१४ कला ४.८ वि०) / २४ = ३५.२ विकला चंद्रमा की १ घंटे की क्रान्ति गति = ११ कला ३८.१ विकला दोनों की दिशाएँ भिन्न हैं इसलिए इनका अंतर जानने के लिए इनको जोड़ना चाहिए । इसलिए दोनों का योग = १२ कला १३.३ विकला = ७३३.३ विकला । जब ७३३.३ विकला का अंतर १ घंटे में होता है तब ६४.२ विकला का अंतर कितने समय में होगा । ७३३.३ : ६४.२ : : १ घंटा : इष्टकाल ∴ इष्टकाल = (६४.२ × १) / ७३३.३ घंटा = (६४.२ × १ × ६०) / ७३३.३ मिनट = ७ मिनट ४३ सेकंड के लगभग
पाताधिकार ७१७ इसलिए १५ मई को ६ बजकर ७ मिनट ४३ सेकंड पर व्यतीपात का मध्यकाल होगा । परन्तु यह गणना ग्रीनविच के टाइम से की गई है जो भारतवर्ष के रेलवे टाइम से ५ घंटा ३० मिनट पीछे है। इसलिए भारतवर्ष के रेलवे टाइम के अनुसार १५ मई की रात को ११ बजकर ३७ मिनट ४३ सेकंड पर व्यतीपात काल का मध्य होगा । अब स्थित्यर्ध-काल जानकर इससे घटाया जाय तो व्यतीपात काल का प्रारंभ काल आ जायगा और जोड़ा जाय तो अंतकाल आवेगा। यह १४वें श्लोक के अनुसार सुगमतापूर्वक हो सकता है इसलिए उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती । इस प्रकार पाताधिकार नामक ११वें अध्याय का विज्ञान भाष्य समाप्त हुआ ।
द्वादश अध्याय भूगोलाध्याय (संक्षिप्त वर्णन) [ श्लोक १-६—मयासुर के भूगोल, खगोल तथा ऋतु सम्बन्धी अनेक प्रश्न । श्लोक १०-११—सूर्यांश पुरुष का मयासुर से उत्तर सुनने के लिए कहना । श्लोक १२-२३—वासुदेव से लेकर पंच महाभूतों तक की उत्पत्ति का क्रम । श्लोक २४—पाँच ताराग्रहों की उत्पत्ति । श्लोक २५—बारह राशियों और २७ नक्षत्रों की उत्पत्ति । श्लोक २६-३०—चराचर जगत् की उत्पत्ति । श्लोक ३०-३३—ब्रह्माण्ड में ग्रहों की कक्षाओं का क्रम और पृथ्वी का स्थान । श्लोक ३३-३६—भूगोल में पाताल, सुमेरु आदि के स्थान । श्लोक ३७-४२—विषुवत्रेखा पर स्थित चार नगरों के स्थान । श्लोक ४३-४५—विषुवत्रेखा और उत्तर दक्षिण ध्रुवों का सम्बन्ध । श्लोक ४६—भिन्न ऋतुओं में सूर्य की किरणें मन्द और तीव्र क्यों होती हैं । श्लोक ४७- ५०—उत्तर ध्रुवनिवासियों अर्थात् देवताओं और दक्षिण ध्रुव निवासियों अर्थात् असुरों के दिन रात का विभाग । श्लोक ५१—देवताओं और असुरों के मध्याह्न और मध्यरात्रि का समय । श्लोक ५२-५३—भूगोल पर १८० अंश की दूरी पर रहने वाले एक दूसरे को ऊपर नीचे क्यों समझते हैं । श्लोक ५४—भूगोल चाक की तरह क्यों देख पड़ता है । श्लोक ५५-५८—भूतल पर दिन रात के घटने-बढ़ने का कारण । श्लोक ५६—किसी समय विषुवत्रेखा से कितनी दूरी पर सूर्य ठीक ऊपर देख पड़ता है । श्लोक ६०-६१—विषुवत्रेखा से कितनी दूरी पर ६० घड़ी का दिन और ६० घड़ी की रात होती है । श्लोक ६२-६०—घड़ी से भी बड़ा दिन या रात कहाँ होती है । श्लोक ६३-६७—दो दो महीने, चार चार और छः छः महीने का दिन या रात कहाँ होती है । श्लोक ६८—उत्तरायण और दक्षिणायन के दिन सूर्य कहाँ ठीक देख पड़ता है । श्लोक ६६—किसी वस्तु की छाया कहाँ किस दिशा में होती है । श्लोक ७०-७१—भूतल पर जब एक जगह सूर्य का उदय होता है तब कहाँ मध्याह्न रहता है और कहाँ मध्यरात्रि अथवा अस्तकाल । श्लोक ७२— ध्रुवों की दिशा में जाने से आकाशीय ध्रुवों की उन्नति और नक्षत्र-कक्षा की अवनति देख पड़ती है । श्लोक ७३—प्रवह वायु के द्वारा नक्षत्र-चक्र कैसे भ्रमण करता है । श्लोक ७४—देवताओं, पितरों और मनुष्यों के दिन रात का प्रमाण । श्लोक ७५-७७—ग्रहों की कक्षाओं और उनके भ्रमणकालों का सम्बन्ध । श्लोक
भूगोलाध्याय ७१६ ७८-७६-वर्षपति, मासपति, दिनपति तथा होरापतियों का सम्बन्ध । श्लोक ८०- नक्षत्र-कक्षा का विस्तार । श्लोक ८१-८४-आकाश-कक्षा का प्रमाण तथा इससे ग्रह की कक्षाओं और गतियों का सम्बन्ध । श्लोक ८५-६०-कक्षाओं का परिमाण योजनों में ।] इस अध्याय में भूगोल की उत्पत्ति, स्थिति, विस्तार आदि सभी बातों का निरूपण किया गया है, इसीलिए इसका नाम भूगोलाध्याय है । साथ ही साथ ग्रहों, नक्षत्रों और आकाश की कक्षाओं के प्रमाण भी दिये गये हैं । मयासुर के प्रश्न और सूर्यांश पुरुष के उत्तर की भूमिका - अथार्काशसमुद्भूतं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः । भक्त्या परमयाऽभ्यर्च्य पप्रच्छेदं मयोऽसुरः ॥१॥ भगवन् किंप्रमाणा भूः किमाकारा किमाश्रया । किविभागा कथं वाऽत्र सप्तपातालभूमयः ॥२॥ अहोरात्रव्यवस्थां च विदधाति कथं रविः । कथं पर्येति वसुधां भुवनानि विभावयन् ॥३॥ देवासुराणामन्योन्यमहोरात्रं विपर्ययात् । किमर्थं तत्कथं वा स्याद् भानोः भगणपूरणात् ॥४॥ पित्र्यं मासेन भवति नाडीषष्ट्या तु मानुषम् । तदेव किल सर्वत्र न भवेत् केन हेतुना ॥५॥ दिनाद्धमासमहोरात्रामषिषा न समाः कुतः । कथं पर्येति भगणः सग्रहोऽयं किमाश्रयः ॥६॥ भूमेरुपर्यधुर्युक्ताः किमुत्सेधाः किमन्तराः । ग्रहर्क्षकक्ष्याः किम्मान्त्राः स्थिताः केन क्रमेण ताः ॥७॥ ग्रीष्मे तीव्राः करा भानोः न हेमन्ते तथाविधाः । कियती तत्करव्याप्तिः मानानि कति किञ्च कैः ॥८॥ एतन्मे संशयं छिन्धि भगवन्भूतभावन । अन्यो न त्वामृते छेत्तां विद्यते सर्वदर्शिवान् ॥६॥ इति भक्त्योदितं श्रुत्वा मयेनार्काशसंभवः । रहस्यतरमध्यायं पुनः प्राह यथाश्रुतम् ॥१०॥ शृणुष्वैकमना भूत्वा गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् । वक्ष्याम्यतीवभक्तानां नादेयं विद्यते मम ॥११॥
७२० सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—(१) इसके उपरान्त मयासुर ने सूर्य के अंश से उत्पन्न हुए पुरुष को हाथ जोड़ कर प्रणाम करके और बड़ी भक्ति से पूजा करके यह पूछा । (२) हे भगवन्, इस पृथ्वी का परिमाण क्या है, इसका आकार कैसा है और यह किस के आधार पर है, इसके कितने विभाग हैं और इसमें सात पातालों की भूमि कैसे स्थित है । (३) सूर्य अहोरात्र की व्यवस्था कैसे करते हैं और भुवनों को प्रकाशित करते हुए पृथ्वी के चारों ओर कैसे घूमते हैं। (४) देवताओं और असुरों के दिन-रात एक दूसरे के विपरीत क्यों होते हैं और सूर्य का एक भगण (चक्कर) पूरा होने पर यह कैसे होता है । (५) पितरों का दिन-रात एक मास का और मनुष्यों का ६० घड़ियों का क्यों होता है । सब जगह एक ही प्रकार के दिन-रात क्यों नहीं होते । (६) दिन, वर्ष, मास और होरा (घंटा) के स्वामी समान क्यों नहीं होते, ग्रहों के साथ नक्षत्र मंडल कैसे घूमता है और इनका आधार क्या है । (७) ग्रहों और नक्षत्रों की कक्षाएँ पृथ्वी से ऊपर कितनी कितनी ऊँचाई पर तथा परस्पर कितने अन्तर पर हैं, इनके मान क्या हैं और ये किस क्रम से स्थित हैं। (८) ग्रीष्म ऋतु में सूर्य कि किरणें बहुत तीव्र क्यों होती हैं और हेमन्त ऋतु में वैसी क्यों नहीं होतीं । यह किरणें कितनी दूर दूर तक जाती हैं; सौर, चन्द्र आदि मान कितने हैं और इनसे क्या प्रयोजन निकलता है । (६) हे भूतभावन, भगवन् मेरी इन शंकाओं को दूर कीजिये क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं इसलिये आपके सिवा दूसरा मनुष्य मेरी शंकाओं को नहीं दूर कर सकता (१०) भक्ति से कहे हुए मयासुर के इन वचनों को सुनकर सूर्यांश पुरुष ने उससे फिर पहले के रहस्य स्वरूप दूसरा अध्याय कहा । (११) एकाग्रचित्त होकर यह अध्यात्म नामक तत्व सुनो जिसे मैं कहता हूं क्योंकि भक्तों के लिए मैं कोई वस्तु अदेय नहीं समझता । विज्ञान-भाष्य—मयासुर ने जितने प्रश्न किये हैं उनका उत्तर जानने की अभिलाषा सभी तत्वज्ञानियों को होती है । इस पर सूर्यांश पुरुष ने बतलाया है कि उत्तर में जिस रहस्य का प्रतिपादन किया जायगा वह अध्यात्म ज्ञान से सम्बन्ध रखता है । इस पर बहुत से लोग कह उठेंगे कि मयासुर के प्रश्नों का उत्तर तो कोई भी ज्योतिषी और भूगोलशास्त्री दे सकता है । यह विचार कुछ दूर तक ठीक है परन्तु सूर्यांश पुरुष ने इस संसार की उत्पत्ति की चर्चा की है वह तो अवश्य अध्यात्म संबंधी ही कही जा सकती है क्योंकि यह भौतिक विज्ञान से परे की बात है । सृष्टि का क्रम— वासुदेवः परं ब्रह्म तन्मूर्तिः पुरुषः परः । अव्यक्तो निर्गुणः शान्तः पञ्चविंशात्परोऽव्ययः ॥१२॥ प्रकृत्यन्तर्गतो देवः बोध्यमानश्च सर्वगः । संकर्षणोऽपः सृष्ट्वादौ तासुवीर्यमवासृजत् ॥१३॥
भूगोलाध्याय ७२१ तदण्डमभवद्धेमं सर्वत्रतमसाऽऽवृतम् । तत्रानिरुद्धः प्रथमं व्यक्तीभूतस्सनातनः ॥१४॥ हिरण्यगर्भो भगवानेषच्छन्दसि पठ्यते । आदित्यो ह्यादिभूतत्वात् प्रसूत्या सूर्य उच्यते ॥१५॥ परं ज्योतिस्तमःपारे सूर्योऽयं सवितेति च । पर्येति भुवनान्येव भावयन्भूतभावनः ॥१६॥ प्रकाशात्मा तमोहन्ता महानित्येष विश्रुतः । ऋचोऽस्य मण्डलं सामान्युक्षा मूर्तियंजूंषि च ॥१७॥ त्रयीमयोऽयं भगवान् कालात्मा कालकृद्विभुः । सर्वात्मा सर्वगस्सूक्ष्मः सर्वमस्मिन्प्रतिष्ठितम् ॥१८॥ रथे विश्वमये चक्रं कृत्वा संवत्सरात्मकम् । छन्दांस्यश्वाः सप्तयुक्तः पर्यटत्येष सर्वदा ॥१६॥ त्रिपादममृतं गुह्यं पादोऽयं प्रकटोऽभवत् । सोऽहङ्कारं जगत्सृष्ट्यै ब्रह्माणमसृजद्विभुः ॥२०॥ तस्मै वेदान्वरान्दत्त्वा सर्वलोकपितामहम् । प्रतिष्ठाप्याण्डमध्येतु स्वयं पर्येति भावयन् ॥२१॥ अथ सृष्ट्यां मनश्चक्रे ब्रह्माऽहङ्कारमूर्तिभृत् । मनसश्चन्द्रमा जज्ञे चक्षुशस्तेजसां निधिः ॥२२॥ मनसः खं ततो वायुरग्निरापो धरा क्रमात् । गुणैक वृद्धया पञ्चैव महाभूतानि जज्ञिरे ॥२३॥ अनुवाद-(१२) परं ब्रह्म वासुदेव हैं । इनकी मूर्ति परम पुरुष है जो अव्यक्त, निर्गुण, शान्त और अव्यय और सांख्य शास्त्र के पच्चीस तत्वों से परे हैं । (१३) बाहर भीतर सर्व व्यापक देवता ने प्रकृति में प्रवेश करके संकर्षण रूप से प्रारम्भ में जल की सृष्टि करके उसमें बीज रखा (१४) जो सोने का अंडा हो गया जिसके चारों ओर अंधकार था । इसमें सनातन अनिरुद्ध पहले प्रकट हुए । (१५) इन्हों को वेदों में हिरण्यगर्भ भगवान् कहा गया है। पहले होने के कारण इन्हें आदित्य और सब चराचर जीवों को उत्पन्न करने के कारण इन्हें सूर्य कहते हैं । (१६) परम प्रकाश- मय होने के कारण इन्हें सूर्य और अंधकार के अंत में होने के कारण सविता कहते हैं । यह भूतभावन अर्थात् स्थावर जंगम सृष्टि को उत्पन्न, पालन और संहार करने- वाले भगवान लोकों को प्रकाशमान करते हुए भ्रमण करते हैं । (१७) इन्हें ही प्रकाशात्मा अंधकार का नाश करनेवाले और वेदों में महान् तत्व कहते हैं ।
७२२ सूर्य-सिद्धान्त इनका मंडल ऋग्वेद, करण सामवेद और मूर्ति यजुर्वेद हैं। (१८) इसलिए इनको वेदत्रयात्मक कहते हैं। इनसे काल की गणना होती है इसलिए इनको कालात्मा और कालकृत कहते हैं । यह सब की आत्मा, सर्वव्यापक, सूक्ष्म हैं और सब सृष्टि इनमें स्थित है । (१६) संसार रूपी रथ में संवत्सर रूपी चक्र बनाकर सात छंदों के सात घोड़ों से युक्त होकर यह सर्वदा भ्रमण करते हैं । (२०) इनके तीन चरण अमृत होने से अगम्य हैं और यह एक चरण प्रकट हुआ है । इसी प्रभु ने जगत् की सृष्टि के लिए अहङ्काररूपी ब्रह्मा को बनाया । (२१) इसके बाद सब लोकों के पितामह ब्रह्मा को श्रेष्ठ वेदों को देकर और इन्हें अंडे के बीच में स्थापित करके अनिरुद्ध भगवान् स्वयम् लोकों को प्रकाशित करते हुए भ्रमण करते हैं । (२२) इसके पश्चात् अहङ्कार मूर्तिधारी ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना करने का विचार किया । ब्रह्मा के मन से चंद्रमा और नेत्रों से तेजपुञ्ज सूर्य उत्पन्न हुए । (२३) मन से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी पांच महाभूत क्रम से एक एक गुण की वृद्धि से उत्पन्न हुए । विज्ञान भाष्य—सूर्यांश पुरुष ने मयासुर से उपर्युक्त सृष्टिक्रम का जो वर्णन किया है वह वेदान्त, सांख्य, श्रीमद्भागवत् आदि में बतलाये गये सृष्टि-क्रम का मिश्रण है । यह क्रम भिन्न भिन्न ग्रंथों में भिन्न-भिन्न रीति से बतलाया गया है इसलिए यह संभव नहीं कि उन सबकी व्याख्या यहाँ की जाय । इस विषय पर लोकमान्य तिलक ने अपने गीता-रहस्य के ६-६ प्रकरणों में अच्छी तरह विचार किया है और कहीं-कहीं यूरोपीय विद्वानों के मतों की भी तुलना की है इसलिए इसकी जानकारी के लिए पाठकों को उसीका अध्ययन करना चाहिए । यहाँ उसीका सार दिया जा सकता है । सांख्यशास्त्र के अनुसार ब्रह्मांड का वंश-वृक्ष ७२३ पृष्ठ पर दिया जाता है । देखो गी० र० (पृ० १७६) :- वेदान्त का परब्रह्म इन २५ तत्वों से परे है जिसकी चर्चा सूर्य-सिद्धान्त के १२वें श्लोक में है (देखो गीता रहस्य पृ० २०३) । सूर्य-सिद्धान्त में संकर्षण, और अनिरुद्ध की जो चर्चा है उसकी चर्चा भागवतधर्म में इस प्रकार आयी है 'वासुदेव रूपी परमेश्वर से संकर्षण रूपी जीव उत्पन्न हुआ; और फिर संकर्षण से प्रद्युम्न अर्थात् मन तथा प्रद्युम्न से अनिरुद्ध अर्थात् अहङ्कार हुआ; कुछ लोग तो इन चार व्यूहों में से दो, तीन या एक ही को मानते हैं (देखो गीता रहस्य पृ० ४२६) । सूर्य- सिद्धान्त में प्रद्युम्न की चर्चा नहीं है। यहां अहङ्कार को ही ब्रह्मा बतलाया है । *पृष्ठों की संख्या सं० १६७३ के छपे हुए हिन्दी गीता-रहस्य के अनुसार है ।
भूगोलाध्याय ७२३ आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ही पंचमहाभूत कहते हैं । आकाश में एक गुण शब्द, वायु में दो गुण शब्द, स्पर्श, अग्नि में तीन गुण शब्द, स्पर्श और रूप; जल में चार गुण शब्द, स्पर्श, रूप और रस तथा पृथ्वी में पांच गुण शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध माने गये हैं इसीलिए २३वें श्लोक के उत्तरार्ध में बतलाया गया है कि एक एक गुण की वृद्धि से पंचमहाभूतों की उत्पत्ति क्रम से हुई है । ब्रह्मांड का वंशवृक्ष पुरुष ➔ (दोनों स्वयंभू और अनादि) 🡨—प्रकृति (अव्यक्त और सूक्ष्म) महान् अथवा बुद्धि (व्यक्त और सूक्ष्म) अहंकार (व्यक्त और सूक्ष्म) (सात्त्विक सृष्टि अर्थात् व्यक्त और सूक्ष्म इन्द्रियां) (तामस अर्थात् निर्निद्रिय सृष्टि) पञ्चतन्मात्राएँ (सूक्ष्म) पांच बुद्धीन्द्रियां पांच कर्मेन्द्रियां मन पञ्च महाभूत (स्थूल) पांच ग्रहों की उत्पत्ति— अग्नीषोमो भानुचन्द्रो ततस्त्वङ्गारकादयः । तेजो भूरवाम्बुवातेभ्यः क्रमशः पञ्च जज्ञिरे ॥२४॥ अनुवाद—अग्नि स्वरूप सूर्य और सोम स्वरूप चन्द्रमा की उत्पत्ति के बाद तेज अर्थात् अग्नि से मंगल, पृथ्वी से बुध, आकाश से बृहस्पति शुक्र और वायु से शनि उत्पन्न हुए । १२ राशियों और २७ नक्षत्रों की उत्पत्ति— पुनर्द्वादशधाऽऽत्मानं विभजे राशिसंज्ञितम् । नक्षत्ररूपिणं भूयः सप्तविंशात्मकं वशी ॥२५॥
७२४ सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—फिर जितात्मा ब्रह्मा ने मनः कल्पितवृत्त को पहले १२ राशियों में फिर २७ नक्षत्रों में बाँटा । चराचर जगत् की उत्पत्ति— ततश्चराचरं विश्वं निर्ममे देवपूर्वकम् । ऊर्ध्वमध्याधरेभ्योऽथ गात्रेभ्यः प्रकृतिं सृजन् ॥२६॥ गुणकर्मविभागेन सृष्ट्वा प्राग्वदनुक्रमात् । विभागं कल्पयामास यथास्वं वेददर्शनात् ॥२७॥ ग्रहर्क्षताराणां भूमेः विश्वस्य वा विभुः । देवानां च मनुष्याणां सिद्धानां च यथाक्रमम् ॥२८॥ ब्रह्माण्डमेतत् सुषिरं यत्रेवं भूर्भुवादिकम् । कटाहद्वितयस्यैव संपुटं गोलकाकृतिः ॥२६॥ अनुवाद—(२६) इसके पश्चात् श्रेष्ठ, मध्यम और अधम स्रोतों से सत्व, रज और तम विभेदात्मक प्रकृति का निर्माण करके देवता, मनुष्य, राक्षस आदि चराचर विश्व की रचना की । (२७) गुण और कर्म के अनुसार पूर्वोक्त क्रम से सृष्टि रचकर वेदों में बतलायी हुई रीति के अनुसार देश काल के अनुसार इसके विभाग किये । (२८) समर्थवान् ब्रह्मा ने ग्रहों, नक्षत्रों, तारों, पृथ्वी, संसार, देवताओं, मनुष्यों और सिद्धों का यथाक्रम स्थापन किया, (२६) दो समान कड़ाहों के मुंह मिला देने से जैसा खोखला गोला बनता है उसी प्रकार के इस ब्रह्माण्ड अवकाश में भूर्भुवः आदि लोक स्थित हैं । ब्रह्माण्ड में ग्रहों की कक्षाओं का क्रम— ब्रह्माण्डमध्यपरिधि व्योमकक्ष्याऽभिधीयते । तन्मध्ये भ्रमणं भानां तदधोऽधः क्रमादथ ॥३०॥ मन्दामरेज्यभूपुत्रसूर्यशुकेन्दुजेन्दवः । परिभ्रमन्त्यधोऽधस्तात्सिद्धाविद्याधरा घनाः ॥३१॥ मध्ये समन्तादण्डस्य भूगोलो व्योम्नि तिष्ठति । बिभ्राणः परमां शक्तिं ब्रह्मणो धारणात्मिकाम् ॥३२॥ अनुवाद—(३०) ब्रह्माण्ड की परिधि को आकाश कक्षा कहते हैं जिसके भीतर नक्षत्र भ्रमण करते हैं; फिर उसके नीचे क्रमानुसार (३१) शनि, वृहस्पति, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध और चन्द्रमा भ्रमण करते हैं । इसके नीचे सिद्ध, विद्याधर
भूगोलाध्याय ७२५ और मेघ हैं। (३२) इस ब्रह्माण्ड के बिल्कुल बीच में यह भूगोल ब्रह्मा की धारणा- त्मिका परम शक्ति के बल पर शून्य में ठहरा हुआ है। विज्ञान-भाष्य—इन तीनों श्लोकों में यह बतलाया गया है कि ब्रह्माण्ड की परम परिधि के भीतर नक्षत्रों और ग्रहों की कक्षाएँ किस क्रम से हैं। हमारी पृथ्वी का स्थान इन ब्रह्माण्ड के बिल्कुल मध्य में माना गया है अर्थात् यह भूगोल सारे ब्रह्माण्ड के केन्द्र में हैं। यह बात अर्वाचीन ज्योतिष-सिद्धान्त के प्रतिकूल है। अर्वाचीन ज्योतिष में सूर्य जगत् का केन्द्र समझा जाता है। सूर्य के सबसे निकट बुध ग्रह की कक्षा है, फिर शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति और शनि की कक्षाएँ क्रमानुसार आकाश नक्षत्र शनि गुरु मंगल रवि शुक्र बुध चन्द्र भू चित्र १२१ भारतीय ज्योतिष के अनुसार कक्षाओं का क्रम (पृथ्वी केन्द्र में) दूर होती गयी हैं। चन्द्रमा की कक्षा पृथ्वी के चारों ओर है। नक्षत्रों की कक्षा
७२६ सूर्य-सिद्धान्त अर्वाचीन ज्योतिष के अनुसार स्थिर नहीं की जा सकती क्योंकि सब तारे समान दूरी पर नहीं हैं। आकाश कक्षा की सीमा भी स्थिर नहीं की जा सकती क्योंकि आजकल कुछ तारों की दूरी इतनी अधिक समझी जाती है कि आकाश कक्षा की सीमा उसके सामने नगण्य है। चित्र १२१ तथा १२२ से हिन्दू ज्योतिष और अर्वाचीन ज्योतिष के मतों की भिन्नता अच्छी तरह समझ में आ जायगी । पृथ्वी और चन्द्रकक्षा के बीच में मेघों, विद्याधरों और सिद्धों के लोक हैं जो इस चित्र में नहीं दिखलाये जा सके ।
ने यु श गु मं भू शु बु सू
चित्र १२२ अर्वाचीन ज्योतिष के अनुसार ग्रह की कक्षाओं का क्रम (यहाँ सूर्य केन्द्र में है)