सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्योतिषोपनिषद्ध्याय ७८३ कितना प्रयत्नशील था । परन्तु इस प्रकार का यन्त्र बनाना सुगम नहीं था । इसी- लिये भास्कराचार्य १ जी ने इसकी उपेक्षा की है । नरयन्त्र— नरयन्त्रं तथा साधु दिवा च विमले रवौ । छाया संसाधनेः प्रोक्तं कालसाधनमुत्तमम् ॥२४॥ अनुवाद—इसी प्रकार नरयन्त्र अथवा शङ्कु दिन में जब सूर्य स्वच्छ हो अच्छा होता है । छाया की ठीक-ठीक नाप से समय का ठीक-ठीक ज्ञान करने की रीति बतलायी गयी है । विज्ञान-भाष्य—त्रिप्रश्नाधिकार में यह विस्तारपूर्वक बतलाया गया है कि १२ अंगुल लम्बे शंकु की छाया से दिशा, देश और काल की गणना कैसे की जाती है । उपसंहार— ग्रहनक्षत्रचरितं ज्ञात्वा गोलं च तत्वतः । ग्रहलोकमवाप्नोति पययिणात्मवान् नरः ॥२५॥ इति सूर्य-सिद्धान्ते ज्योतिषोपनिषदध्याय अनुवाद—ग्रह और नक्षत्रों की चाल तथा गोल गणित के तत्व को जानने वाला मनुष्य ग्रहलोक को प्राप्त होता है और जन्मान्तर में आत्मज्ञानी होता है । विज्ञान-भाष्य—इस श्लोक से यह प्रकट होता है कि हमारे आचार्य ज्योतिष-शास्त्र के तत्व की जानकारी का कितना महत्व समझते थे और इसका प्रत्यक्ष बोध कराने के लिये अनेक प्रकार के यन्त्रों की कैसी रचना करते थे । आजकल यन्त्रों की इतनी उन्नति हो गयी है कि इनके द्वारा आकाशीय पिंडों की गति का साधन बड़ी सूक्ष्मता से किया जा सकता है । इसमें अध्याय में ऐसे एक यन्त्र की चर्चा संक्षेप में की जाती है । जिनको इनके सम्बन्ध में विशेष रीति से जानने की इच्छा हो उन्हें प्रकाश-विज्ञान की पुस्तकें पढ़नी चाहिए । दूरदर्शक—इस यन्त्र से दूर की वस्तुओं का प्रतिबिम्ब बहुत बड़ा और स्पष्ट देख पड़ता है । इसका सिद्धान्त संक्षेप में यह है :— पीतल की नलिका के एक सिरे पर ऐसा ताल रहता है जिससे दूर की वस्तु का प्रतिबिम्ब उसकी नाभी पर या इसके पास ही बनता है । इस प्रतिबिम्ब के पास १. अत्र दशभिः शुल्बस्य पलैरित्यादि यद् घटी लक्षणम् कैश्चित् कृतं तद्युक्ति शून्यं दुर्घटं चेत्ये तदुपेक्षितम् । (गोलाध्याय, यन्त्राध्याय श्लोक ८ की व्याख्या) ।