सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 779, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ें७५४ सूर्य-सिद्धान्त है धुरी के पास वाले बिन्दु से अधिक चलता है और पहिये के किनारे पर जो बिन्दु है उसमें उन सब बिन्दुओं से अधिक वेग रहता है जो बीच में होते हैं। यदि पृथ्वी ऐसे अक्ष पर घूमती हुई मानी जाय जिसका एक सिरा उत्तरी ध्रुव पर और दूसरा दक्षिणी ध्रुव पर हो तो यह स्पष्ट है कि किसी ऊँचे पेड़, मकान या मीनार की चोटी उसके आधार की अपेक्षा पृथ्वी के अक्ष से अधिक दूरी पर है इसलिये चोटी की गति उसके आधार की गति से अधिक होगी। इसलिए यदि कोई वस्तु किसी ऊँचे मीनार की चोटी से गिरायी जाय तो वह अधिक वेग के कारण ठीक नीचे न गिर कर कुछ पूरब की ओर बढ़कर गिरेगी क्योंकि उसके ठीक नीचे वाले विन्दु चित्र नं० १२६ की चाल उससे मन्द है। मान लो स एक मीनार की चोटी है जहाँ से वस्तु नीचे गिरायी जाती है और प मीनार का मूल है जो स के ठीक नीचे है इसलिये लम्ब रेखा स प बढ़ाने पर पृथ्वी के केन्द्र क पर पहुँचेगी। यदि मान लिया जाय कि जितनी देर में वस्तु पृथ्वी तल पर पहुँचती है मीनार की चोटी स से सा तक घूम गयी तो मीनार का मूल प से पा तक पहुँचेगा क्योंकि चोटी और मूल को मिलाने बाली रेखा पृथ्वी के केन्द्र को सदैव जायगी। यह स्पष्ट है कि प पा, स सा से कम है। यह भी स्पष्ट है कि प की भ्रमण गति स की भ्रमण गति से कम है। परन्तु जो वस्तु स बिन्दु से गिरायी जायगी उसकी गति स की गति के समान होगी इस- लिये वह गिरते हुए भी अपनी ऊपर वाली गति को धारण किये रहेगी इसलिये