सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 801, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ें७७६ सूर्य-सिद्धान्त
चित्र १३६
पर बाँधे जाते हैं। इन्हीं दोनों वृत्तों पर ध और धा से समान अन्तर पर 'प व पू श' वृत्त बाँधा जाता है जिसे विषुवत् कक्षा कहा गया है। इन तीनों वृत्तों को ३६० समान भागों में बाँट कर चिह्न बना देते हैं जो अंश कहलाते हैं। इसके बाद मेषादि बारह राशियों के अहोरात्रवृत्त बनाने का आदेश है। परन्तु मेरी समझ में यह आवश्यक नहीं है। ऊपर के तीन वृत्त बाँधने के बाद सीधे क्रान्ति-वृत्त को ही बाँधना सुगम होगा। यह भी ऊपर के किसी वृत्त के समान लेना चाहिए। इसे पहले व और श स्थानों पर विषुवद्वृत्त और धशधाव आधारवृत्त के जोड़ पर बाँधना चाहिये फिर दूसरे आधारवृत्त 'क' और 'म' स्थानों पर बाँधना चाहिये । 'क' या 'म' का अन्तर विषुवद् वृत्त से उतना ही होना चाहिये जितनी सूर्य का परमक्रान्ति होती है जो आजकल साढ़े तेईस अंश (२३° ३०') के लगभग है। इस क्रान्तिवृत्त को भी ३६० समान भागों में बाँट देना चाहिये । 'व' स्थान को सायनमेष या वसंत सम्पात तथा 'श' स्थान को सायनतुला या शरद सम्पात कहते हैं। 'क' और 'म' स्थानों को क्रम से सायन कर्क और सायन तुला अथवा दक्षिणायन और उत्तरायण विन्दु कहते हैं (देखो पृ० २३०)। इन स्थानों के विचार से 'ध श धा व' आधार कक्षा को विषुवसम्पातवृत्त (Equinoctial Colure) और 'ध प म धा पू क' आधार कक्षा को अयनवृत्त (Solstitial Colure) कहते हैं, क्योंकि पहले पर दोनों विषुव-सम्पात विन्दु और दूसरे पर दोनों अयन विन्दु होते हैं। चित्र में क्रान्ति वृत्त के 'अ' स्थान पर विषुवद् वृत के समानान्तर एक अहोरात्र वृत्त 'अ इ आई' दिखलाया गया है। यह क्रान्तिवृत्त के दूसरे स्थान 'आ' पर मिलता है । 'अ' विन्दु वसंत-सम्पात 'व' से जितने अंतर पर है उतने ही अंतर पर परन्तु