भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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ज्योतिषोपनिषदध्याय ७७६ से उसी प्रकार बनते थे कि जैसे आजकल घड़ी आदि अपने आप चलने वाले यन्त्र बनते हैं, परन्तु बीच में समय के फेर से सब ज्ञान नष्ट हो गया हो । तस्माद्गुरूपदेशेन रचयेद्गोलमुत्तमम् । युगे युगे समुत्पन्ना रचनेयं विवस्वतः ॥१८॥ प्रसादात्कस्यचिद्भूयः प्रादुर्भवति कालतः । कालसंसाधनार्थाय तथा यन्त्राणि कारयेत् ॥१९॥ एकाकी योजयेद्बीजं यन्त्रे विस्मयकारणम् । अनुवाद—(१८) इसलिये गुरु के उपदेश के अनुसार उत्तम गोल की रचना करनी चाहिये । यह रचना प्रत्येक युग में नष्ट हो जाती है और सूर्य भगवान की (१९) इच्छानुसार उनके प्रसाद से फिर किसी को प्राप्त होती है । इसी प्रकार समय का ज्ञान करने के लिये अन्य यन्त्रों की भी रचना करनी चाहिये । (२०) आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले यंत्र में (उसको चलाने के लिये) पारे का प्रयोग एकान्त में करना चाहिये । विज्ञान-भाष्य—इन श्लोकों से प्रकट होता है कि स्वयंवह यंत्र बनाने की क्रिया काल पाने पर नष्ट हो जाती है, जिसको फिर सूर्य भगवान् अपनी इच्छा से किसी को बतला देते हैं । इसके सिवा समय बतलानेवाले अन्य यंत्रों को बनाने के लिये भी कहा गया है और अंत में फिर बतलाया गया है कि पारे का प्रयोग एकान्त में करना चाहिये, सबको नहीं बतलाना चाहिये । समय बतलानेवाले अन्य यन्त्रों के नाम— शङ्कुयष्टिधनुश्चक्रैश्छाया यन्त्रैरनेकधा ॥२०॥ गुरूपदेशाद्विज्ञाय कालज्ञानमतन्द्रितः । तोययन्त्रैः कपालाद्यैर्मयूरनरवानरैः । सूत्रैश्च वेणुगर्भस्थैः सम्यक्कार्ल प्रसाधयेत् ॥२१॥ पारतालाबुसूत्राणि गुञ्जातैलजलानि च । बीजानि पांसवश्चैवां प्रयोगास्ते सुदुर्लभाः ॥२२॥ अनुवाद—(२०) शंकु, यष्टि, धनु और चक्र नामक अनेक प्रकार के छाया यंत्रों के द्वारा (२१) चतुर और परिश्रमी मनुष्य गुरु के उपदेश से काल का ज्ञान प्राप्त करते हैं । कपाल आदि जल यंत्रों से, मयूर, नर और वानर यंत्रों से जिनके पेट में बालू रहती है जो सूत के सहारे निकलती है समय का ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्त