सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७७८ सूर्य-सिद्धान्त वृत्त और यामोत्तर वृत्त की सन्धि स्थान के लिये आया है। १५वें श्लोक के पूर्वार्ध में 'विषुवत्' विषवक्षितिज या उन्मण्डल के लिये तथा क्षितिज शब्द अपने स्थान के क्षितिज वृत्त के लिये प्रयुक्त हुआ है। इसके उत्तरार्ध में 'मध्ये' शब्द अपने स्थान के ऊर्ध्वाधर यामोत्तर वृत्त के मध्य के लिये आया है। इस प्रकार का प्रयोग बड़ा ही भ्रमोत्पादक होता है और वैज्ञानिक ग्रंथों के लिये दोष समझा जाता है । यह सब परिभाषाएँ त्रिप्रश्नाधिकार के २८६-६० पृष्ठों पर तथा स्पष्टा- धिकार के चित्र ३६, ४२, ४३ और त्रिप्रश्नाधिकार के चित्र ६३ से अच्छी तरह समझी जा सकती है। उपर्युक्त विवरण से भूभगोल यंत्र से इन सब परिभाषाओं का ज्ञान सहज ही हो सकता है । युक्ति जिससे भूभगोल यंत्र सदा घूमता रहे— वस्त्रच्छन्नं बहिश्चापि लोकालोकेन वेष्टितम् । अमृतस्रावयोगेन कालभ्रमणसाधनम् ॥१६॥ गुणबोजसमाकृष्टं गोलयंत्रं प्रकल्पयेत् । गोप्यमेतन्नकाशयोक्तं सर्वगम्यं भवेद्यतः ॥१७॥ अनुवाद—(१६) लोकालोक से अर्थात् क्षितिजवृत्त से घिरे हुए गोल को ऊपर कपड़े से ढक कर जल प्रवाह के द्वारा ऐसा प्रबन्ध करे कि यह अपने आप घूम- कर नाक्षत्रकाल सूचित करे । (१७) अथवा इस गोल यंत्र को पारे के संयोग से ऐसा बनावे कि वह अपने आप घूमे । इसको गुप्त रखना चाहिये । साफ-साफ बतला देने से इस संसार में यह सबको मालूम हो जायगा । विज्ञान-भाष्य—इन दोनों श्लोकों की भाषा बहुत ही अस्पष्ट है। इस बात का तनिक भी बोध नहीं होता कि यह गोलयंत्र किस प्रकार अपने आप घूमकर आकाश का प्रकार दैनिक भ्रमण सिद्ध करता था । इतना तो प्रकट है कि गोलयंत्र का मेरुदण्ड इस प्रकार स्थिर किया जाता था कि वह ध्रुव की ओर रहे । फिर उसमें ऐसी युक्ति की जाती होगी कि जल की धारा से उसमें ऐसी टक्कर लगे कि एक नाक्षत्र दिन में वह एक बार घूम जाय जैसे पनचक्की चलती है। पानी की जगह पारे से भी काम लिया जाता था परन्तु यह पता नहीं कि कैसे । अंत में यह बतलाया गया है कि यह युक्ति सबसे नहीं बतलानी चाहिये । शायद इसीलिये संकेत मात्रकर दिया गया है। इससे लोग यह परिणाम निकाल सकते हैं कि लेखक स्वयं इस क्रिया को अच्छी तरह नहीं जानता था । उसको केवल आभास था कि ऐसा यन्त्र बन सकता है जो अपने आप चलता हो, इसीलिये उसने सब बातें गोल रखी हैं । यह भी संभव है कि प्राचीन काल में शिल्पकला की इतनी उन्नति थी कि ऐसे स्वयंवह यंत्र पारे और पानी के संयोग