सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशृङ्गोन्नत्यधिकार ६८६ श = सूर्यास्तकाल का चन्द्रमा का स्थान जब कि यह यामोत्तरवृत्त से पच्छिम होता है । शक = चन्द्रमा से क्षितिज तल पर लम्ब या चंद्र-शंकु या कोटि । शरि वा शरी = सूर्य से चन्द्रमा का रेखात्मक अंतर या कर्ण । करि या करी = भुज; पट और चाठ सूर्य के अहोरात्र वृत्त पर लम्ब हैं । इस चित्र में यामोत्तर-वृत्त के तल खदप पर क्षितिज के ऊपर के खगोल का वह अंश दिखलाया गया है जो पच्छिम क्षितिज के सूर्यास्त विन्दु से लेकर दक्षिण विन्दु तक फैला हुआ है । इसीलिए चन्द्रमा का स्थान श यामोत्तर वृत्त से पच्छिम होते हुए भी यामोत्तर वृत्त पर ही जान पड़ता है और चन्द्रमा के शंकु, भुज, कर्ण यामोत्तर-वृत्त के तल पर देख पड़ते हैं । सूर्य और चन्द्रमा के अहोरात्रवृत्त तथा विषुवद्वृत्त का चतुर्थांश भी यामोत्तरवृत्त के ही तल पर दिखलाये गये हैं । संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि पद क्षितिज के दक्षिणार्ध और यामोत्तरवृत्त की छेद रेखा (Projection) है र रि और च चा इष्ट काल के सूर्य और चन्द्रमा के अहो- रात्रवृत्त हैं । रा री भी सूर्य का अहोरात्रवृत्त है जब क्रान्ति दक्षिण होती है । इस- लिए विर सूर्य की उत्तर क्रान्ति, विच चन्द्रमा की दक्षिण क्रान्ति और वि रा सूर्य की दक्षिण क्रान्ति है । खवि इष्ट स्थान का अक्षांश और विद लम्बांश है । अहोरात्र वृत्तों और क्षितिज के बीच के कोण भी लम्बांश के समान हैं । चित्र से प्रकट है कि चन्द्रकर्ण शरि² = शक² + करि² इसमें शक इष्टकालिक चन्द्रमा का शंकु है जिसकी गणना चन्द्रमा के नतकाल से त्रिप्रश्नाधिकार के पृष्ठ २६० के सूत्र (क) अथवा पृष्ठ २६२ के सूत्र (ग) के अनुसार सहज ही जाना जा सकता है और करि चंद्रमा का भुज है जिसको जानने की रीति ऊपर के ढाई श्लोकों में बतलायी गयी है । करि = रिचा + चाक, जिसमें रिचा सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तियों के अन्तर पर आश्रित है और चाक चन्द्रमा के उन्नतांश पर । समकोण त्रिभुज चाठरि में भारतीय रीति के अनुसार, चाठ / ज्या चारिठ = चारि / त्रिज्या ∵ चारि = चाठ × त्रिज्या / ज्या चारिठ परन्तु चाठ = चाड + ड ठ = चन्द्रक्रान्तिज्या + सूर्यक्रान्ति ज्या और ज्या चारिठ = लम्बज्या