भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 762

भूगोलाध्याय ७३७ ऊपर समझते हैं। इसी बात का प्रमाण आगे के दो श्लोकों में उदाहरण के साथ बतलाया गया है । अयन के अन्त में देवताओं और असुरों का मध्याह्न और मध्यरात्रि परस्पर विपरीत होने का कारण स्पष्ट ही है। क्योंकि जिस समय सूर्य सायन कर्क राशि में प्रवेश करता है उस समय यह उत्तर ध्रुव निवासियों को सबसे ऊँचा देख पड़ता है और दक्षिण ध्रुव निवासियों के लिए सबसे नीचे होकर अदृश्य रहता है इसलिए इस समय देवताओं का मध्याह्न और असुरों की मध्यरात्रि होती है। इसी प्रकार जिस समय सूर्य सायन मकर राशि में प्रवेश करता है उस समय असुरों का मध्याह्न और देवताओं की मध्यरात्रि होती है। ऊपर नीचे की बात भी समझना कठिन नहीं है क्योंकि सब लोग उस दिशा को ऊपर मानते हैं जो आकाश के मध्य में होता है और इसकी विपरीत दिशा को नीचे समझते हैं। पृथ्वी गोल है और इसके चारों ओर आकाश है इसलिए सब जगह के रहने वाले अपने को ऊपर और अपने भूव्यास के दूसरे सिरे पर रहने वाले को नीचे समझते हैं। चित्र १२५ में गोल रेखा भूपृष्ठ है। उत्तर ध्रुव के रहने वालों को वह दिशा ऊपर है जिसमें क अक्षर दिखलाया गया है और इसकी विपरीत दिशा वह है जिधर भू-मध्य है। परन्तु इस दिशा की सीध में भूगोल की दूसरी ओर दक्षिण ध्रुव है इस- लिए दक्षिण ध्रुव उत्तर ध्रुव से नीचे देख पड़ता है। परन्तु दक्षिण ध्रुव वालों के लिए वह दिशा ऊपर है जिसमें ख अक्षर दिखलाया गया है और भूमध्य की दिशा अथवा उत्तर ध्रुव नीचे है। यह बात चित्र को उलट कर पढ़ने से सहज ही समझ में आ सकती है। इसी प्रकार च स्थान के लिए ग की दिशा ऊपर और छ या घ की दिशा नीचे है परन्तु छ स्थान के लिए घ की दिशा ऊपर और च या ग की दिशा नीचे है। पृथ्वी चपटी देख पड़ने का कारण— अल्पकायतया लोकाः स्वस्थानात्सर्वतो दिशम् । पश्यन्ति वृत्तामप्येतां चक्राकारां वसुन्धराम् ॥५४॥ अनुवाद—मनुष्य पृथ्वी की अपेक्षा बहुत छोटे होने के कारण अपने स्थान से गोल पृथ्वी को सब दिशाओं में चक्राकार देखते हैं। विज्ञान-भाष्य—किसी वृत्त के बहुत छोटे खण्ड के धनु और उसकी ज्या में इतना कम अन्तर होता है कि दोनों समान समझे जाते हैं अर्थात् धनु वक्र होने पर भी ज्या के समान होता है और धनु की वक्रता नहीं के समान होती है। इसीलिए