सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्योतिषोपनिषदध्याय ७७७ विलोम दिशा में शरद सम्पात 'श' से 'आ' का स्थान है अथवा 'क' से 'अ' और 'आ' समान दूरी पर हैं । यदि 'अ' सायन वृष राशि के आदि में हो तो 'आ' सायन कन्या राशि के आदि में होगा और यदि पहला सायन मिथुन राशि के आदि में हो तो दूसरा सायन सिंह राशि के आदि में होगा । इसी प्रकार क्रान्ति-वृत्त के किसी स्थान का अहोरात्र वृत्त बांधा जा सकता है । यही बात श्लोक ६-७ में बतलायी गयी है । इसके सिवा 'धा' स्थान के पास एक अहोरात्र वृत्त समझा जा सकता है । १२वें श्लोक में चन्द्रमा, मंगल आदि ग्रहों के कक्षा वृत्तों की भी चर्चा है परन्तु चित्र में ऐसा कोई भी कक्षा वृत्त नहीं दिखलाया गया है । ऐसा कक्षा वृत्त बांधने के लिये पहले ग्रह का पात-बिन्दु क्रान्ति-वृत्त पर स्थिर करना चाहिये । इसी पर उस ग्रह का कक्षा वृत्त बांधना चाहिये जिसका दूसरा जोड़ इस स्थान से १८० अंश पर क्रान्ति-वृत्त पर हो । यह दोनों स्थान ग्रह के पात स्थान हुए । फिर इस वृत्त को ६० अंश के अंतर पर क्रान्ति-वृत्त से उस ग्रह के परम विक्षेप के बराबर उत्तर और दक्षिण स्थानों पर भी बांध देना चाहिये (परम विक्षेप की चर्चा मध्यमाधिकार के पृ० ७४-७६ में की गयी है ) । उदयलग्न, मध्यलग्न, अन्त्या, चरज्या आदि का निश्चय— उदयं क्षितिजे लग्नदस्तं गच्छति तद्वशात् ।।१३।। लङ्कोदयैस्तथा सिद्धं खमध्योपरि मध्यगम् । मध्यक्षितिजयोर्मध्ये या ज्या साऽन्त्याऽभिधीयते ।।१४।। ज्ञेया चरदलज्या च विषुवत्क्षितिजान्तरम् । कृत्वोपरि स्वकं स्थानं मध्ये क्षितिजमण्डलम् ।।१५।। अनुवाद—(१३) क्रान्ति वृत्त का जो बिन्दु पूर्व क्षितिज में लगा रहता है वह उदय लग्न है। इस उदय लग्न के अनुसार क्रान्ति वृत्त का जो बिन्दु पच्छिम क्षितिज में लगा रहता है वह अस्त लग्न होता है । (१४) यामोत्तर वृत्त पर मध्यम लग्न होता है जिसकी गणना लंका के उदयासुओं से की जाती है । अहोरात्र वृत्त और यामोत्तर वृत्त के संधिस्थान से क्षितिज वृत्त तक जो ज्या होती है उसे अन्त्या कहते हैं । (१५) विषुवत् रेखा के क्षितिज जिसे उन्मण्डल कहते हैं और अपने स्थान के क्षितिज के बीच जो अन्तर होता है वह चरज्या है । भूगोल पर अपने स्थान को सबसे ऊपर करने पर क्षितिज वृत्त भूगोल के मध्य में होता है । विज्ञान-भाष्य—इन श्लोकों में एक ही शब्द कई परिभाषाओं के लिए प्रयुक्त हुआ है इसलिये इनका भाव जल्दी समझ में नहीं आता । १२वें श्लोक के पूर्वार्ध में 'मध्यम' मध्य लग्न के लिये आया है । उत्तरार्ध में 'मध्य' शब्द अहोरात्र २२