सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 765, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ें७४० सूर्य-सिद्धान्त फ ३ फ क्ष२ = २ X ────────── X ३६ = ६० ───────── ३ X १७६० २ या क्ष = √फ X १.५ यहां क्ष का मान मीलों में और फ का फुट में समझना चाहिए। इसलिए यह सिद्ध हुआ कि मनुष्य भूतल से जितने फुट ऊपर हो उसका डेवढ़ा करके वर्गमूल लेने से जो आवे उतने ही मील दूर तक की क्षितिज वह देख सकेगा। यदि मनुष्य की ऊँचाई ६ फुट हो तो उसकी क्षितिज ३ मील दूर होगी और ऊँचाई २४ फुट हो तो वह ६ मील दूर तक की क्षितिज चारों ओर देख सकेगा। चित्र से प्रकट है कि यदि क ख ६ फुट हो तो क ग ३ मील होगा और जो क ग होगा वही खग को भी समझना चाहिए। परन्तु भूतल की परिधि स्थूलरूप से २५००० मील है और ६ फुट ऊँचे मनुष्य की क्षितिज का व्यास ६ मील है जो २५००० मील के चार हजारवें भाग से भी कम है इसलिए उसे यदि गोलाकार पृथ्वी चक्राकार देख पड़ती है तो इसमें क्या आश्चर्य है ? भूतल पर दिन रात के घटने बढ़ने का कारण— सव्यं भ्रमति देवानांमपसव्यं सुरद्विषाम् । उपरिष्टाद्भूगोलोऽयं व्यक्षे पश्चान्मुखं सदा ॥५५॥ अतस्तत्र दिनं त्रिंशन्नाडिकं शर्वरी तथा । हानिवृद्धी सदा बामं सुरासुर विभागयोः ॥५६॥ मेषादौ प्रत्यहं वृद्धिः उदगुत्तरतोऽधिका । देवभागे क्षपाहानिः विपरीतं तथाऽऽसुरे ॥५७॥ तुलादौ तु निशोर्ध्वानं क्षयवृद्धी तयोरुभे । देशक्रान्तिवशान्नित्यं तद्विज्ञानं पुरोदितम् ॥५८॥ अनुवाद— (५५) यह नक्षत्र-चक्र देवताओं के सव्य दिशा में अर्थात् बांयें से दाहिने और असुरों के अपसव्य दिशा में अर्थात् दाहिने से बायें तथा निरक्ष देश वालों के सिर के ऊपर पश्चिम दिशा में सदा भ्रमण करता है। (५६) इसलिए यहां निरक्ष देश में ३० घड़ी का दिन और ३० घड़ी की रात होती है परन्तु देवताओं और असुरों के विभागों में अर्थात् विषुवत् रेखा से उत्तर और दक्षिण के देशों में दिन रात की क्षय वृद्धि परस्पर विपरीत होती है। (५७) मेष राशि में प्रवेश करने के पश्चात् सूर्य जैसे उत्तर की ओर बढ़ता है विषुवत् रेखा से उत्तर के देशों में दिन-मान की वैसे ही वृद्धि और रात्रि की हानि होती है परन्तु विषुवत् रेखा से दक्षिण के देशों में