सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८० सूर्य-सिद्धान्त करना चाहिये । (२२) पारे का आरा, जल, सूत, शुल्ब, तेल और जल, पारा और बालू इन सबका प्रयोग करना चाहिये । परन्तु यह भी कठिन है। विज्ञान-भाष्य- इन श्लोकों में समय जानने के अनेक यंत्रों के नाम गिना दिये गये हैं परन्तु उनके बनाने की विधि कहीं नहीं बतलायी गयी है। पहले चार यंत्रों से सूर्य की छाया देखकर समय जाना जा सकता है इसलिये वे दिन में ही काम कर सकते हैं और उनको छाया यंत्र कहा गया है। इनमें से शंकु की चर्चा त्रिप्रश्नाधिकार नामक तीसरे अध्याय में बहुत हुई है। उस अध्याय मे यह बतलाया गया है कि १२ अंगुल के शंकु से अक्षांश, नतांश, नतकाल, दिशा आदि का ज्ञान कैसे किया जाता है। इसके द्वारा समय जानने के लिये गुणा भाग की क्लिष्ट क्रिया करनी पड़ती है, सीधे समय नहीं निकलता। छाया की नाप भी बहुत शुद्ध नहीं ली जा सकती इसलिये इस यंत्र से जो समय आता है वह चार पाँच मिनट अधिक या कम हो सकता है। इसलिये आजकल इससे काम लेने की जरूरत नहीं। यष्टि यंत्र - इसकी चर्चा इस पुस्तक में और कहीं नहीं की गई है इसलिये यह नहीं बतलाया जा सकता कि इससे कैसे काम लिया जाता था। भास्कराचार्य जी ने सिद्धान्त शिरोमणि के यंत्राध्याय में इसकी विशेष चर्चा की है जिससे जान पड़ता है कि इससे भी समय का ज्ञान करने के लिये क्लिष्ट गणना करनी पड़ती है। इस- लिये आजकल अच्छे साधनों के होते हुए यह यंत्र भी आवश्यक नहीं है। धनुष और चक्र-यंत्र से समय का ज्ञान सहज ही हो सकता है। यह दोनों यंत्र वास्तव में एक ही हैं। चक्र-यंत्र में एक गोल चक्र होता है जिसके किनारे समान भागों में अंकित रहते हैं। यदि ६० समान भाग हों तो प्रत्येक भाग एक घड़ी का समय सूचित करता है। इस चक्र के केन्द्र से एक सीधी कीली लोहे या पीतल की कस दी जाय और चक्र पृथ्वी पर दो खंभों में इस प्रकार गाड़ दिया जाय कि कीली का सिर आकाश के ध्रुव की दिशा में हो तो इस यन्त्र से सूर्य का नतकाल (Hour Angle) सहज ही जाना जा सकता है। दिल्ली और काशी आदि के मान-मन्दिरों में पत्थर के वृहदाकार चक्र यन्त्र बने हैं जो पृथ्वी पर इस प्रकार स्थिर किये गये हैं कि इनके तल विषुवद्वृत्त के समानान्तर हैं और इनके केन्द्र से एक कीली दोनों ओर ६ इंच के लगभग निकली हुई ध्रुवों की दिशा में है। इस चक्र-यंत्र के दोनों तरफ़ के किनारे सम भागों में अंकित हैं। जब सूर्य उत्तर गोल में रहता है (सायनमेष संक्रान्ति से सायन तुला संक्रान्ति तक) तब कील की छाया यंत्र के उत्तरी तल पर पड़कर नत काल बतलाती है और जब सूर्य दक्षिण गोल में रहता है तब कीली की छाया दखिनी तल पर पड़ती है और नतकाल सूचित करती है। जैसे-जैसे सूरज ऊपर उठता है छाया