सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्योतिषोपनिषदध्याय ७७५ अनुवाद—(३) लकड़ी का अभीष्ट आकार का एक गोला (भूगोल) बनाकर (४) इसमें छेद करके एक सीधा डंडा कस देना चाहिए जो भूगोल के केन्द्र से होकर दोनों ओर बराबर निकला रहे और मेरु दंड का काम करे । इसी दंड में दो आधार- वृत्त (एक दूसरे से समकोण पर) स्थिर करो जिनके बीचोबीच विषुवद्वृत्त हो । (५) इन तीनों वृत्तों को अंगुल से ३६० अंशों में बाँट दो । विषुवद्वृत्त के माना- नुसार अहोरात्र वृत्त के व्यासार्ध से (६) दक्षिणोत्तर वृत्त पर क्रान्ति और शर के अंशों के द्वारा जो इस पर अंकित हों मेष, वृष और मिथुन राशियों के अंतिम विन्दुओं की क्रान्तियों के अंतर पर इन तीन राशियों के (७) अहोरात्र वृत्त स्थिर करो जो विलोम रीति से कर्क, सिंह और कन्या के अहोरात्र वृत्त भी होंगे । इसी प्रकार तुला, वृश्चिक और धनु तथा विलोम रीति से मकर, कुम्भ और मीन राशियों के भी तीन अहोरात्र वृत्त (८) दोनों आधार वृत्तों के ऊपर दक्षिण गोल में स्थिर करो। ऐसे ही उत्तर और दक्षिण गोलों में स्थित नक्षत्रों, अभिजित (९) सप्तर्षि, अगस्त्य, ब्रह्महृदय आदि तारों के अहोरात्र वृत्त स्थिर करो । इन सब अहोरात्र वृत्तों के बीच में विषुवद्वृत्त होता है। (१०) विषुवद्वृत्त और दोनों आधारवृत्तों के युतिबिन्दुओं पर दोनों अयन बिन्दु और दोनों विषुव सम्पात होते हैं । विषुव सम्पात के स्थान से सायन राशि चक्र का आरम्भ करो । (११) इस प्रकार मेष वृष आदि राशियों के विभाग तिर्यक ज्याओं द्वारा करो । एक अयन विन्दु से दूसरे अयन विन्दु तक तथा दूसरे से फिर पहले तक जो तिर्यकवृत्त स्थिर किया जायगा (२) उसी का नाम क्रान्तिवृत्त है जिस पर सूर्य सदा प्रकाश देता हुआ भ्रमण करता है । चन्द्र, मंगल आदि ग्रह अपने अपने पातों के द्वारा जो क्रान्तिवृत्त पर होते हैं (१३) खिंचे हुए अपनी अपनी क्रान्ति से विक्षेप के अंत में देख पड़ते हैं । विज्ञान-भाष्य — यहाँ यह नहीं बतलाया गया है कि आधार कक्षा और विषुवत् कक्षा किस चीज का बनाना चाहिये । अन्य ग्रन्थों में बाँस की पतली-पतली तीलियों का प्रयोग किया गया है क्योंकि यही इतनी लचीली होती हैं कि गोलाई में मोड़ी जा सकती हैं । आजकल लोहे या पीतल के तार से यह काम आसानी से हो सकता है । ऊपर बतलायी हुई रीति से जो भूभगोल बनता है वह अनेक वृत्तों (वलयों) के कारण बहुत ही दुर्बोध हो जाता है इसलिये आजकल यदि चित्र १३६ के अनुसार भूभगोल बनाया जाय तो बनाने में भी सुगमता होगी और समझने में भी । इस चित्र के बीच में जो सबसे छोटा वृत्त है वह भूगोल ( पृथ्वी-गोल ) को सूचित करता है, इसीलिये बीच में 'भू' लिखा है । 'धधा' दंड है जो पृथ्वी-गोल के केन्द्र से होकर इसके दोनों ओर निकला रहता है । भू से ध और धा की दूरी समान है । इन्हीं स्थानों से दो आधारवृत्त 'धशधाव' और 'धपधापू' एक दूसरे से समकोण