भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 766, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 766

भूगोलाध्याय ७४१ इसका उलटा होता है अर्थात् वहाँ दिन का क्षय और रात्रि की वृद्धि होती है। (५८) तुलाराशि में प्रवेश करने के पश्चात् सूर्य जैसे-जैसे दक्षिण की ओर बढ़ता है वैसे ही वैसे उत्तर भाग में दिन की हानि और रात्रि की वृद्धि तथा दक्षिण भाग में दिन की वृद्धि और रात्रि की हानि होती है। दिन रात्रि की क्षय वृद्धि स्थान के अक्षांश और सूर्य की क्रान्ति पर निर्भर है जिसका विचार पहले ही किया गया है । विज्ञान-भाष्य—५५ वें श्लोक में यह बतलाया गया है कि उत्तर ध्रुव निवासियों को नक्षत्र-चक्र सव्य दिशा में भ्रमण करता हुआ देख पड़ता है और दक्षिण ध्रुव निवासियों को अपसव्य दिशा में। सव्य और अपसव्य शब्दों की व्याख्या विज्ञान भाष्य पृष्ठ १२६ में की गयी है। विषुवत् रेखा के निकट देशों में नक्षत्र चक्र सिर के ऊपर पूरब से पच्छिम को भ्रमण करता हुआ देख पड़ता है। विषुवत् रेखा पर दिन का परिमाण ३० घड़ी का और रात्रि का परिमाण भी ३० घड़ी का सदा होता है। इससे उत्तर और दक्षिण के देशों में दिन या रात्रि का परिमाण ३० घड़ी का केवल विषुव दिन को ही होता है जब सूर्य की क्रान्ति शून्य होती है। अन्य कालों में जब सूर्य की क्रान्ति उत्तर होती है तब उत्तर के देशों में दिन ३० घड़ी से बड़ा और रात ३० घड़ी से उतनी ही छोटी होती है परन्तु दक्षिण के देशों में दिन ३० घड़ी से छोटा और रात उतनी ही बड़ी होती है और जब सूर्य की क्रान्ति दक्षिण होती है तब दक्षिण के देशों में दिन बड़ा, रात छोटी तथा उत्तर के देशों में रात बड़ी, दिन छोटा होता है। दिन या रात की क्षयवृद्धि का विचार सूर्य की क्रान्ति और स्थान के अक्षांश के अनुसार किया जाता है जैसा कि स्पष्टाधिकार के ६०-६१ श्लोकों और उनके विज्ञान भाष्य में बतलाया गया है । नक्षत्र-चक्र के इस भ्रमण का कारण प्राचीनों के मत से प्रवह वायु और नवीन मत से पृथ्वी की दैनिक गति है जिसका विचार आगे के ७४वें श्लोक के विज्ञान भाष्य में किया जायगा। इन श्लोकों में मेष और तुला का अर्थ सायन मेष और सायन तुला समझना चाहिए क्योंकि दिन रात की क्षयवृद्धि सायन राशियों के ही अनुसार होती है। विषुवतरेखा से कितने योजन उत्तर या दक्षिण सूर्य ठीक ऊपर होता है। भूवृत्तं क्रान्तिभागघ्नं भगणांशविभाजितम् । अवाप्तयोजनैरर्को व्यक्षाच्चेदुपरिस्थितः ॥५६॥ अनुवाद - भूपरिधि के योजनों को सूर्य की तात्कालिक क्रान्ति के अंशों से गुणा करके ३६० से भाग देने पर जो लब्धि आवे उतने ही योजन विषुवत रेखा से दूर सूर्य ऊपर होता है ।

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक) · पृष्ठ 766, कुल 838 में से · BharatKosha