सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 780, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूगोलाध्याय ७५५
वह पा पर न गिर कर पि पर गिरेगी जहां प पि, स सा के समान है अर्थात् वह वस्तु लम्ब रेखा से कुछ पूरब की ओर बढ़कर गिरेगी । इसलिये यदि परीक्षा करके यह सिद्ध किया जाय के कि ऊपर से गिरी हुई वस्तु पृथ्वी पर पहुँचते-पहुँचते यथार्थ में कुछ पूरब की ओर बढ़ जाती है तब यह कल्पना भी ठीक मानी जा सकती है कि पृथ्वी पूरब की ओर भ्रमण करती है । परन्तु यह परीक्षा कठिन है क्योंकि इतना ऊँचा स्थान नहीं बनाया जा सकता कि उसकी चोटी और मूल की भ्रमण गतियों में इतना अन्तर हो कि वह साफ साफ देख पड़े क्योंकि पृथ्वी की त्रिज्या ४००० मील के लगभग है और मीनार की चोटी १००० फुट भी नहीं हो सकती । बोलोन और हेमबर्ग में इस सम्बन्ध में जितनी परीक्षाएँ की गयीं उनसे सिद्ध हुआ कि २५० फुट की ऊँचाई से गिरी हुई वस्तु लम्ब रेखा से तिहाई इंच पूरब बढ़ जाती है । गणना करके यह देखा जा सकता है कि जितनी देर में कोई वस्तु २५० फुट नीचे गिरती है उतनी देर में चोटी और मूल की अथवा स और प बिन्दुओं की गतियों का अन्तर भी उतना ही होता है । इसलिये इससे सिद्ध होता है कि पृथ्वी में भ्रमण गति है । इस प्रयोग की पूरी गणना यहाँ नहीं दी जा सकती क्योंकि बिना उच्च गणित की जानकारी के वह समझ में आ नहीं सकता । इसलिये यहाँ केवल सारमात्र दिया गया है । इस प्रयोग की कल्पना पहले पहले न्यूटन ने की थी । पृष्ठ ७५४ पर जो चित्र दिया गया है वह विषुवत् रेखा पर स्थित देशों के लिये उपयुक्त है । अन्य स्थानों के लिये इसकी गणना में कुछ परिवर्तन करना पड़ता है क्योंकि विषुवत् रेखा से अन्य स्थानों में गिरनेवाली वस्तु में दो गतियाँ हो जाती हैं जिनकी दिशाएँ भिन्न होती हैं । एक गति तो पृथ्वी के दैनिक भ्रमण की होती है जो गिरने वाली वस्तु को मीनार की चोटी से प्राप्त होती है और पृथ्वी के अक्ष के समकोण तल पर होती है और दूसरी गति पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण होती है जिससे वस्तु पृथ्वी के केन्द्र की ओर गिरती है । इसलिये वस्तु लम्ब दिशा से पूरब की ओर तो बढ़ जाती है, साथ ही साथ कुछ दक्षिण या उत्तर भी हो जाती है । गिरते समय वस्तु पर हवा की रगड़ का भी कुछ प्रभाव पड़ता है परन्तु इन सब बातों के होते हुए भी मूल सिद्धान्त में कोई अन्तर नहीं होता । यह प्रयोग कोयले की गहरी खानों में भी किया जाता है क्योंकि यहाँ गिरने के लिये गहराई अधिक मिल सकती है । ५०० फुट की ऊँचाई से गिरायी हुई वस्तु लम्ब दिशा से १ इञ्च के लगभग पूरब बढ़ जाती है । यह कई प्रयोगों का मध्यमान है, गणना से भी यही बात सिद्ध होती है ।