सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७५६ सूर्य-सिद्धान्त (२) परन्तु इससे भी सहज और स्पष्ट प्रयोग फूको (Foucault) का लोलक- प्रयोग (Pendulum experiment) है । गणित शास्त्र से यह सिद्ध है कि यदि कोई लोलक केवल गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के स्पन्दन करे या झूले तो इसका स्पन्दन तल (झूलने की दिशा) वही बना रहेगा और इस तल की दिशा पर लोलक के आधार की गति का प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि ऐसी दूसरी कोई शक्ति नहीं है जो इसे इस तल से विचलित कर सके । यह सहज ही देखा जा सकता है कि यदि एक भारी लोलक एक पतले तार से लटका कर घड़ियों के लोलक की तरह झुलाया जाय और यदि वह आधार जिसमें लोलक लटकाया जाता है घुमाया जाय तो इसके घूमने से लोलक के स्पन्दन-तल में कोई अन्तर नहीं पड़ता क्योंकि जिस तार या डोरे में लोलक बंधा रहता है उसका जरा सा ऐंठ जाना अधिक सहज है न कि भारी लोलक का ही अपने स्पन्दन तल को बदलना जब कि वह पहले ही से एक तल में झूल रहा है । इसलिये यह सिद्ध है कि यदि पृथ्वी अचल हो तो लोलक के स्पन्दन की दिशा भी आसपास की वस्तुओं तथा आधार के विचार से अचल रहेगी और यदि इसमें भ्रमणगति होगी तो लोलक के स्पन्दन तल की अपेक्षा भूतल की दिशाओं में परिवर्तन हो जायगा और लोलक का स्पन्दन तल ही बदलता हुआ देख पड़ेगा । इसलिये इस लोलक-प्रयोग से पृथ्वी की भ्रमण गति का ही पता नहीं लगेगा वरन् इसकी दिशा का भी पता लगेगा । फूको ने यह प्रयोग सन् १८५१ ई० या १६०८ वि० में पेरिस में किया था । उसने अपने लोलक को पैन्थियन नामक विशाल भवन के गुम्बज से लटकाया । इसका तार २०० फुट लम्बा था और गोले की तोल १ मन के लगभग (८० पौंड) थी । जिस समय लोलक झूलता था गोले के नीचे निकली हुई सुई अपने झूलने का चिह्न बालू तल पर बनाती जाती थी और यह देख पड़ता था कि बालू का तल अपसव्य दिशा में अर्थात् दहिने से बायें पच्छिम से पूरब घूमता जाता था । इस प्रयोग में दो बातों की बड़ी सावधानी रखनी पड़ती है । लोलक का तार जितना ही लम्बा हो उतनी ही अधिक देर तक यह झूलता रहेगा नहीं तो अपनी तीव्र गति से हवा की रगड़ खा कर जल्द रुक जायगा । दूसरे इसका गोला जितना ही भारी हो अच्छा है क्योंकि इससे लटकाने के दोषों का तथा हवा की रगड़ का प्रभाव बहुत कम पड़ जाता है । इस प्रयोग को बहुत सफलतापूर्वक करने का उद्योग अमेरिका के एक विज्ञानवेत्ता रसेल डेबलू फोर्टर ने १ किया है । इन्होंने पियानो बाजा के लगभग १२ १. देखो जुलाई सन् १६२८ ई० के सायंरिफिक अमेरिकन Scientific American पृष्ठ १४, १५ ।