भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 799

७७४ सूर्य-सिद्धान्त पूजा करनी चाहिये क्योंकि इस सिद्धांत के आदि आचार्य सूर्यदेव ही माने गये हैं। ग्रहों की आधुनिक परिभाषा में सूर्य आते भी नहीं हैं परन्तु सूर्य-सिद्धांतकार ने इस विचार से सूर्य का नाम अलग नहीं दिया है क्योंकि और कहीं यह मत नहीं प्रकट होता । यक्ष लोग धन के देवता कुबेर के सेवक हैं, उनके कोष और बाग की रखवाली करते हैं। यह शायद शिल्पकला में भी निपुण माने गये हैं क्योंकि पुष्पक विमान कुबेर का ही था । इसलिये यन्त्र रचना के अर्थ में दैवी सहायता प्राप्त करने के लिये इनकी भी पूजा करने का आदेश है। भूभगोल शब्द भू, भ और गोल तीन शब्दों से बना है इसलिये इसका अर्थ है ऐसा गोल जिसमें भूगोल के साथ आकाश का वह गोल हो जिसमें ग्रह नक्षत्र आदि घूमते हुए माने गये हैं । भूभगोल बनाने की रीति— अभीष्टं पृथिवीगोलं कारयित्वा तु दारवम् ॥३॥ दण्डं तन्मध्यगं मेरोरुभयत्र विनिर्गतम् । आधारकक्षाद्वितयं कक्ष्यां वैषुवतीं तथा ॥४॥ भगणांशाङ्गुलैः कार्या दलितास्तिस्र एव ताः । स्वाहोरात्रार्धकर्णैश्च तत्प्रमाणानुपाततः ॥५॥ क्रान्तिविक्षेपभागैश्च दलिता दक्षिणोत्तरा । स्वैःस्वैरपक्रमैः कार्या मेषादीनामपक्रमात् ॥६॥ कक्ष्याः प्रकल्पयेत्ताश्च कर्क्यादीनां विपर्ययात् । तद्वत्तिस्रस्तुलादीनां मृगादीनां विलोमतः ॥७॥ याम्यगोलाश्रिताः कुर्यात् कक्ष्याधारद्वयोपरि । याम्योदग्भागसंस्थानां भानामभिजितस्तथा ॥८॥ सप्तर्षीणामगस्त्यस्य ब्रह्मादीनां प्रकल्पयेत् । मध्ये वैषुवती कक्ष्या सर्वासामेव संस्थिता ॥९॥ तदाधारयुतेः भार्धमयने विषुवद्वये । विषुवत्स्थानतो भागैः स्फुटैर्भगणसञ्चरात् ॥१०॥ क्षेत्राण्येवमजादीनां तिर्यग्ज्याभिः प्रकल्पयेत् । अयनादयनं चैव कक्ष्या तिर्यक्तथाऽपरा ॥११॥ क्रान्तिसंज्ञा तया सूर्यः सदा पर्यति भासयन् । चन्द्राद्याश्च स्वकैः पातैरपमण्डलमाश्रितैः ॥१२॥ ततोऽपकृष्टा दृश्यन्ते विक्षेपाग्रे ऽवपक्रमात् ।