भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 711

: ६८६ सूर्य-सिद्धान्त : उदय तो पूर्व क्षितिज में होता ही है इसलिए यह केवल यह जानने की आवश्यकता है : कि सूर्यास्तकाल में पूर्व क्षितिज में कौन राशि लग्न है और इसके उपरान्त चन्द्रमा कितने : समय में लग्न होगा । इस क्रिया से जो समय आवेगा उस समय चन्द्रमा का उदय : नहीं होगा क्योंकि इतने समय में चन्द्रमा अपनी गति से और पूर्व हो जायगा । इससे : कितना अन्तर पड़ जायगा यह जानने के लिए तीसरे श्लोक में बतलाये गये नियम से : असकृत्कर्म करना होगा । यहाँ भी केवल चन्द्रमा की गति से ही असकृत्कर्म करना : चाहिए । : सूर्यास्त काल में सूर्य से चन्द्रमा का रेखात्मक अन्तर जानने की रीति : अर्केन्द्वोः क्रान्तिविश्लेषः दिक्साध्ये युतिरन्यथा । : तज्ज्येन्दुरर्काद्यत्रासौ विज्ञेया दक्षिणोत्तरा ॥६॥ : मध्याह्नेन्दुप्रभाकर्ण संगुणा यदि सोत्तरा । : तदार्कघ्नाक्षजीवायाश्शोध्या योज्या तु दक्षिणे ॥७॥ : शेषो लम्बज्यया भक्तो लब्धं बाहुस्स्वदिङ्मुखः । : कोटिशङ्कुस्तयोर्वर्गयुतेर्मूलं श्रवो भवेत् ॥८॥ : अनुवाद—(६) सूर्यास्तकालिक सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति जानकर यदि : इनकी दिशाएँ एक हैं तो इनकी ज्याओं का अन्तर करे और भिन्न हों तो योग करे । : सूर्य से चन्द्रमा जिस दिशा में हो वही दिशा इस अंतर या योग को भी समझे अर्थात् : यदि चन्द्रमा सूर्य से दक्षिण हो तो अन्तर या योग की दिशा दक्षिण समझे और उत्तर : हो तो उत्तर समझे । (७) इस योग या अन्तर को चन्द्रमा के तात्कालिक छाया कर्ण : से गुणा कर दे । यदि दिशा उत्तर हो तो इस गुणनफल को १२ और अक्षज्या के : गुणनफल में घटा दे और दक्षिण हो तो जोड़ दे । (८) इस शेष या योगफल को : लम्बज्या से भाग दे दे और लब्धि को इष्ट दिशा का भुज समझे । चन्द्रमा के शंकु : अर्थात् नतांश-कोटिज्या को कोटि मानकर भुज और कोटि के वर्गों के योगफल का : वर्गमूल निकालने से जो आवे उसे कर्ण समझना चाहिए । यही कर्ण सूर्य और चन्द्रमा : का सूत्रात्मक या रेखात्मक अंतर है । : विज्ञान-भाष्य—इन तीन श्लोकों का सार यह है :— : यदि सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तिज्याओं का अन्तर प मान लिया जाय तो : छठें श्लोक के अनुसार : प = चन्द्र कान्तिज्या ± सूर्य क्रान्तिज्या,