सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
भूगोलाध्याय ७५५
वह पा पर न गिर कर पि पर गिरेगी जहां प पि, स सा के समान है अर्थात् वह वस्तु लम्ब रेखा से कुछ पूरब की ओर बढ़कर गिरेगी । इसलिये यदि परीक्षा करके यह सिद्ध किया जाय के कि ऊपर से गिरी हुई वस्तु पृथ्वी पर पहुँचते-पहुँचते यथार्थ में कुछ पूरब की ओर बढ़ जाती है तब यह कल्पना भी ठीक मानी जा सकती है कि पृथ्वी पूरब की ओर भ्रमण करती है । परन्तु यह परीक्षा कठिन है क्योंकि इतना ऊँचा स्थान नहीं बनाया जा सकता कि उसकी चोटी और मूल की भ्रमण गतियों में इतना अन्तर हो कि वह साफ साफ देख पड़े क्योंकि पृथ्वी की त्रिज्या ४००० मील के लगभग है और मीनार की चोटी १००० फुट भी नहीं हो सकती । बोलोन और हेमबर्ग में इस सम्बन्ध में जितनी परीक्षाएँ की गयीं उनसे सिद्ध हुआ कि २५० फुट की ऊँचाई से गिरी हुई वस्तु लम्ब रेखा से तिहाई इंच पूरब बढ़ जाती है । गणना करके यह देखा जा सकता है कि जितनी देर में कोई वस्तु २५० फुट नीचे गिरती है उतनी देर में चोटी और मूल की अथवा स और प बिन्दुओं की गतियों का अन्तर भी उतना ही होता है । इसलिये इससे सिद्ध होता है कि पृथ्वी में भ्रमण गति है । इस प्रयोग की पूरी गणना यहाँ नहीं दी जा सकती क्योंकि बिना उच्च गणित की जानकारी के वह समझ में आ नहीं सकता । इसलिये यहाँ केवल सारमात्र दिया गया है । इस प्रयोग की कल्पना पहले पहले न्यूटन ने की थी । पृष्ठ ७५४ पर जो चित्र दिया गया है वह विषुवत् रेखा पर स्थित देशों के लिये उपयुक्त है । अन्य स्थानों के लिये इसकी गणना में कुछ परिवर्तन करना पड़ता है क्योंकि विषुवत् रेखा से अन्य स्थानों में गिरनेवाली वस्तु में दो गतियाँ हो जाती हैं जिनकी दिशाएँ भिन्न होती हैं । एक गति तो पृथ्वी के दैनिक भ्रमण की होती है जो गिरने वाली वस्तु को मीनार की चोटी से प्राप्त होती है और पृथ्वी के अक्ष के समकोण तल पर होती है और दूसरी गति पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण होती है जिससे वस्तु पृथ्वी के केन्द्र की ओर गिरती है । इसलिये वस्तु लम्ब दिशा से पूरब की ओर तो बढ़ जाती है, साथ ही साथ कुछ दक्षिण या उत्तर भी हो जाती है । गिरते समय वस्तु पर हवा की रगड़ का भी कुछ प्रभाव पड़ता है परन्तु इन सब बातों के होते हुए भी मूल सिद्धान्त में कोई अन्तर नहीं होता । यह प्रयोग कोयले की गहरी खानों में भी किया जाता है क्योंकि यहाँ गिरने के लिये गहराई अधिक मिल सकती है । ५०० फुट की ऊँचाई से गिरायी हुई वस्तु लम्ब दिशा से १ इञ्च के लगभग पूरब बढ़ जाती है । यह कई प्रयोगों का मध्यमान है, गणना से भी यही बात सिद्ध होती है ।
७५६ सूर्य-सिद्धान्त (२) परन्तु इससे भी सहज और स्पष्ट प्रयोग फूको (Foucault) का लोलक- प्रयोग (Pendulum experiment) है । गणित शास्त्र से यह सिद्ध है कि यदि कोई लोलक केवल गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के स्पन्दन करे या झूले तो इसका स्पन्दन तल (झूलने की दिशा) वही बना रहेगा और इस तल की दिशा पर लोलक के आधार की गति का प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि ऐसी दूसरी कोई शक्ति नहीं है जो इसे इस तल से विचलित कर सके । यह सहज ही देखा जा सकता है कि यदि एक भारी लोलक एक पतले तार से लटका कर घड़ियों के लोलक की तरह झुलाया जाय और यदि वह आधार जिसमें लोलक लटकाया जाता है घुमाया जाय तो इसके घूमने से लोलक के स्पन्दन-तल में कोई अन्तर नहीं पड़ता क्योंकि जिस तार या डोरे में लोलक बंधा रहता है उसका जरा सा ऐंठ जाना अधिक सहज है न कि भारी लोलक का ही अपने स्पन्दन तल को बदलना जब कि वह पहले ही से एक तल में झूल रहा है । इसलिये यह सिद्ध है कि यदि पृथ्वी अचल हो तो लोलक के स्पन्दन की दिशा भी आसपास की वस्तुओं तथा आधार के विचार से अचल रहेगी और यदि इसमें भ्रमणगति होगी तो लोलक के स्पन्दन तल की अपेक्षा भूतल की दिशाओं में परिवर्तन हो जायगा और लोलक का स्पन्दन तल ही बदलता हुआ देख पड़ेगा । इसलिये इस लोलक-प्रयोग से पृथ्वी की भ्रमण गति का ही पता नहीं लगेगा वरन् इसकी दिशा का भी पता लगेगा । फूको ने यह प्रयोग सन् १८५१ ई० या १६०८ वि० में पेरिस में किया था । उसने अपने लोलक को पैन्थियन नामक विशाल भवन के गुम्बज से लटकाया । इसका तार २०० फुट लम्बा था और गोले की तोल १ मन के लगभग (८० पौंड) थी । जिस समय लोलक झूलता था गोले के नीचे निकली हुई सुई अपने झूलने का चिह्न बालू तल पर बनाती जाती थी और यह देख पड़ता था कि बालू का तल अपसव्य दिशा में अर्थात् दहिने से बायें पच्छिम से पूरब घूमता जाता था । इस प्रयोग में दो बातों की बड़ी सावधानी रखनी पड़ती है । लोलक का तार जितना ही लम्बा हो उतनी ही अधिक देर तक यह झूलता रहेगा नहीं तो अपनी तीव्र गति से हवा की रगड़ खा कर जल्द रुक जायगा । दूसरे इसका गोला जितना ही भारी हो अच्छा है क्योंकि इससे लटकाने के दोषों का तथा हवा की रगड़ का प्रभाव बहुत कम पड़ जाता है । इस प्रयोग को बहुत सफलतापूर्वक करने का उद्योग अमेरिका के एक विज्ञानवेत्ता रसेल डेबलू फोर्टर ने १ किया है । इन्होंने पियानो बाजा के लगभग १२ १. देखो जुलाई सन् १६२८ ई० के सायंरिफिक अमेरिकन Scientific American पृष्ठ १४, १५ ।
भूगोलाध्याय ७५७ चित्र नं० १३० फुट लम्बे तार से ढलवे लोहे का कोई ४० पौंड या २० सेर का गोला छत की धरन से लटकाया । यह देखा गया है कि लोलक की गति धीरे धीरे मंद पड़ जाती है परन्तु यदि इनका लोलक लम्ब दिशा से तीन फुट तक खींच कर झुलाया जाय तो आधे घंटे के बाद भी वह लम्ब रेखा से २ फुट इधर उधर झूलता रहता है ।
७५८ सूर्य्य-सिद्धान्त हां, इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि जिस छत में लोलक लटकाया जाय उसमें किसी प्रकार का स्पन्दन न हो और कमरे की हवा में किसी प्रकार का झोंका न हो । लोलक लटकने पर प्रायः घूमता रहता है जिससे डोरे या तार में ऐंठन पड़ जाती है । इससे लोलक में एक दूसरी गति उत्पन्न हो जाती है । इसलिये इसे रोकने के लिये इन्होंने तार को एक पीतल के हुक में लटकाया जिसका आकार प्रश्नवाचक चिह्न की तरह था और हुक की नोक एक छिछली प्याली में थांभ दी गयी जो धरन पर अच्छी तरह कसी हुई थी । प्याली का नतोदर तल अच्छी तरह चिकना कर दिया था । लोलक को झुलाने के पहले बिल्कुल निश्चल रखना चाहिये । इसलिये गोले में एक डोरा बांध कर डोरे को इतना खींच कर दीवाल में बांध देना चाहिये कि गोला धरण-बिन्दु की लम्ब रेखा से २, ३ फुट हट जाय । अब यदि डोरे को जला दिया जाय तो गोला हिलने लगेगा और बराबर एक ही तल में झूलता रहेगा । यदि ऐसा न किया जाय तो गोला एक लम्बे दीर्घवृत्त में झूलने लगता है और यदि आरंभ में जरा सी भी गड़बड़ हो तो कुछ देर में बहुत बड़ा रूप धारण कर लेता है । लोलक के झूलने की दिशा चाहे जो हो परन्तु यदि आरम्भ उत्तर दक्षिण दिशा से किया जाय तो अच्छा है । गोले के नीचे जो सुई निकली हुई हो वह मेज के इतने पास हो कि उस पर रखी हुई कागज की तख्ती के छूने से तनिक ही बची रहे । गोला झुलाने के बाद कागज की तख्ती पर एक सीधी रेखा पेंसिल से खींच कर तख्ती को मेज पर इस प्रकार सरका दो कि सुई छू न जाय और खींची हुई रेखा सुई के झूलने के तल से ठीक मिल जाय । अब तख्ती की रेखा के दक्षिणी किनारे को ध्यान से देखना चाहिये । दो ही तीन मिनट में तख्ती की रेखा का दक्षिणी सिरा पच्छिम से पूरब को अर्थात् अपसव्य दिशा में या घड़ी की विरुद्ध दिशा में घूमता हुआ देख पड़ेगा । कारण यह कि तख्ती पृथ्वी के साथ पच्छिम से पूरब को घूमती रहती है । यह प्रयोग यदि विषुवत् रेखा से दक्षिण के देशों में किया जाय तो तख्ती की रेखा घड़ी की अनुकूल दिशा में घूमती हुई देख पड़ेगी । अब देखना है कि प्रयोग का परिणाम गणना से कहाँ तक मिलता है । यदि किसी प्रकार यह सम्भव हो कि लोलक उत्तरी ध्रुव पर लटकाया जाय तो लोलक की लम्ब-रेखा और पृथ्वी का अक्ष एक ही दिशा में होंगे । इसलिए जैसे- जैसे पृथ्वी पच्छिम से पूरब की ओर घूमती जायगी इसके साथ दर्शक के खड़ा होने का तल भी पच्छिम से पूरब को घूमेगा और लोलक का स्पन्दन तल पूरब से पच्छिम की ओर हटता हुआ जान पड़ेगा क्योंकि दर्शक पृथ्वी के घूमने को नहीं देख
भूगोलाध्याय ७५६ सकता । इसलिए लोलक का स्पन्दन-तल उलटी दिशा में २३ घंटे ५६ मिनट ४ सेंकेड में एक चक्कर लगा लेने की गति से घूमता हुआ देख पड़ेगा । ( चित्र नं० १३१ )
७६० सूर्य-सिद्धान्त यह सम्भव नहीं कि एक बार का झुलाया हुआ लोलक लगातार २४ घंटे तक झूलता रहे । परन्तु जितनी देर तक वह झूलता रहेगा उतनी ही देर में इसका स्पन्दन-तल इतना घूमा हुआ देख पड़ेगा कि उससे अनुपात द्वारा सहज ही जाना जा सकता है कि एक चक्कर लगाने का समय क्या हो सकता है । पोर्टर ने अपने लोलक को इस प्रकार लटकाया था । एक पीतल का हुक जिसकी मोटाई दे इञ्च थी एक फौलाद की प्याली में रखा गया है जिसमें ऐंठन न पड़े । (देखो चित्र १३१) यदि विषुवत् रेखा पर लोलक झुलाया जाय तो इसकी नोक से बनी हुई लकीर एक दूसरे के ऊपर होगी क्योंकि यहाँ इसके दोनों किनारों की पच्छिम से पूरब वाली गति समान है इसलिए लोलक का स्पन्दन-तल घूमता हुआ नहीं देख पड़ेगा वरन् एक ही लकीर पर चलता रहेगा । परन्तु विषुवत् रेखा से भिन्न स्थानों में यह बात नहीं होगी क्योंकि लोलक के ठीक नीचे के धरातल के उस भाग में जो विषुवत् रेखा के पास है पृथ्वी के घूमने की गति उससे अधिक है जो ध्रुव के पास है इसलिए इसका परिणाम यह होगा कि लोलक की नोक से जो लकीर बालू पर बनेगी उसका वह किनारा जो विषुवत् रेखा की ओर है ध्रुव की ओर वाले किनारे से अधिक वेग से घूमने के कारण पूरब की वि स अ ९०-अ धा ध क प वी ( चित्र नं० १३२ )
भूगोलाध्याय ७६१ ओर हटता हुआ और ध्रुव की ओर वाले किनारे का चक्कर लगाता हुआ देख पड़ेगा परन्तु यह चक्कर २३ घंटे ५६ मिनट ४ सेंकेड से अधिक समय में पूरा होगा जैसा कि नीचे की गणना से सिद्ध है । कल्पना करो कि परीक्षा के स्थान स का उत्तरी अक्षांश अ है । वि वी विषुवत् रेखा, क पृथ्वी का केन्द्र, ध धा पृथ्वी का अक्ष और ध उत्तरी ध्रुव है। ध धा अक्ष पर घूमने वाला पृथ्वी का कोणीय वेग व गति-विज्ञान के अनुसार दो भागों में बाँटा जा सकता है, जिसका एक भाग क स पर और दूसरा भाग क प पर घूमता हुआ समझा जा सकता है । वेग का यह भाग जो क स पर है व कोटिज्या (६०°-अ) अथवा व ज्या अ के समान होगा और जो भाग कप पर है वह व कोज्या अ के समान होगा । परन्तु कप पर घूमने वाला वेग क स के समानान्तर होगा इसलिए इसका प्रभाव लोलक पर वैसा ही पड़ेगा जैसा विषुवत् रेखा पर पड़ता है अर्थात् इसके कारण लोलक से बनने वाली लकीर की दिशा में कोई परिवर्तन नहीं होगा परन्तु क स पर घूमने वाला वेग झूलते हुए लोलक की सुई से बनी हुई लकोर की दिशा में परिवर्तन करेगा जिससे लकीर का दक्षिणी सिरा पच्छिम से पूरब की ओर खसकता हुआ देख पड़ेगा और जान पड़ेगा मानों लोलक का स्पन्दन तल ही पूरब से पच्छिम की ओर घूम रहा है क्योंकि पहली लकीर से दूसरी लकीर पच्छिम की ओर बनती चली जायगी। अब यह देखना है कि कितनी देर में लोलक का स्पन्दनतल यदि लगातार झूलता रहा तो एक चक्कर लगा लेगा। यह मान लिया गया है कि पृथ्वी के अक्ष पर घूमता हुआ वेग व है और स स्थान पर इसका खण्ड वेग व ज्या अ है इसलिए यह जानना सहज है कि जब व वेग से एक चक्कर २४ घंटे में पूरा होता है तब व ज्या अ वेग से एक चक्कर अधिक समय में पूरा होगा इसलिए लोलक से बनी हुई लकीरों का पूरा चक्कर $\frac{व\times २४ घंटा}{व ज्या अ} = \frac{२४ घंटा}{ज्या अ}$ समय में पूरा होगा। जहाँ अ स्थान का अक्षांश है। यदि प्रयाग में यह प्रयोग किया जाय तो एक चक्कर $\frac{२४ घंटा}{ज्या २५^\circ २५'} =$ $\frac{२४ घंटा}{.४२६२} =$ ५५ घंटा ५५ मिनट या मोटे हिसाब से ५६ घंटे में होगा । इसलिये यदि आधे घंटे भी लोलक झूलता रहे तो स्पन्दनतल की दिशा में पर्याप्त परिवर्तन देख पड़ेगा क्योंकि जब ५६ घण्टे में पूरा चक्कर होता है तब आधे घण्टे में $\frac{१}{२} \times ३६० \times \frac{१}{५६}अंश = \frac{४५}{१४} = ३ अंश १३कला के लगभग परिवर्तन हो जायगा ।$ २१
७६२ सूर्य-सिद्धान्त जो सहज ही देखा जा सकता है क्योंकि यदि लोलक लम्ब से २ फुट भी हटा कर झुलाया जाय तो ३ अंश के परिवर्तन में लोलक १ इञ्च से अधिक दूर हट जायगा । इस प्रकार के प्रयोग भिन्न-भिन्न अक्षांशों पर भिन्न-भिन्न विज्ञानवेत्ताओं ने किये और सबके प्रयोगों से यही बात सिद्ध होती है कि लोलक से बनी हुई रेखा के पूरा घूम जाने का समय = २४ घण्टा / ज्या अक्षांश और एक घण्टे में घूमने का परिमाण इस प्रकार निकलेगा (२४ घण्टा / ज्या अक्षांश) : १ घण्टा : : ३६० अंश : इष्ट परिमाण ∵ इष्ट परिमाण = (३६० ✕ ज्या अक्षांश) / २४ = १५ ज्या अक्षांश अगले पृष्ठ की सारिणी में १ भिन्न-भिन्न प्रयोगों का परिणाम दिया जाता है— इस सारणी से प्रत्यक्ष हो जाता है कि लोलक के स्पन्दन तल की दिशा का परिवर्तन पृथ्वी की ही भ्रमण गति से होता है । यह सब प्रयोग विषुवत् रेखा से उत्तर के देशों के लिए है । विषुवत् रेखा से दक्षिण के देशों में भी परिवर्तन इसी नियम से होता है । (३) पृथ्वी की भ्रमणगति सिद्ध करने के लिए एक तीसरी रीति भी है, जिसे फूको ने ही निकाली थी । यदि किसी चक्र का किनारा बहुत भारी हो और उसका अक्ष उसके केन्द्र से जाता हुआ उसके धरातल से समकोण बनाता हो वह चक्र अपने अक्ष पर बहुत वेग से घूम सकता हो तो ऐसे चक्र को घुमना पहिया (gyrostat) कहते हैं । यदि इसके साथ इसका आधार भी हो जिससे यह थमा रहता है तो इसका नाम घुमनाचक्र (gyroscope) हो जाता है । एक साधारण घुमना चक्र का चित्र १३३ है— क ख चक्र सम धरातल अक्ष ग घ पर घूम सकता है और जिस चक्र पर ग घ अक्ष है वह च छ सम धरातल अक्ष पर घूम सकता है (छ अक्षर चित्र में स्पष्ट नहीं है । यह घ के पास और यंत्र के कुछ पीछे है) । च छ अक्ष कुल को लेता हुआ ज म लम्ब अक्ष पर घूम सकता है । यह यंत्र ऐसा बनाना चाहिये कि इसके घूमते समय रगड़ कम से कम हो । ये तीनों अक्ष एक दूसरे से समकोण पर होने हैं, ग, घ और च छ अक्ष समधरातल में और ज म अक्ष लम्ब दिशा में । यदि रगड़
१. उर्दू के वैज्ञानिक मासिक पत्र 'रोशनी' अप्रैल १६१६ ई० पृष्ठ २८०-८१ के आधार पर जो Movements of the earth by Norman Lockyer F.R.S. से लिया गया है ।
भूगोलाध्याय ७६३
| प्रयोग का स्थान | अक्षांश (अंश / कला) | १ घंटे में स्पन्दन तल की दिशा में परिवर्तन प्रयोग से (अंश) | १ घंटे में स्पन्दन तल की दिशा में परिवर्तन गणना से (अंश) | प्रयोगकर्ता का नाम |
|---|---|---|---|---|
| सीलोन | ६ | ५६ | १.८७० अंश | १.८१५ अंश |
| न्यूयार्क | ४० | ४४ | ६.७३३ | ६.८१४ |
| Provinces R. I. | ४० | ४६.५ | ६.६५५ | ६.८३३ |
| न्यूहेवन | ४१ | १८.५ | ६.६७० | ६.६२७ |
| जेनेवा | ४६ | १२ | १०.५२२ | १०.८५६ |
| पेरिस | ४८ | ५० | ११.५०० | ११.३२३ |
| ब्रिस्टल | ५१ | २७ | ११.७८८ | ११.७६३ |
| डबलिन | ५३ | २० | ११.६१५ | १२.०६५ |
| एवरडीन | ५७ | ६ | १२.७०० | १२.६२८ |
७६४ सूर्य-सिद्धान्त (चित्र नं० १३३) बहुत कम हो जिससे प्रत्येक अक्ष की गति पूरी तरह स्वतन्त्र हो तो घुमने-यंत्र में अनेक अद्भुत गुण पाये जाते हैं जब कि क ख चक्र खूब तेज़ी से घूम रहा हो । एक महत्व का गुण यह है कि यदि क ख चक्र तेज़ी से चला दिया जाय तो ग घ अक्ष की दिशा सर्वदा एक ही बनी रहती है जब कि घुमना-चक्र एक जगह से दूसरी जगह ज म को पकड़ कर हटाया जाता है । जब घुमना-चक्र के अक्ष की दिशा पृथ्वी के अक्ष के समानान्तर रखी जाती है तब तो इसकी दिशा आस पास की वस्तुओं की दृष्टि से स्थिर रहती है परन्तु यदि इसका अक्ष किसी अन्य दिशा में करके यह घुमाया जाय तो अक्ष उसी प्रकार दिशा बदलता है जैसे तारे । यदि अक्ष किसी विशेष तारे की दिशा में करके चक्र घुमाया जाय तो जब तक वह चक्र घूमता रहेगा अक्ष सदा उसी तारे की दिशा में रहेगा। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि तारों की
भूगोलाध्याय ७६५ दिशा स्थिर है और उनका प्रतिदिन का पूरब से पच्छिम को घूमना पृथ्वी की दैनिक गति के कारण है । इन प्रयोगों के सिवा बहुत सी घटनाएँ ऐसी हैं जिनसे पृथ्वी का अक्ष भ्रमण सिद्ध होता है। उत्तर गोल में लोलक की नोक से बनी हुई रेखा घड़ी की प्रतिकूल दिशा में घूमती है वैसे ही यहाँ बवंडरों के घूमने की दिशा भी होती है । परन्तु दक्षिण गोल में लोलक की नोक से बनी हुई रेखा तथा बवंडरों की दिशा घड़ी की अनुकूल दिशा में घूमती हैं। जो हवाएँ विषुवत् रेखा से ध्रुव की ओर चलती हैं वे उत्तर गोल में पूरब की ओर अर्थात् दाहिने और दक्षिण गोल में भी पूरब की ओर अर्थात् अपने बायें मुड़ जाती हैं। इसका कारण सिवा इसके और क्या हो सकता
उत्तर गोल में बवंडरों की दिशा
दक्षिण गोल में बवंडरों की दिशा (चित्र १३४)
७६६ सूर्य-सिद्धान्त है कि जब विषुवत् रेखा के ऊपर की हवा गरम होकर हलकी होती है तब यह ऊपर उठती है इसलिए इसकी जगह भरने के लिए ध्रुवों के पास की ठंडी हवा विषुवत् रेखा की ओर चलती है । परन्तु विषुवत् रेखा पर पृथ्वी की गति पूर्व की ओर अत्यन्त तीव्र होती है और ज्यों-ज्यों ध्रुवों की ओर जाओ त्यों-त्यों यह गति मन्द पड़ती जाती है इसलिए जो हवा विषुवत् रेखा से चलती है उसकी भी पूर्व की ओर गति तीव्र रहती है इसलिए यह ध्रुवों की ओर के देशों में पहुँचती है जिनकी पूर्वी गति मन्द रहती है । तब यह पूर्व की ओर मुड़ जाती है । इसी प्रकार जो हवा ध्रुवों से विषुवत् रेखा की ओर चलती है वह पच्छिम की ओर को मुड़ जाती है । समुद्र की धाराओं की दिशा भी इसी प्रकार की होती है । मेक्सिको की खाड़ी से जो विषुवत् रेखा के पास है जो गरम जलधारा अटलांटिक महासागर में उत्तर की ओर चलती है वह आगे चलकर पूरब की ओर मुड़ जाती है और उत्तर पूरब दिशा में चलती हुई अटलांटिक महासागर की दूसरी ओर फ्रांस, इंग्लैंड, नारवे आदि देशों में पहुँचती है तथा उत्तर की ठंडी धारा ग्रीनलैंड से उत्तरा अमेरिका की ओर जाती है । इसी का फल फल है कि नारवे का हैमरफैस्ट का बन्दरगाह जो ७० १/२ उत्तरी अक्षांश पर है बारहों महीने बर्फ से मुक्त रहता है जब कि उत्तरी अमेरिका का पूरबी किनारा ४० अक्षांश तक जाड़ा भर और गरमी के भी अधिक भाग तक बर्फ से ढका रहता है । इसी प्रकार हिन्द महासागर के द्वीपसमूह से जो गरम जल धारा उत्तर की ओर को चलती है वह पूरब की ओर को मुड़ कर जापान के पूरबी भाग को गरम रखती है और उत्तर से ठंडी जलधारा जापान के पच्छिमी किनारे से होती हुई चीन सागर में ठीक उलटी दिशा में आती है । यह संक्षेप में बतलाया गया है कि पृथ्वी की दैनिक गति के कारण हवाओं और धाराओं की दिशाओं में क्या परिवर्तन हो जाता है । यदि इस विषय पर अधिक जानना हो तो भूगोल की अच्छी पुस्तकों से काम लेना चाहिए । इस अक्ष भ्रमण के सिवा पृथ्वी में एक दूसरी गति भी होती है जिससे यह वर्ष में भर सूर्य की परिक्रमा कर लेती है परन्तु जान पड़ता है मानों सूर्य ही पृथ्वी की परिक्रमा करता है । पृथ्वी की इस गति का प्रमाण और भी सूक्ष्म है जिसका विचार आगे कहीं किया जायगा । इस समय केवल इतना स्मरण करा देना पर्याप्त होगा कि पृथ्वी की इस गति के ही कारण ग्रहों में आठ प्रकार की गतियाँ देख पड़ती हैं (देखो स्पष्टाधिकार पृष्ठ ८४-९४, ९७-१०५) । ७३ श्लोक के उत्तरार्ध में बतलाया गया है कि ग्रह कक्षाएँ भी भचक्र में
भूगोलाध्याय ७६७ बंधी हुई पूरब से पच्छिम को जा रही हैं। परन्तु इन सब गतियों का कारण पृथ्वी की दैनिक गति ही है। उ व विषुवत रेखा व द (चित्र १३५) उ = उत्तर ध्रुव द = दक्षिण ध्रुव व वि = विषुवत् रेखा सकृदुद्गतमब्दार्धं पश्यन्त्यर्कं सुरासुराः । पितरः शशिगाः पक्षं स्वदिनं च नराभुवि ॥७४॥ अनुवाद—सुर और असुर एक बार के उदय हुए सूर्य को लगातार आधे वर्ष तक देखते रहते हैं, चन्द्रलोक के निवासी पितृगण उसको एक पक्ष तक और पृथ्वी के निवासी मनुष्य उसको अपने एक दिन तक देखते हैं । विज्ञान-भाष्य—इस श्लोक के पूर्वार्ध का अर्थ वही है जो ६७वें श्लोक में बतलाया गया है। उत्तरार्ध के प्रथम पद के अर्थ में ही कुछ विशेषता है जिसे समझाने की आवश्यकता है। सनातनधर्मी हिन्दुओं का विश्वास है कि चन्द्रगोल के ऊर्ध्व भाग में पितृगण निवास करते हैं। यह भाग पृथ्वी के सन्मुख नहीं होता । पाश्चात्य ज्योतिषी भी कहते हैं कि चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा इस प्रकार करता है कि इसका अधोभाग ही पृथ्वी के सन्मुख रहता है और ऊर्ध्व भाग सदैव पीछे रहता
७६८ सूर्य-सिद्धान्त है। इसलिए चन्द्रमा अपने अक्ष पर एक भ्रमण उतने ही दिनों में करता है जितने दिन में वह पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इसका प्रमाण कठिन नहीं है। चन्द्र बिम्ब को ध्यान से देखने पर ज्ञात होता है कि उसके काले धब्बे बिम्ब के किनारे से सदैव एक ही स्थिति में देख पड़ते हैं जिससे प्रकट होता है कि चन्द्र बिम्ब का वह भाग जो पृथ्वी के सन्मुख है सदैव उसी दशा में रहता है अर्थात् चन्द्रमा का अक्ष-भ्रमण- काल उसके परिक्रमा काल के समान ही होता है। इस पर यह कहा जा सकता है कि चन्द्रमा में अक्ष-भ्रमण होता ही नहीं। परन्तु यह ठीक नहीं है। यह एक उदाहरण से स्पष्ट हो जायगा। एक दीपक बीच में रख दीजिये और उसकी ओर देखिए। मान लीजिए कि दीपक आपके उत्तर की ओर है। अब दीपक को देखते हुए आप उसके चारों ओर घड़ी की अनुकूल दिशा में घूमिए। जब आप चौथाई चक्कर कर लेंगे तब दीपक आपके पूरब हो जायगा। आधा चक्कर कर लेने पर दीपक आपके दक्षिण हो जायगा, तीन चौथाई चक्कर करने पर वह आपके पच्छिम हो जायगा और पूरा चक्कर करके उसी स्थान पर आ जाने पर जहाँ से चक्कर लगाना आरम्भ किया था वह दीपक फिर आपके उत्तर हो जायगा। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि इस प्रकार के एक चक्कर में आपका मुख सदैव दीपक की ओर रहता है और पीठ सदैव उसके पीछे। साथ ही साथ आपका शरीर भी एक बार घूम जाता है क्योंकि घूमने में भी तो आपका मुख उत्तर, पूरब, दक्षिण और पच्छिम की ओर होता रहता है। जब चन्द्रमा का ऊर्ध्व भाग सदा पृथ्वी से विमुख रहता है तब उसका सम्बन्ध सूर्य से किस प्रकार रहता है ? अमावस्या के दिन सूर्य और पृथ्वी के बीच में चन्द्रमा रहता है इसलिए इसका ऊर्ध्व भाग सूर्य के ठीक सामने रहता है। ऊर्ध्व भाग में पितृलोग निवास करते हैं इसलिए अमावस्या के दिन सूर्य पितरों के ठीक सिर पर रहता है अर्थात् इस दिन उनका मध्याह्न होता है। इसीलिए अमावस्या के मध्याह्न काल में पितरों के लिए श्राद्ध तर्पण आदि किये जाते हैं। पूर्णमासी के दिन इनकी मध्यरात्रि होती है। कृष्ण पक्ष का आधा भाग बीतने पर सूर्य पितरों को उदय होता हुआ देख पड़ता है और शुक्ल पक्ष के आधे भाग तक वह बराबर उनको देख पड़ता है अर्थात् पितरों का प्रातःकाल कृष्ण पक्ष की अष्टमी को होता है और सायंकाल शुक्ल पक्ष की अष्टमी को। ग्रह कक्षा और ग्रह गतियों का सम्बन्ध - उपरिस्थस्य महती कक्षाऽल्पाधः स्थितस्यच । महत्याकक्षया भागा महान्तोऽल्पास्तथल्पया ॥७५॥
भूगोलाध्याय ७६६ कालेनाल्पेन भगणं भुङ्क्तेऽल्प भ्रमणाधितः । ग्रहः कालेन महता मण्डले महति भ्रमन ॥७६॥ स्वल्पयातो बहून भुङ्क्ते भगणांश्छीतदीधितिः । महत्या कक्षया गच्छंस्ततः स्वल्पं शनैश्चरः ॥७७॥ अनुवाद—(७५) जो ग्रह कक्षा ऊपर है अर्थात् पृथ्वी से दूर है उसका परिमाण अधिक है और जो ग्रह कक्षा नीचे है अर्थात् पृथ्वी से निकट है उसका परिमाण कम है । बड़ी कक्षा के अंश बड़े और छोटी कक्षा के अंश छोटे होते हैं । (७६) छोटी कक्षा पर चलने वाले ग्रह अल्प काल में अपना भगण अर्थात् चक्कर पूरा कर लेते हैं और बड़ी कक्षा पर चलने वाले ग्रह अधिक काल में अपना भगण पूरा करते हैं । (७७) चन्द्र कक्षा बहुत छोटी है इसलिए चन्द्रमा अनेक भगण पूरा करता है जब कि शनिश्चर बड़ी कक्षा में होने के कारण थोड़े ही भगण पूरा कर पाता है । विज्ञान-भाष्य—ग्रहों की कक्षाओं और उनकी गतियों के सम्बन्ध में मध्यमाधिकार श्लोक २६, २७ तथा उसके विज्ञान भाष्य पृष्ठ १४-१७ में कुछ बतलाया जा चुका है इसलिए यहाँ अधिक विस्तार की आवश्यकता नहीं है । बड़ी कक्षा के अंश बड़े और छोटी कक्षा के अंश छोटे कैसे होते हैं इसका प्रमाण पृष्ठ १४ के चित्र १ से सहज ही मिल सकता है । बड़े वृत्त का २४ अंश जितना बड़ा है उतना ही छोटे वृत्त का ३६ अंश है अर्थात् बड़े वृत्त का एक अंश छोटे वृत्त के एक अंश से बड़ा है । यह भी स्पष्ट है कि जो ग्रह बड़ी कक्षा में भ्रमण करते हैं उनका भगण काल बड़ा और जो ग्रह छोटी कक्षा में भ्रमण करते हैं उनका भगण काल छोटा होता है । परन्तु ग्रह के भगण काल और उसकी दूरी में ऐसा सरल सम्बन्ध नहीं जैसा कि भारतीय ज्योतिषी समझते थे और जैसा कि इसी अध्याय में आगे बतलाया गया है । यह सम्बन्ध केपलर के तीसरे नियम के अनुसार है जो ग्रह गतियों और उनकी दूरियों के सूक्ष्म विचार से निश्चित किया गया है (देखो पृष्ठ ८४-६१) । दिनपति, मासपति आदि जानने की रीति मन्दादधः क्रमेण स्युश्चतुर्या दिवसाधिपः । वर्षाधिपतयस्तद्वत्तृतीयाश्चे प्रकीर्तिता ॥७८॥ ऊर्ध्वं क्रमेण शशिनो मासानमधिपाः स्मृताः । होरेशा सूर्यतनयादधोधः क्रमशःस्तथा ॥७६॥ अनुवाद - (७८) शनि से नीचे का चौथा ग्रह क्रमानुसार दिनपति और तीसरा ग्रह वर्षपति होता है । (७६) चन्द्रमा से ऊपर के ग्रह क्रमशः मासपति तथा शनि से नीचे ग्रह क्रमशः होरापति होते हैं ।
७७० सूर्य-सिद्धान्त विज्ञान-भाष्य — इन दोनों श्लोकों की पूरी व्याख्या मध्यमाधिकार के पृष्ठ ४०-४५ में की गयी है इसलिये यहाँ अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है । नक्षत्र कक्षा, आकाश कक्षा तथा ग्रह की गतियों का सम्बन्ध— भवेद्भकक्षा तिग्मांशोर्भ्रमणं षष्टि ताडितम् । सर्वोपरिष्टाद्भ्रमति योजनैस्तैर्भमण्डलम् ॥८०॥ कल्पोक्त चन्द्रभगणा गुणिताः शशिकक्षया । आकाशकक्षा सा ज्ञेया कर व्याप्तिस्तथा रखेः ॥८१॥ सैव यत्कल्पभगणैर्भक्ता तद्भ्रमणं भवेत् । कुवासरैर्विभाज्याह्नः सर्वेषां प्राग्गतिः स्मृता ॥८२॥ भुक्तियोजनजा संख्या सेन्दोर्भ्रमण संगुणा । स्वकक्षाप्तातु सा तस्य तिथ्याप्ता गति लिप्तिकाः ॥८३॥ अनुवाद — (८०) सूर्य-कक्षा के योजनों को ६० से गुणा करने पर नक्षत्र- कक्षा के योजनों का मान आ जाता है। सब ग्रहों से ऊपर नक्षत्र मण्डल इतने ही योजना में घूमता है । (८१) शशिकक्षा के योजनों को एक कल्प के चन्द्र भगणों की संख्या से गुणा करने पर आकाश कक्षा का मान ज्ञात होता है । सूर्य की किरणें वहीं तक जाती हैं । (८२) आकाश कक्षा के मान को जिस ग्रह के कल्प-भगणों की संख्या से भाग दिया जायगा उसी ग्रह की कक्षा का मान योजनों में ज्ञात होगा । आकाश- कक्षा को कल्प के सावन दिनों के भाग देने पर सब गृहों की दैनिकगति योजनों में आ जाती है । (८३) इस योजनात्मक ग्रह गति को चन्द्र-कक्षा से गुणा करके जिस ग्रह की कक्षा से भाग देकर लब्धि को १५ से भाग दें उस ग्रह की दैनिक गति कलाओं में आ जायगी । विज्ञान-भाष्य — इन श्लोकों में जो कुछ बतलाया गया है उसकी चर्चा कई जगह की गयी है (देखो पृ० १५-१७; ४५१-५३) । संक्षेप में इसका सार यह है :— (१) नक्षत्र कक्षा = रवि कक्षा × ६० (२) आकाश कक्षा = कल्प के चन्द्र भगण × चंद्र कक्षा (३) $\frac{आकाशकक्षा}{कल्प में किसी ग्रह की भगण संख्या} =$ उस ग्रह की कक्षा (४) $\frac{आकाश कक्षा}{कल्प के सावन दिन} =$ प्रत्येक ग्रह की दैनिक योजनात्मक गति (५) $\frac{ग्रह की योजनात्मक गति\timesचंद्र कक्षा}{ग्रह कक्षा\times १५} =$ ग्रह की दैनिक कलात्मक गति
भूगोलाध्याय ७७१ दूसरे और तीसरे समीकरण से स्पष्ट है कि आकाश कक्षा का विस्तार उतना माना गया है जितना प्रत्येक ग्रह एक कल्प में योजनों में चलता है । इससे यह सिद्ध है कि हमारे आचार्य प्रत्येक ग्रह की योजनात्मक गति समान समझते थे जो आजकल के वेधों से अशुद्ध है । ग्रह की दैनिक कलात्मक गति जानने का सिद्धान्त वही है जो ४५१-५३ पृष्ठों में अच्छी तरह समझाया गया है । नक्षत्र कक्षा और आकाश कक्षा के विस्तार कल्पित हैं । नक्षत्रों या तारों की दूरी की सीमा नहीं है । आजकल के वेधों से सिद्ध होता है कि कोई-कोई तारे पृथ्वी से इतनी दूर हैं कि उनके प्रकाश के पहुँचने में लाखों वर्ष लग जाते हैं । ग्रह की दूरी जानने की रीति कक्ष्या भूर्कणगुणिता महीमण्डलभाजिता । तत्कर्णा भूमिकर्णस्त्यु ग्रहोच्चे स्वे दलीकृताः ।।८४।। अनुवाद—किसी ग्रह की कक्षा को भूव्यास से गुणा करने और भूपरिधि से भाग देने पर उस ग्रह की कक्षा का व्यास होता है । इससे भूव्यास घटा कर शेष का आधा करने से भू-पृष्ठ से उस ग्रह की ऊँचाई अथवा दूरी ज्ञात होती है । विज्ञान-भाष्य—परिधि से व्यास जानने का यह एक नियम है । भूव्यास का भू-परिधि से जो सम्बन्ध है वही सम्बन्ध है वही सम्बन्ध प्रत्येक ग्रह की कक्षा के व्यास और परिधि में होता है । इस श्लोक के पूर्वार्ध का सरल अर्थ यह है कि ग्रह की कक्षा को ३.१४१६ से भाग देने पर उसकी कक्षा का व्यास आ जाता है । श्लोक के उत्तरार्ध में जो बात बतलायी गयी है वह पृष्ठ ४०८ के चित्र ७८ से स्पष्ट हो जाती है । इस चित्र में यदि भ द रेखा को द की ओर इतना बढ़ाया जाय कि वह चन्द्र कक्षा और सूर्य कक्षा तक पहुँच जाय तो द से चन्द्र कक्षा के बिन्दु की दूरी को चन्द्रमा की ऊंचाई और सूर्य कक्षा के बिन्दु की दूरी को सूर्य की ऊँचाई समझनी चाहिये । इसी तरह अन्य ग्रहों की ऊँचाई के बारे में भी समझना चाहिये । ग्रह कक्षाओं के विस्तार योजनों में खत्रयाब्धिद्विवह्नयः कक्ष्या तुहिनदीधितेः । ज्ञशीघ्रस्याष्टखद्वित्रिकशून्येन्यवस्तथा ।।८५।। शुक्रशीघ्रस्य सप्ताग्नि रसाब्धि रसषड्यमाः । ततोऽर्कबुधशुक्राणां खखाथे कसुरार्णवाः ।।८६।। कुजस्यातोऽष्टशून्याङ्कषड्वेदैकभुजङ्गमाः । चन्द्रोच्चस्य रसार्थाष्टमुनिद्वित्यष्टहस्तयः ।।८७। कृतर्तुमुनिपञ्चाद्रिगुणेन्दुविषया गुरोः । स्वर्भानोर्दन्ततत्वाब्धिशंलाथाकाशकुञ्जराः ।।८८।।
[हस्तलिखित टिप्पणियाँ / Margin Notes]
- Left Top: Compared to moon Sukra 8.2242 Buda 3.2198 Mangala 25.1448 Guru 158.5672 Sani 394.0378 Sun 13.3688
- Right Top: Compared to Sun
७७२ | सूर्य-सिद्धान्त
पञ्चपञ्चाश्विनागर्तुं रसाद्र्यर्काश्विनेस्ततः । भानां खखखशून्याङ्कवसुरन्ध्रशराश्विनः ॥८६॥ खव्योमखत्रयखसागरषट्कनाग- व्योमाष्टशून्ययमरूपनगाष्टचन्द्राः । ब्रह्माण्डसंपुटपरिक्रमणं समन्ता- दभ्यन्तरा दिनकरस्य कर प्रसाराः ॥६०॥
अनुवाद—(८५) चन्द्रमा की कक्षा ३२४००० योजन, बुध शीघ्र की कक्षा १०४३२०६ योजन; (८६) शुक्र शीघ्र की कक्षा २६६४६३७ योजन, सूर्य, बुध और शुक्र की कक्षाएँ ४३३१५००; (८७) मङ्गल की कक्षा ८१४६६०६ योजन, चन्द्रोच्च की कक्षा ३८३२८४८४ योजन; (८८) गुरु की कक्षा ५१३७५७६४ योजन; राहु की कक्षा ८०५७२८६४ योजन; (८६) शनि की कक्षा १२७६६८२५५ योजन; नक्षत्र कक्षा २५६८६००१२ योजन और (६०) आकाश या ब्रह्माण्ड की परिधि १८,७१,२०- ,८०,८६,४०,००,००० योजन है जहाँ तक सूर्य की किरणों का प्रसार होता है ।
**विज्ञान-भाष्य—**यदि ग्रहों के कल्प-भगण मध्यमाधिकार के श्लोक २६-३३ के अनुसार मान कर इनकी कक्षाओं की गणना श्लोक ८२ के अनुसार की जाय तो ऊपर दी हुई संख्याओं की इकाई के अंक में थोड़ा सा अन्तर पड़ता है इसका कारण यह जान पड़ता है कि पूरी संख्या लिखने के लिए भिन्नात्मक अंश या तो छोड़ दिया गया है या आधे से अधिक होने के कारण १ मान लिया गया है। ऐसा जान पड़ता है कि चन्द्रोच्च और राहु की कक्षाएँ नियम की समानता दिखलाने के लिए दी गयी हैं क्योंकि ये आकाश में स्वतन्त्र पिंड नहीं हैं, ये तो चन्द्र कक्षा के ही दो विशेष बिन्दु हैं । नक्षत्र कक्षा का भी विशेष महत्व नहीं जान पड़ता ।
आजकल वेधों से यह सिद्ध होता है कि ग्रहों की कक्षाएँ गोल नहीं हैं वरन् दीर्घवृत्त हैं जिनकी एक नाभि पर सूर्य रहता है और सब ग्रह सूर्य की ही परिक्रमा करते हैं । पृथ्वी से किसी ग्रह की दूरी सर्वदा समान नहीं रहती जैसा कि ४१० पृष्ठ के लम्बनों की सारणी से तथा पृष्ठ ५६८ में दिये हुए शीघ्र कर्णों की सारणी से स्पष्ट है। इन शीघ्र कर्णों के मान ऐसी इकाइयों में दिये हुए हैं जिनकी १००० इकाई पृथ्वी से सूर्य की मध्यम दूरी मानी गयी है। ऐसी १००० इकाइयां ६२६००००० मील (६ करोड़ २६ लाख मील) के समान होती हैं क्योंकि पृथ्वी से सूर्य की मध्यम दूरी इतनी ही है (देखो पृष्ठ ४५२) । यदि यह दूरी योजनों में जानना हो तो मीलों को ५ से भाग दे देना चाहिए (देखो पृ० ५४) ।
इस प्रकार भूगोलाध्याय नामक १२वें अध्याय का विज्ञान-भाष्य समाप्त हुआ ।
त्रयोदश अध्याय ज्योतिषोपनिषदध्याय (संक्षिप्त वर्णन) [श्लोक १-३—भूमगोल की रचना का उपदेश कैसे करना चाहिये। श्लोक ३-१३ भूभगोल बनाने की रीति। श्लोक १३-१५—लग्न, अन्त्या आदि के स्थान निश्चय करना। श्लोक १६-१७—भूमगोल किस प्रकार अपने आप घूम सकता है। श्लोक १८-२४—समय बतलानेवाले अन्य यन्त्रों की चर्चा। श्लोक २५—ज्योतिष का माहात्म्य।] भूभगोल बनाने की तैयारी— अथ गुप्ते शुचौ देशे स्नातश्शुचिरलङ्कृतः । संपूज्य भास्करं भक्त्या ग्रहान्भान्यथ गुह्यकान् ॥१॥ पारंपर्योपदेशेन यथा ज्ञातं गुरोर्मुखात् । आचार्यः शिष्यबोधार्थं सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् ॥२॥ भूभगोलकस्य रचनां कुर्यादाश्चर्यकारिणीम् । अनुवाद—तब आचार्य स्नान करने के बाद अलंकार धारण करके शुद्ध मन से एकान्त और पवित्र स्थान में सूर्य, ग्रहों, नक्षत्रों और यक्षों की भक्ति के साथ पूजा करके परम्परा से प्राप्त उपदेश के द्वारा गुरु के मुख से सुने हुए और स्वयं प्रत्यक्ष देखे हुए ज्ञान से शिष्य को पूरी तरह समझाने के लिये भूभगोल की आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली रचना करे। विज्ञान-भाष्य—कई टीकाकारों ने आचार्य का अर्थ सूर्यांश पुरुष और शिष्य का अर्थ मयासुर किया है; परन्तु मेरी समझ में यह सभी आचार्यों के लिये साधारण उपदेश है। 'कुर्यात्' शब्द भी यही प्रकट करता है। इन श्लोकों से प्रकट होता है कि आचार्य को केवल मौखिक उपदेश से ही सन्तुष्ट नहीं होना चाहिये वरन् व्यावहारिक और क्रियात्मक ज्ञान भी कराना चाहिये जिसके लिये उसे स्वयं व्यावहारिक ज्ञान भी रखना चाहिये और ज्ञान को प्रत्यक्ष देनेवाला भी होना चाहिये, ऐसा नहीं कि टीका कर डालें सूर्य सिद्धांत ऐसे गूढ़ ग्रन्थ की, परन्तु आकाश के मुख्य- मुख्य तारों की भी पहचान न हो। ग्रहों की पूजा में सूर्य की पूजा भी आ जाती है परन्तु यहाँ ग्रहों के साथ सूर्य शब्द अलग भी आया है जो सूचित करता है कि सूर्य की विशेष प्रकार से
७७४ सूर्य-सिद्धान्त पूजा करनी चाहिये क्योंकि इस सिद्धांत के आदि आचार्य सूर्यदेव ही माने गये हैं। ग्रहों की आधुनिक परिभाषा में सूर्य आते भी नहीं हैं परन्तु सूर्य-सिद्धांतकार ने इस विचार से सूर्य का नाम अलग नहीं दिया है क्योंकि और कहीं यह मत नहीं प्रकट होता । यक्ष लोग धन के देवता कुबेर के सेवक हैं, उनके कोष और बाग की रखवाली करते हैं। यह शायद शिल्पकला में भी निपुण माने गये हैं क्योंकि पुष्पक विमान कुबेर का ही था । इसलिये यन्त्र रचना के अर्थ में दैवी सहायता प्राप्त करने के लिये इनकी भी पूजा करने का आदेश है। भूभगोल शब्द भू, भ और गोल तीन शब्दों से बना है इसलिये इसका अर्थ है ऐसा गोल जिसमें भूगोल के साथ आकाश का वह गोल हो जिसमें ग्रह नक्षत्र आदि घूमते हुए माने गये हैं । भूभगोल बनाने की रीति— अभीष्टं पृथिवीगोलं कारयित्वा तु दारवम् ॥३॥ दण्डं तन्मध्यगं मेरोरुभयत्र विनिर्गतम् । आधारकक्षाद्वितयं कक्ष्यां वैषुवतीं तथा ॥४॥ भगणांशाङ्गुलैः कार्या दलितास्तिस्र एव ताः । स्वाहोरात्रार्धकर्णैश्च तत्प्रमाणानुपाततः ॥५॥ क्रान्तिविक्षेपभागैश्च दलिता दक्षिणोत्तरा । स्वैःस्वैरपक्रमैः कार्या मेषादीनामपक्रमात् ॥६॥ कक्ष्याः प्रकल्पयेत्ताश्च कर्क्यादीनां विपर्ययात् । तद्वत्तिस्रस्तुलादीनां मृगादीनां विलोमतः ॥७॥ याम्यगोलाश्रिताः कुर्यात् कक्ष्याधारद्वयोपरि । याम्योदग्भागसंस्थानां भानामभिजितस्तथा ॥८॥ सप्तर्षीणामगस्त्यस्य ब्रह्मादीनां प्रकल्पयेत् । मध्ये वैषुवती कक्ष्या सर्वासामेव संस्थिता ॥९॥ तदाधारयुतेः भार्धमयने विषुवद्वये । विषुवत्स्थानतो भागैः स्फुटैर्भगणसञ्चरात् ॥१०॥ क्षेत्राण्येवमजादीनां तिर्यग्ज्याभिः प्रकल्पयेत् । अयनादयनं चैव कक्ष्या तिर्यक्तथाऽपरा ॥११॥ क्रान्तिसंज्ञा तया सूर्यः सदा पर्यति भासयन् । चन्द्राद्याश्च स्वकैः पातैरपमण्डलमाश्रितैः ॥१२॥ ततोऽपकृष्टा दृश्यन्ते विक्षेपाग्रे ऽवपक्रमात् ।