भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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७८२ सूर्य-सिद्धान्त था कि दिन रात में ६० बार डूब जाता था । जितनी देर में वह एक बार डूबता था उसे घड़ी कहते थे । वह इसीलिये इसका नाम घटीयंत्र हो गया जो आगे चलकर घड़ी के नाम से प्रसिद्ध हो गया । प्राचीनकाल में घटीयंत्र बनाने के लिये ऐसे नियम बन गये थे जिनसे स्पष्ट बोध होता था कि कपाल या कटोरा कितना बड़ा हो और छेद कैसा हो। इसका विशेष वर्णन २३वें श्लोक के विज्ञान-भाष्य में किया जायगा । मयूर और बानर यंत्रों के विषय में विस्तारपूर्वक कहीं नहीं लिखा गया है । यह शायद मोर, और वानर के आकार के यंत्र बनाये जाते होंगे जिनमें सूत और बालू के सहारे समय का ज्ञान किया जाता रहा होगा । इन यंत्रों में पारा, तेल, जल आदि के द्वारा ऐसी युक्ति की जाती थी कि वे स्वयम् चलें और समय का ज्ञान करावें परन्तु इस बात का स्पष्ट वर्णन नहीं है कि वह किस प्रकार बनाये जाते थे, केवल इतना ही संकेत है कि इनका प्रयोग बड़ा दुर्लभ है । पता नहीं कि ऐसे स्वयंवह यंत्र यथार्थ में बनाये गये थे या केवल कल्पना में ही थे । आज कल तो अपने आप चलने वाली तरह तरह की घड़ियां सभी काम में ला सकते हैं परन्तु उनका सिद्धांत बतलाने की यहाँ आवश्यकता नहीं जा पड़ती । कपाल यन्त्र — ताम्रपात्रमधश्छिद्रं न्यस्तं कुम्भेऽमलाम्भसि । षष्टिर्मज्जत्यहोरात्रे स्फुटं यन्त्रं कपालकम् ।।२३।। अनुवाद—ताम्बे का कटोरा जिसके पेंदे में छेद हो निर्मल जल के कुंड में रखने से दिन रात में ६० बार डूबे तो वह शुद्ध कपाल यन्त्र होता है । विज्ञान भाष्य—ऐसे कपाल यन्त्र का विशेष वर्णन आचार्य श्रीपति ने सिद्धांत शेखर में इस प्रकार दिया :— शुल्बस्य दिग्भिर्विहितं पलैर्यत् षडङ्गुलोच्चं द्विगुणायतास्यम् । तदम्भसा षष्ठिपलैः प्रपूर्य पात्रं घटार्धप्रतिमं घटीस्यात् ।। सप्तांशमाषत्रयनिर्मिता या हेम्नः शलाका चतुरङ्गुलास्यात् । विद्धं तया प्राक्तनमत्र पात्रं प्रपूर्यते नाडिकयाम्बुना तत् ।। अर्थात् दस पल तोल का तांबा लेकर उसका अर्धगोलाकार एक कटोरा ऐसा बनाया जाय जिसकी ऊँचाई ६ अंगुल और जिसके मुख की चौड़ाई इसकी दूनी हो, जिसमें ६० पल पानी आता हो और जिसकी पेंदी में इतना बड़ा छेद होना चाहिये कि उसमें ३ १/७ माशा सोने की चार अंगुल लम्बी सुई जा सके जिससे एक घड़ी में वह कटोरा पानी से भर जाय । इससे यह सिद्ध होता है कि यह आचार्य समय की शुद्ध-शुद्ध नाप के लिये