सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८४ सूर्य-सिद्धान्त ही दूसरे सिरे पर एक छोटा ताल होता है जिससे यह प्रतिबिम्ब बड़ा होकर दिखाई पड़ता है। यह छोटा ताल एक दूसरी नलिका के सिरे पर जड़ा रहता है जो बड़ी नलिका में खिसक सकती है। बड़ा ताल वस्तु की ओर रहता है इसलिये इसका नाम 'वस्तु ताल' और छोटा ताल देखनेवाले के नेत्र की ओर रहता है इसलिये इसे 'नेत्र ताल' कहते हैं। माउन्ट विल्सन के वेधालय के दूरदर्शक के वस्तु ताल का व्यास १०० इंच अथवा ८ फुट ४ इंच हैं। दस वर्ष से एक ऐसा ताल बनाया जा रहा है जिसका व्यास २०० इंच का होगा। इसकी मोटाई २५ इंच की है और तोल ३३००० पौंड अथवा ४०२ मन से कुछ ऊपर। इस ताल से जो प्रतिबिम्ब बनेगा वह दस लाख गुना बढ़ाया जा सकता है। चन्द्रमा यहाँ से २५००० मील दूर है परन्तु इस ताल से देखने पर वह ऐसा जान पड़ेगा मानो केवल २० मील की दूरी पर है। यह ताल जिस नली में जड़ा जायगा उसकी लम्बाई ५५ फुट और तोल २५०००० पौंड अथवा ३०४६ मन¹ है। यदि यह यंत्र इस प्रकार स्थिर किया जाय कि यह पूर्व-पश्चिम दिशा में स्थापित सम अक्ष पर यामोत्तर वृत्त के तल में घूमे तो इसका नाम यामोत्तर यंत्र हो जाता है। इससे किसी ग्रह या तारे का यामोत्तरलंघन काल, विषुवांश और क्रान्ति की नाप हो सकती है। चित्र १३७ से इस यंत्र के स्थिर करने की रीति मोटे तौर पर मालूम हो सकती है। 'पू प' अक्ष के दोनों सिरों पर दो चक्र होते हैं जिनके किनारों पर अंशों और कलाओं के चिह्न अंकित रहते हैं। दूरदर्शक को किसी ग्रह या तारे की सीध में करते समय चक्र जितना घूम जाता है उसी से उस ग्रह का चित्र १३७ नतांश जान लिया जाता है। स्थान का अक्षांश मालूम ही रहता है। बस इन दोनों की सहायता से उस ग्रह की क्रान्ति सहज ही जानी जा सकती है। १. २५ अक्टूबर १६३८ के अंग्रेजी दैनिक 'लीडर' से