सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३८ सूर्य-सिद्धान्त तो २२५ कला की ज्या भी २२५ कला ही समझी गयी है (देखो स्पष्टाधिकार श्लोक १५) । इसी प्रकार किसी गोल पिंड के पृष्ठ का अत्यन्त छोटा भाग वक्र होने पर चित्र १२५ भी सम देख पड़ता है। यह गणना की जा सकती है कि समतल भूमि या किसी बड़ी झील के तल पर खड़ा होकर चारों ओर देखने से मनुष्य को ३ या ४ मील से अधिक दूर तक का धरातल नहीं देख पड़ता । मान लो ख भूतल पर एक स्थान है, कख मनुष्य की ऊँचाई हैं, घ भूगोल का केन्द्र है और कग सीधी रेखा है जो भूतल को ग बिन्दु पर स्पर्श करती है । रेखागणित से यह सिद्ध है कि कग² = कख × कच = कख (कख + खच) मान लो कख = उ, खघ = घच = त, कग = क्ष तब क्ष² = उ × (उ + २ त) = उ² + २ उ × त