सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्योतिषोपनिषदध्याय ७८१
नीचे होती जाती है । मध्याह्नकाल में कील की छाया ठीक नीचे हो जाती है । यदि चाहें तो इसके किनारे घंटों में भी अंकित हो सकते हैं। यह भी एक प्रकार की धूप-घड़ी है । भास्कराचार्य जी ने एक दूसरे प्रकार का चक्र-यंत्र बतलाया है। यह भी चक्राकार होता है परन्तु यह स्थिर नहीं किया जाता । किनारे से कुछ दूर एक छेद होता है जिसमें एक जंजीर लगी रहती है । इसी जंजीर से यह लटकाया जा सकता है । इसके किनारे ३६० अंशों में अंकित रहते हैं। लटकने पर इसका केन्द्र छेद के ठीक नीचे रहता है। इन दोनों बिन्दुओं के मिलाने वाली रेखा से समकोण पर जो रेखा होती है, और जो चक्र के केन्द्र पर भी रहती है उसके एक किनारे शून्य का अंक रहता है और दूसरे किनारे १८० का । जब समय जानना हो इसको लटकाकर ऐसा घुमाओ कि इसके केन्द्र पर जड़ी हुई कीली की नोक की छाया किनारे के भागों पर पड़े । यदि इसके किनारे सायन राशियों के इष्ट स्थान के उदयमानों में भी विभाजित हों तो इससे लग्न का ज्ञान भी किया जा सकता है। आजकल के सूक्ष्म यंत्रों के सामने इस यंत्र से भी विशेष लाभ नहीं है । चाप या धनुष यन्त्र—यदि चक्र-यन्त्र का आधा भाग लेकर यंत्र बताया जाय तो सूर्य का नतकाल उसी प्रकार जाना जा सकता है । आजकल दिन में सूर्य का किसी समय का नतांश एक साधारण चापयंत्र से जो कार्ड-बोर्ड का बनाया जा सकता है सहज ही जाना जा सकता है और उससे नतकाल का ज्ञान भी हो सकता है। ऐसे यंत्र की चर्चा इस लेखक ने विज्ञान भाग ४३ संख्या १ पृष्ठ १८ में चित्र १३८ में की है। उसमें कई सारणियां भी दी गयी हैं जिनसे २८ अक्षांश से २२ अक्षांश तक के स्थानों में दिन में समय जाना जा सकता है। इस यंत्र से सूर्य की छाया के अनुसार समय जाना जाता है और चार-पांच मिनट से अधिक अंतर नहीं पड़ता । इस लेखक की घड़ी जब कभी बन्द हो जाती है या ठीक समय नहीं देती तब वह इसी से मिला लेता है। इस यंत्र से किसी स्थान का अक्षांश भी सहज ही जाना जा सकता है। यह सारणी त्रिप्रश्नाधिकार के पृष्ठ २६१ के गुर (१) के अनुसार तैयार की गयी है । इससे काम लेने की संक्षिप्त रीति इस अध्याय के अंत में दी गयी है जहाँ, एक धूप-घड़ी की भी चर्चा की जायगी । इन छाया-यन्त्रों के सिवा जल-घड़ी और बालू-घड़ी आदि से भी काम लिया जाता था। जल-घड़ी को कपाल यंत्र कहते थे क्योंकि यह कपाल की तरह अर्द्ध- गोलाकार होती थी इसके पेंदे में एक छोटा सा छेद होता है। यदि यह पानी में तैरा दिया जाय तो छेद से पानी धीरे-धीरे कटोरे में भरने लगता है और इतना भर जाता है कि कटोरा डूब जाता है। इस कटोरे का और छेद का आकार ऐसा होता